भारत ने अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्रांति को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। अब देश का फोकस सिर्फ क्षमता बढ़ाने पर नहीं, बल्कि प्रणाली को मजबूत और स्थायी बनाने पर है। ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने स्पष्ट किया है कि भारत की ग्रीन एनर्जी यात्रा अब “स्पीड से सस्टेनेबिलिटी” की दिशा में बढ़ रही है — एक ऐसा बदलाव जो आने वाले वर्षों में भारत को स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र की वैश्विक ताकत बना देगा।
भारत की ग्रीन एनर्जी क्रांति का नया दौर (Photo- Canva)
एक दशक में 35 से 197 गीगावाट तक पहुंचा भारत
पिछले एक दशक में भारत की नवीकरणीय क्षमता 35 गीगावाट से बढ़कर 197 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। यह वृद्धि किसी क्रांति से कम नहीं। लेकिन अब भारत केवल आंकड़ों की दौड़ में नहीं है, बल्कि वह उस दौर में है जहां ऊर्जा ग्रिड, भंडारण और बाजार डिजाइन जैसे सुधार, 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने की मजबूत नींव रखी जा रही है।
ग्रीन हाइड्रोजन, अपतटीय पवन परियोजनाएं, पीएम कुसुम जैसी योजनाएं और ऊर्जा भंडारण तकनीक इस परिवर्तन की रीढ़ बन रही हैं। इसके साथ ही 2.4 लाख करोड़ रुपये की ट्रांसमिशन योजना से भारत के ऊर्जा गलियारों को पुनर्गठित किया जा रहा है, जो राजस्थान, गुजरात और लद्दाख जैसे राज्यों को देशभर के उपभोक्ताओं से जोड़ेगा। यह 200 गीगावाट से अधिक नई क्षमता को जन्म देगा। यानी भारत के विकास की दिशा अब स्थायित्व की ओर है, ठहराव की नहीं।
स्वच्छ ऊर्जा निवेश के लिए भारत बना आकर्षक गंतव्य
वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और आपूर्ति संकटों के बावजूद, भारत हर साल 15–25 गीगावाट की नई नवीकरणीय क्षमता जोड़ रहा है। जो दुनिया में सबसे तेज है। आज भारत स्वच्छ ऊर्जा निवेश के लिए सबसे आकर्षक गंतव्य बन चुका है, और दुनिया इसकी नीति-संगत स्थिरता को एक मॉडल के रूप में देख रही है।
नवीकरणीय ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनेगा भारत
भारत की असली कहानी अब सिर्फ "विस्तार" की नहीं, बल्कि “एकीकरण, विश्वसनीयता और लचीलापन” की है। यही वो मोड़ है जो भारत को नवीकरणीय ऊर्जा में न सिर्फ आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा नेतृत्व की दौड़ में सबसे आगे खड़ा करेगा। भारत की ग्रीन जर्नी अब परिपक्व हो चुकी है। यह अब स्पीड नहीं, स्थिरता की ताकत से चल रही है।
