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Exclusive: अटल बिहारी वाजपेयी ने PAK को गिफ्ट की थी 'सरहद' एल्बम, सीमा सहगल ने साझा किया संगीत का संदेश

EYE Opener: लोक गायिका सीमा सहगल ने टाइम्स नाउ नवभारत के खास कार्यक्रम में अपने जीवन, संगीत साधना, पारिवारिक सहयोग और कला से जुड़े विचारों पर विस्तार से बातचीत की।

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Photo : Times Now Digital
प्रसिद्ध शास्त्रीय एवं लोक गायिका सीमा सहगल
Reported by: डॉ रमा सोलंकीEdited by: अनुराग गुप्ता
Updated Oct 18, 2026, 20:36 IST
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EYE Opener: प्रसिद्ध शास्त्रीय एवं लोक गायिका सीमा सहगल, जिन्हें 'बुलबुल-ए-जम्मू और कश्मीर' के नाम से जाना जाता है, ने टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के खास कार्यक्रम 'EYE Opener' में जीवन, संगीत के प्रति समर्पण, गुरु से मिली सीख, परिवार के सहयोग और आधुनिक दौर में संगीत की बदलती दुनिया पर विस्तार से बात की। महज छह वर्ष की उम्र में गायन शुरू करने वाली सीमा सहगल ने बताया कि जम्मू के लक्ष्मीनारायण मंदिर में मीराबाई का भजन गाया था तो एक साधु ने अपनी जेब से पैसे निकालकर आशीर्वाद स्वरूप मुझे दिया था। उसे मैं अपनी असली कमाई मानती हूं।

सीमा सहगल ने शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ डोगरी लोकगीतों और उर्दू गजलों के माध्यम से भी अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के कार्यक्रम 'EYE Opener' में डॉ. रमा सोलंकी के साथ बातचीत में बताया कि उनके करियर को संवारने और मंच का आत्मविश्वास देने में आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) और दूरदर्शन का प्रमुख योगदान रहा।

अपनी मिट्टी से जुड़ी रहीं सीमा सहगल

सीमा सहगल मानती हैं कि इंसान को अपनी जड़ों से जुड़ा रहना चाहिए; इसीलिए उर्दू गज़लों के साथ-साथ उन्होंने अपनी मातृभाषा डोगरी में भी लोकगीत गाए। यही वजह है कि उर्दू गजलों और शास्त्रीय संगीत के साथ उन्होंने डोगरी लोकगीतों को भी अपनी गायकी का हिस्सा बनाया। उन्होंने कहा, ''जो इंसान अपनी मिट्टी से जुड़ा रहता है वहीं सच्चा इंसान है।''

उन्होंने कहा कि मुंबई या कहीं भी मैं जाऊं, लेकिन मैं जम्मू की खुशबू मुझे बहुत बढ़िया लगती है। इसलिए उर्दू में गजलें गाने के साथ मैंने कोशिश की कि मैं डोगरी में भी लोकगीत गाए हैं। मैंने जहां-जहां भी प्रोग्राम किए हैं वहां अंत में अपना लोकगीत भी गाया।

जब सीमा सहगल से पूछा गया कि 'बुलबुल-ए-जम्मू और कश्मीर' नाम कैसे मिला? इस पर उन्होंने कहा, ''जब उनके पति स्क्वाड्रन लीडर अनिल सहगल की पोस्टिंग दिल्ली में हुई, तब उनकी मुलाकात मशहूर शायर अली सरदार जाफरी से हुई। जाफरी साहब की अमन और भाईचारे वाली नज़्मों को जब मैंने पढ़ा तो फिर मैंने उन चीजों को पिरोना शुरू किया और अपने सुरों में 'सरहद' एल्बम तैयार की।''

कैसे मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान?

सीमा सहगल ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा एक किस्सा भी सुनाया। उन्होंने बताया, ''मुझे अटल बिहारी वाजपेयी की तरफ से एक फोन कॉल आया था, उसे सहगल साहब ने उठाया था और सामने से कहा गया कि हैम्पर तैयार कर दीजिए। तोहफे के तौर पर हम उसे देना चाहता हूं।''

उन्होंने बताया कि इस शांति एल्बम को पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी जी ने पाकिस्तान दौरे के दौरान वहां के नेतृत्व को सौहार्द के प्रतीक के रूप में भेंट किया था। इस एल्बम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिला और सीमा सहगल को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से सम्मानित होने का निमंत्रण मिला। उनके लिए यह उपलब्धि इस बात का उदाहरण थी कि संगीत और कविता भाषा तथा राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर लोगों को जोड़ सकते हैं।

Seema Sehgal

Seema Sehgal

सीमा सहगल ने गुरुओं को किया नमन

सीमा सहगल अपनी गुरु और प्रख्यात शास्त्रीय गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर से मिली शिक्षाओं को अपने जीवन और संगीत साधना का महत्वपूर्ण आधार मानती हैं। इस दौरान, उन्होंने अपने सभी गुरुओं को नमन किया। उन्होंने बताया कि गुरु विदुषी किशोरी अमोनकर ने मुझे चार अहम बातें सिखाईं।

परिवार का साथ बना संगीत साधना की ताकत

सीमा सहगल के संगीतमय सफर में उनकी प्रतिभा और साधना के साथ-साथ परिवार के सहयोग की भी अहम भूमिका रही। उनके पिता ने बेटी के संगीत के प्रति समर्पण को समझते हुए उसके रियाज़ में साथ देने के लिए खुद तबला बजाना सीखा। पिता का यह त्याग और प्रोत्साहन सीमा सहगल के लिए न केवल संगीत सीखने की राह आसान बनाने वाला था, बल्कि उनके हौसले को मजबूत करने वाला भी साबित हुआ।

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