इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने एक हालिया फैसले में कहा कि दो आरोपियों के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत को साक्ष्य से बाहर नहीं किया जा सकता, भले ही यह अवैध रूप से प्राप्त की गई हो, जैसा कि बार और बेंच ने बताया है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने यह टिप्पणी एक ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए की, जहां रिश्वतखोरी के एक मामले में आरोपी को बरी करने से इनकार कर दिया गया था, जिस पर रिकॉर्डेड टेलीफोनिक बातचीत (recorded telephonic converstation) के आधार पर आरोप लगाया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला
अभियुक्त ने तर्क दिया था कि साक्ष्य अवैध रूप से प्राप्त किए गए थे और इसलिए अदालत के समक्ष स्वीकार्य नहीं थे। हालाँकि, कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा, 'दोनों आरोपियों के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत को इंटरसेप्ट किया गया था या नहीं और यह कानूनी रूप से किया गया था या नहीं, इससे आवेदक के खिलाफ साक्ष्य में रिकॉर्ड की गई बातचीत की स्वीकार्यता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।'
कैंटोनमेंट बोर्ड के पूर्व सीईओ महंत प्रसाद राम त्रिपाठी के खिलाफ भ्रष्टाचार के एक मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट का फैसला आया। त्रिपाठी पर बोर्ड के सदस्य शशि मोहन के जरिए 1.65 लाख रुपये रिश्वत मांगने का आरोप था।
सीबीआई ने मामले में सबूत के तौर पर दो आरोपियों के बीच डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर पर हुई टेलीफोनिक बातचीत को पेश किया। रिकॉर्ड किए गए ऑडियो से पता चला कि सह-आरोपी ने कथित तौर पर त्रिपाठी से कहा कि 6 प्रतिशत राशि का भुगतान किया जा चुका है।
सीबीआई के अनुसार, त्रिपाठी ने सकारात्मक जवाब दिया और दूसरे पक्ष के सह-अभियुक्तों से फोन पर बातचीत जारी न रखने और व्यक्तिगत रूप से आगे बढ़ने के लिए कहा। त्रिपाठी के वकील ने तर्क दिया कि टेलीफोन पर बातचीत अस्वीकार्य थी क्योंकि भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम की धारा 5 केवल कुछ आकस्मिकताओं में संचार को रोकने की अनुमति देती है, और वह भी सरकार के आदेशों के तहत। हालाँकि, अदालत ने कहा कि इस मामले में, रिकॉर्ड की गई फोन बातचीत को अवरोधन नहीं माना जाएगा।
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