Gurugram Construction Site Accident: गुरुग्राम में निर्माणाधीन इमारत हादसे में 7 मजदूरों की मौत का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हादसे की स्वतंत्र जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय और हरियाणा सरकार के अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने निर्माण श्रमिकों से जुड़े संगठन की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई की।
7 मजदूरों की मौत पर स्वतंत्र जांच की मांग (फोटो- PTI)
सीजेआई का सुझाव- लाइसेंस की शर्त बने मजदूरों के लिए विशेष कोष
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने सुझाव दिया कि निर्माण कंपनियों को लाइसेंस जारी करने की शर्त के तौर पर निर्माण मजदूरों के लिए एक अलग विशेष कोष बनाने का प्रावधान किया जा सकता है। सीजेआई ने कहा कि बिल्डरों को अलग-अलग तरह के कोष में पैसा जमा करना होता है। ऐसे में निर्माण मजदूरों के लिए भी अलग कोष क्यों नहीं बनाया जा सकता? इसे निर्माण कंपनी को लाइसेंस देने की अनिवार्य शर्त बनाया जा सकता है।
प्रशांत भूषण ने उठाया निर्माण मजदूरों की सुरक्षा का मुद्दा
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियां संहिता में निर्माण श्रमिकों के लिए, खासकर अत्यधिक जोखिम वाले निर्माण कार्यों में, स्पष्ट सुरक्षा मानक तय होने चाहिए। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने भारतीय मानक ब्यूरो यानी बीआईएस की ओर से निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप दिशानिर्देश सुझाए हैं। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने याचिकाकर्ता से मौजूदा और नए सुरक्षा नियमों के बीच अंतर बताने वाला तुलनात्मक चार्ट दाखिल करने को कहा।
9 मार्च को 30-40 फीट गहरी खुदाई के दौरान हुआ था हादसा
जनहित याचिका के मुताबिक इसी साल 9 मार्च को गुरुग्राम के सिधरावली स्थित सिग्नेचर ग्लोबल सिटी ऑफ कलर्स परियोजना में हादसा हुआ था। निर्माणाधीन सीवेज शोधन संयंत्र के पास मिट्टी को रोकने वाली दीवार गिर गई थी। आरोप है कि वहां करीब 30 से 40 फीट गहरी खुदाई की गई थी। खुदाई के दौरान मिट्टी और मलबा धंसने से कई मजदूर उसके नीचे दब गए।
हादसे में 7 मजदूरों की मौत हुई, जबकि कई अन्य घायल हुए
घटना के बाद गुरुग्राम के बिलासपुर थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 और 125 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जनहित याचिका में सिर्फ प्राथमिकी की जांच तक सीमित न रहते हुए स्वतंत्र और समयबद्ध तकनीकी जांच की मांग की गई है।
याचिका में यह पता लगाने की मांग की गई है कि-
- खुदाई की योजना और डिजाइन सही था या नहीं।
- जमीन और मिट्टी की स्थिरता का आकलन किया गया था या नहीं।
- खुदाई की दीवारों को गिरने से रोकने के लिए सहारा देने की पर्याप्त व्यवस्था थी या नहीं।
- निर्माण कार्य के लिए जरूरी तकनीकी मंजूरी ली गई थी या नहीं।
- हादसे से पहले जोखिम का आकलन किया गया था या नहीं।
- सुरक्षा संबंधी जांच और निरीक्षण नियमित रूप से किए गए थे या नहीं।
- निर्माण स्थल की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था में किस स्तर पर लापरवाही हुई।
देशभर में निर्माण हादसों का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाने की मांग
याचिका में कहा गया है कि निर्माण स्थलों पर होने वाली दुर्घटनाओं की समस्या सिर्फ हरियाणा तक सीमित नहीं है। इसमें ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम सेक्टर-27, इंदौर और जयपुर में हुए हादसों का भी जिक्र किया गया है। याचिका में केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निर्माण कार्य के दौरान होने वाली मौतों और गंभीर चोटों का राष्ट्रीय रिकॉर्ड तैयार करने की व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। इस रिकॉर्ड में हादसे की वजह, सुरक्षा निरीक्षण, दर्ज मुकदमे, अभियोजन, मुआवजा और श्रमिकों को मिले कल्याणकारी लाभों की जानकारी भी दर्ज करने की मांग की गई है।
मृतक और घायल मजदूरों की पहचान कर मुआवजा देने की मांग
याचिका में मांग की गई है कि हादसे में मारे गए और घायल हुए सभी मजदूरों की पहचान कर उन्हें मुआवजा, चिकित्सा सहायता और पुनर्वास की सुविधा दी जाए। याचिका में यह अहम सवाल भी उठाया गया है कि अगर कोई मुख्य नियोक्ता अपना काम ठेकेदार या उप-ठेकेदार को सौंप देता है, तो क्या इससे निर्माण श्रमिकों की सुरक्षा के प्रति उसकी कानूनी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि ऐसे हादसे सिर्फ किसी एक व्यक्ति की लापरवाही का मामला नहीं हैं, बल्कि निर्माण श्रमिकों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों के पालन, अधिकारियों की जवाबदेही और देशभर में प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े व्यापक सवाल उठाते हैं। जनहित याचिका में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मांगी गई राहत का उद्देश्य भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम और प्रभावित श्रमिकों को राहत दिलाना है, न कि किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय करना।
