वोटर लिस्ट को किस डिजिटल फॉर्मेट में उपलब्ध कराया जाए, इस पर बहस नई नहीं है। साल 2018 में कांग्रेस नेता कमलनाथ ने सुप्रीम कोर्ट में मतदाता सूची को टेक्स्ट फॉर्मेट में देने की मांग की थी। उनका तर्क था कि सूची की सही तरीके से जांच करने और फर्जी या दोहराए गए नामों की पहचान करने के लिए ऐसा डिजिटल फॉर्मेट जरूरी है, जिसमें नाम खोजे जा सकें। सुप्रीम कोर्ट ने उस समय यह मांग स्वीकार नहीं की थी।
करीब सात साल बाद हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों की मतदाता सूचियों को लेकर कांग्रेस ने फिर यह मुद्दा उठाया। जून 2025 में चुनाव आयोग ने इन दोनों राज्यों की 2009 से 2024 तक की मतदाता सूचियों का डेटा साझा करने का फैसला किया। राहुल गांधी ने इसे सही दिशा में पहला कदम बताया, लेकिन पूछा कि यह डेटा डिजिटल और मशीन-रीडेबल फॉर्मेट में कब उपलब्ध कराया जाएगा।
अब 15 अक्टूबर 2026 को जारी स्पेशल समरी रिवीजन के आदेश में चुनाव आयोग ने मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को ड्राफ्ट और अंतिम मतदाता सूची की रीडेबल PDF कॉपी देने का निर्देश दिया है। मतदान के समय उम्मीदवारों को भी वर्णमाला के क्रम में तैयार मतदाता सूची की PDF इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में मिल सकती है।
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यह आदेश मतदाता सूची को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसमें यह स्पष्ट नहीं कहा गया है कि राजनीतिक दलों को पूरी मतदाता सूची Excel या CSV जैसे फॉर्मेट में भी दी जाएगी। इसलिए इसे राहुल गांधी की मशीन-रीडेबल डेटा की मांग की पूरी मंजूरी मानने से पहले दोनों के बीच का अंतर समझना जरूरी है।
2018 में कमलनाथ की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
कमलनाथ ने 2018 में मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने मतदाता सूची को टेक्स्ट फॉर्मेट में उपलब्ध कराने के साथ कुछ अन्य चुनावी मुद्दे भी उठाए थे। इनमें VVPAT पर्चियों की कम से कम 10 प्रतिशत मतदान केंद्रों पर रैंडम जांच और मतदाता सूची से नाम हटाने से पहले राजनीतिक दलों को सूचना देने की मांग शामिल थी।
12 अक्टूबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। मतदाता सूची के फॉर्मेट पर कोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयोग के मैनुअल में ड्राफ्ट मतदाता सूची को PDF के रूप में प्रकाशित करने और टेक्स्ट मोड में उपलब्ध कराने की बात है। लेकिन इसमें यह नहीं लिखा है कि PDF ऐसी होनी चाहिए, जिसमें नामों को सर्च किया जा सके।
कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सूची में मतदाताओं की जानकारी टेक्स्ट के रूप में होना और उस फाइल में नामों को खोज पाने की सुविधा होना दो अलग बातें हैं। उस समय लागू निर्देशों के तहत कमलनाथ सर्च करने योग्य PDF को अपना कानूनी अधिकार नहीं बता सकते थे। कोर्ट ने यह भी कहा कि सूची किस फॉर्मेट में प्रकाशित की जाए, यह तय करना चुनाव आयोग का काम है।
मशीन-रीडेबल सूची पर आयोग ने क्या आशंका जताई थी?
उस समय चुनाव आयोग ने कहा था कि सर्च करने और डेटा छांटने की सुविधा वाली मतदाता सूची का इस्तेमाल मतदाताओं की प्रोफाइलिंग और बड़े स्तर पर डेटा जुटाने के लिए हो सकता है। आयोग ने इसे मतदाताओं की निजता और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव से जुड़ा मुद्दा बताया था।
हालांकि, फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा था कि मशीन-रीडेबल मतदाता सूची देना हमेशा के लिए प्रतिबंधित है। कोर्ट ने यह तय किया था कि उस समय लागू नियमों के तहत सर्च करने योग्य PDF देना आयोग के लिए अनिवार्य नहीं था। निजता और डेटा के गलत इस्तेमाल से जुड़ी आयोग की दलीलों पर भी कोर्ट ने अलग से कोई अंतिम फैसला नहीं दिया था।
हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों के बाद फिर उठा मुद्दा
2024 के हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस ने मतदाता सूची के डेटा की मांग फिर उठाई। जून 2025 में चुनाव आयोग ने दोनों राज्यों की 2009 से 2024 तक की मतदाता सूचियों का डेटा साझा करने का फैसला किया।राहुल गांधी ने इस फैसले को पहला कदम बताया, लेकिन उनकी मांग थी कि डेटा डिजिटल और मशीन-रीडेबल फॉर्मेट में उपलब्ध कराया जाए। ऐसे फॉर्मेट में कंप्यूटर की मदद से नामों को खोजने, अलग-अलग प्रविष्टियों की तुलना करने और बड़े स्तर पर डेटा का विश्लेषण करने में आसानी होती है।
इस मांग का मकसद केवल मतदाता सूची को स्क्रीन पर पढ़ना नहीं, बल्कि उसकी व्यवस्थित जांच करना भी है। उदाहरण के लिए, एक ही नाम या अन्य समान जानकारी वाली प्रविष्टियों की पहचान करने के लिए ऐसा डेटा उपयोगी हो सकता है, जिसे कंप्यूटर पर खोजा और छांटा जा सके। हालांकि, किसी प्रविष्टि का एक जैसी दिखना अपने आप में फर्जी मतदाता होने का प्रमाण नहीं है। इसकी पुष्टि के लिए अलग से जांच जरूरी होती है।
चुनाव आयोग ने क्या नया निर्देश दिया है?
आज 15 अक्टूबर को जारी SSR आदेश में मतदाता सूची उपलब्ध कराने के दो अलग प्रावधान हैं। पहला, राजनीतिक दलों के लिए। आदेश के पैरा 23 के मुताबिक, ड्राफ्ट और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को हर मतदान केंद्र की सूची की दो प्रतियां मुफ्त दी जाएंगी। इनमें एक कागज पर और दूसरी सॉफ्ट कॉपी के रूप में होगी। सॉफ्ट कॉपी रीडेबल PDF में होगी और उसमें मतदाताओं की तस्वीरें नहीं होंगी।
दूसरा, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए। आदेश के पैरा 17 के मुताबिक, मतदान के समय वर्णमाला के क्रम में तैयार मतदाता सूची की रीडेबल PDF पेन ड्राइव या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक स्टोरेज डिवाइस में उपलब्ध कराई जा सकती है। इसके लिए उम्मीदवार को मांग करनी होगी और निर्धारित शुल्क देना होगा। यह कॉपी रिटर्निंग ऑफिसर (RO) या जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) के कार्यालय से मिल सकती है। इसमें भी मतदाताओं की तस्वीरें नहीं होंगी।
इस तरह राजनीतिक दलों को ड्राफ्ट और अंतिम सूची की रीडेबल PDF मुफ्त देने का प्रावधान है, जबकि मतदान के समय उम्मीदवारों के लिए वर्णमाला के क्रम में तैयार PDF लेने की अलग व्यवस्था है।
रीडेबल PDF और मशीन-रीडेबल डेटा में क्या अंतर है?
दोनों को एक जैसा समझना सही नहीं होगा। रीडेबल PDF यानि इसका मतलब है कि फाइल में मतदाता सूची को पढ़ा जा सकता है। लेकिन इससे यह जरूरी नहीं हो जाता कि फाइल के सभी नामों को कंप्यूटर पर आसानी से खोजा, छांटा या दूसरे डेटा से मिलाया जा सके। वहीं मशीन-रीडेबल डेटा ऐसा डेटा होता है, जिसे कंप्यूटर व्यवस्थित रूप से पढ़ और उसका विश्लेषण कर सकता है। Excel या CSV जैसे फॉर्मेट इसके उदाहरण हैं। सर्च करने योग्य PDF में भी टेक्स्ट खोजने की सुविधा हो सकती है, लेकिन वह अपने आप में Excel या CSV जैसा संरचित डेटा नहीं होती। इस अंतर के कारण चुनाव आयोग के नए आदेश को मशीन-रीडेबल डेटा देने की मांग की पूरी मंजूरी नहीं कहा जा सकता। आदेश में रीडेबल PDF देने की बात स्पष्ट है, लेकिन Excel या CSV जैसे फॉर्मेट में पूरा डेटा देने का स्पष्ट निर्देश नहीं है।
क्या SIR से पहले और बाद की मतदाता सूची की तुलना भी हो सकेगी?
मतदाता सूची की जांच से जुड़ा एक और सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दलों को SIR से पहले और बाद की सूची का ऐसा डेटा मिलेगा, जिससे जोड़े गए, हटाए गए और बदले गए नामों की व्यवस्थित तुलना की जा सके। 15 अक्टूबर के SSR आदेश में रीडेबल PDF देने की व्यवस्था है। लेकिन इस आदेश में SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों का पूरा तुलनात्मक डेटा Excel या CSV जैसे फॉर्मेट में देने का स्पष्ट निर्देश नहीं है। इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि नए आदेश से मतदाता सूची में हुए सभी बदलावों का कंप्यूटर की मदद से मिलान करने की सुविधा अपने आप मिल जाएगी।
SSR का कार्यक्रम कब से लागू होगा?
चुनाव आयोग ने 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण का कार्यक्रम घोषित किया है। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु, पंजाब और राजस्थान समेत अन्य राज्य शामिल हैं। निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक, ड्राफ्ट मतदाता सूची 12 नवंबर 2026 को प्रकाशित होगी। दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अवधि 12 नवंबर से 11 दिसंबर तक होगी। इनका निपटारा 28 दिसंबर तक किया जाना है और अंतिम मतदाता सूची 4 जनवरी 2027 को प्रकाशित होगी। दिल्ली समेत उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए कार्यक्रम बाद में घोषित किया जाएगा, जहां SIR चल रहा है या हाल में पूरा हुआ है।
तो क्या चुनाव आयोग ने राहुल गांधी की मांग मान ली?
तथ्यों के आधार पर इसका जवाब सावधानी से देना होगा। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सर्च करने योग्य PDF देने को कानूनी अधिकार नहीं माना था। 2025 में हरियाणा और महाराष्ट्र की मतदाता सूचियों का डेटा साझा करने के फैसले के बाद राहुल गांधी ने मशीन-रीडेबल डेटा की मांग दोहराई। अब चुनाव आयोग ने SSR के आदेश में रीडेबल PDF देने का स्पष्ट निर्देश दिया है। लेकिन रीडेबल PDF और मशीन-रीडेबल डेटा अलग-अलग चीजें हैं। नए आदेश में Excel या CSV जैसे फॉर्मेट में पूरा डेटा देने की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। इसलिए यह कहना कि आयोग ने राहुल गांधी की पूरी मांग मान ली है, उपलब्ध आदेश से साबित नहीं होता।
फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की रीडेबल PDF उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। यह डिजिटल पहुंच के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन मशीन-रीडेबल डेटा और SIR से पहले तथा बाद की सूचियों के पूरे तुलनात्मक डेटा की मांग इससे पूरी हुई है या नहीं, यह अलग सवाल है।
