न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता दिख रहा है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मांग की है कि नियुक्तियों से जुड़ा मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर जल्द से जल्द अंतिम रूप दिया जाए। एसोसिएशन के अध्यक्ष सीनियर एडवोकेट विकास सिंह की तरफ से लिखे पत्र में कहा गया है कि मौजूदा कोलेजियम प्रणाली में कई गंभीर खामियां हैं जिन्हें तुरंत और व्यापक स्तर पर ठीक करने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
कोलेजियम प्रणाली पर उठे सवाल
SCBA ने अपने पत्र में कहा है कि कोलेजियम प्रणाली भले ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए बनाई गई थी, लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था खुद ही कई चुनौतियों का कारण बन गई है। बार एसोसिएशन का मानना है कि इस प्रणाली की संरचनात्मक खामियों के चलते योग्य वकील और प्रतिभाशाली लोग न्यायाधीश बनने से वंचित रह जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट बार के वकीलों की अनदेखी
SCBA ने खासतौर पर यह मुद्दा उठाया है कि सुप्रीम कोर्ट बार में काम करने वाले वरिष्ठ और अनुभवी वकीलों को उनके गृह राज्य की हाईकोर्ट में जज बनने का अवसर नहीं दिया जाता। जबकि ये वकील पूरे देश की संवैधानिक और कानूनी बहसों का हिस्सा होते हैं और उनकी समझ कई मामलों में बेहद गहरी होती है। एसोसिएशन का कहना है कि इस तरह की अनदेखी न केवल न्यायपालिका को अच्छे दिमागों से वंचित करती है बल्कि मेरिट आधारित चयन की भावना को भी कमजोर करती है।
महिलाओं और विविध पृष्ठभूमि से आने वालों का प्रतिनिधित्व कम
SCBA ने पत्र में एक और अहम मुद्दे की ओर ध्यान खींचा है। उसने कहा है कि वर्तमान ढांचे में महिलाओं और विविध पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों का प्रतिनिधित्व बेहद कम है। फरवरी 2024 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक हाईकोर्ट में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 9.5 प्रतिशत थी जबकि सुप्रीम कोर्ट में यह संख्या महज 2.94 प्रतिशत रही। एसोसिएशन का कहना है कि यह आंकड़े न्यायपालिका की एक बड़ी कमजोरी को उजागर करते हैं और दिखाते हैं कि किस तरह प्रतिभा होने के बावजूद कई लोग प्रणालीगत खामियों के चलते पीछे रह जाते हैं।
पारदर्शी और मेरिट आधारित प्रणाली की मांग
SCBA का कहना है कि अब समय आ गया है कि नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और मेरिट आधारित बनाई जाए। एसोसिएशन ने सुझाव दिया है कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष तंत्र तैयार किया जाए जिसमें योग्य उम्मीदवारों को अवसर मिले और किसी तरह की पैरवी या सिफारिश की गुंजाइश न रहे।
सुधार की जरूरत पर जोर दिया जाए- SCBA
बार एसोसिएशन ने साफ कहा है कि अगर नियुक्तियों की मौजूदा व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो न्यायपालिका में विश्वास कमजोर हो सकता है। जनता को यह भरोसा होना चाहिए कि देश की अदालतों में सर्वोत्तम प्रतिभा और सबसे योग्य लोग ही न्यायाधीश बन रहे हैं।
क्या है कॉलेजियम सिस्टम?
कॉलेजियम सिस्टम भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले की प्रक्रिया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश मिलकर यह तय करते हैं कि किसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जज बनाया जाए। यह व्यवस्था 1993 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सेकेंड जजमेंट केस से शुरू हुई थी।
इसका उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखना था ताकि सरकार का सीधा हस्तक्षेप न हो। हालांकि समय के साथ इस प्रणाली पर कई आलोचनाएं हुईं। कहा गया कि इसमें पारदर्शिता की कमी है और फैसले कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में सिमट जाते हैं।
