RSS Chief Mohan Bhagwat On Population: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत के दशहरे के मौके पर जनसंख्या पर दिया गया बयान चर्चा में हैं। उन्होंने इस मौके पर भारत के लिए एक समग्र जनसंख्या नीति को जरूरी बताया है। जिसमें उनका आशय ऐसी नीति से है जो सभी धर्मों, संपद्रायों पर समान रूप से लागू हो। जिसमें धर्म आधारित जनसंख्या के 'असंतुलन' का मामला नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके बयान के आने के बाद से ही उस प्रतिक्रिया शुरू हो गई है।
AIMIM के प्रमुख असदउद्दीन ओवैसी ने कहा कि जब हिदू और मुसलमान का डीएनए एक ही है तो फिर इसमें असंतुलन की बात कहां से आई। वहीं भाजपा नेता और पूर्व विधायक संगीत सोम ने विवादित बयान दे दिया है, उन्होंने कहा है कि बुधवार को विजयदशमी पर राजपूत उत्थान सभा के शस्त्र पूजन कार्यक्रम में कहा कि जिस तरह से एक वर्ग विशेष की आबादी बढ़ रही है, सिर कलम करने की बात हो रही है, इन सबको समाप्त करने के लिए सत्ता के साथ-साथ भविष्य में शस्त्रों की भी जरूरत पड़ेगी।
जनसंख्या नियंत्रण एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर राजनीति शुरू होना लाजिमी है। लेकिन एक हकीकत यह भी है कि अगले साल यानी 2023 में हम जनसंख्या के मामले में चीन से आगे निकल जाएंगे। और एक देश के रूप में हम बूढ़े हो रहे हैं। यानी हमारे यहां युवा की आबादी कम हो रही है।
2023 में सबसे ज्यादा भारत की होगी आबादी
संयुक्त राष्ट्र संघ की जुलाई 2022 में आई रिपोर्ट World Population Prospects, 2022 के अनुसार भारत 2023 में आबादी के मामले चीन को पछाड़ देगा। यानी अगले साल भारत दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार 2022 में चीन की आबादी जहां 142.6 करोड़ के करीब रहेगी, वहीं भारत की आबादी 141.2 करोड़ के आसपास होगी। जो कि 2023 में चीन से आगे निकल जाएगी। रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक भारत की आबादी 166 करोड़ से ज्यादा होगी। जबकि चीन की आबादी घटकर 131 करोड़ के करीब पहुंच जाएगी। साफ है कि भारत पर जनसंख्या का बड़ा बोझ होगा।
भागवत क्या संदेश देना चाहते हैं
मोहन भागवत ने अपने बयान में कहा है कि साल 2000 में भारत सरकार ने समग्रता से विचार कर एक जनसंख्या नीति का निर्धारण किया था। उसमें एक महत्वपूर्ण लक्ष्य 2.1 के प्रजनन दर (TFR) को प्राप्त करना था। NFHS की रिपोर्ट के अनुसार , समाज की जागरूकता और सकारात्मक सहभागिता तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के कोशिशों के परिणामस्वरूप प्रजनन दर 2.1 से भी कम लगभग 2.0 के प्रजनन दर पर आ गई है ।
इसके साथ ही भागवत ने यह भी कहा है कि जनसंख्या नियंत्रण के साथ साथ पंथ के आधार पर जनसंख्या संतुलन भी महत्व का विषय है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने इसे समझाते हुए कहा है कि अगर यह असंतुलन बढ़ता जाता है तो 1947 जैसा भारत का विभाजन,ईस्ट तिमोर, दक्षिणी सूडान और कोसोवा जैसे नए देशों के गठन के रूप में दिखता है।
अभी भारत में धर्म के आधार पर क्या है स्थिति
धर्म के आधार पर देखा जाय तो पिछले 20 साल में सभी धर्मों के लोगों में प्रजनन दर घटी है। NFHS-5 सर्वे के अनुसार हिंदू, सिख, मुस्लिम , ईसाई और अन्य समुदाय के लोगों में प्रजनन दर घटी है। 1992-92 में जहां हिंदुओं की प्रजनन दर 3.30 थी, वही मुस्लिम में यह 4.41 थी। जबकि 2019-21 के पांचवे सर्वे में यह घटकर हिंदुओं में 1.94 और मु्स्लिम समुदाय में 2.36 पर आ गई है।
लेकिन दूसरे समुदाय से तुलना की जाय ततो मुस्लिम समुदाय में प्रजनन दर सबसे ज्यादा है। 1992-93 में यह 4.41 थी, तो 2019-21 में यह 2.36 है। जबकि दूसरे नंबर पर हिंदुओं की प्रजनन दर है। जो 1992-93 में 3.30 थी और अभी यह 1.94 है। लेकिन अगर सबसे ज्यादा गिरावट की बात की जाय तो पिछले 20 साल में सबसे तेजी से प्रजनन दर में गिरावट मुस्लिम समुदाय में ही देखी गई है। बीस साल में मुस्लिमों की प्रजनन दर में 2.05 फीसदी की कमी आई है। जबकि हिंदुओं के प्रजनन दर में 1.36 फीसदी की कमी आई है।
| धर्म/समुदाय | प्रजनन दर (1992-93) | प्रजनन दर (2019-21) | कितनी आई कमी | ||
| हिंदू | 3.30 | 1.94 | 1.36 | ||
| मुस्लिम | 4.41 | 2.36 | 2.05 | ||
| ईसाई | 2.87 | 1.88 | 0.99 | ||
| सिख | 2.43 | 1.61 | 0.82 | ||
| अन्य | 2.77 | 2.15 | 0.62 | ||
| बौद्ध | - | 1.39 | |||
| जैन | - | 1.60 | |||
युवा आबादी कम होने की आशंका
अपने भाषण में भागवत ने एक और अहम बात कही है। उन्होंने कहा है कि आज हम सबसे युवा देश हैं। लेकन 50 वर्षों के बाद आज के युवा प्रौढ़ यानी वृद्धावस्था की ओर जाएंगे। तब उन्हें संभालने के लिए कितने युवा आवश्यक होंगे यह गणित हमें भी करना होगा। केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वन मंत्रालय की 'यूथ इन इंडिया 2022' के अनुसार 2036 तक भारत में युवाओं की संख्या कम होने लगेगी। रिपोर्ट के अनुसार 2036 तक देश में युवाओं की हिस्सेदारी 26.6 फीसदी से घटकर 22.7 फीसदी पर आ जाएगी। यानी 100 में 77 लोग बूढ़े होंगे।
देखना यह है कि भागवत के बयान के पर केवल सत्ता और विपक्ष के तरफ से राजनीति होगी या फिर उभरती चुनौतियों को देखते हुए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे।
