TMC Split: पश्चिम बंगाल की राजनीतिक नब्ज पर पकड़, जन आंदोलन और हर चुनौती के सामने निर्भीक, बेधड़क और बेबाक होकर खड़े रहने के दम पर अपना राजनीतिक सफर तय करने वाली ममता बनर्जी के लिए पिछले महीने विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद का समय किसी राजनीतिक भूचाल से कम नहीं रहा है।
तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी (फोटो साभार: @AITCofficial)
ठीक एक महीने पहले ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का निर्विवाद चेहरा थीं और उनके पास एक मजबूत विधायी शक्ति थी, लेकिन भाजपा के हाथों मिली करारी चुनावी हार ने बंगाल में टीएमसी के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।
भवानीपुर में भी हो गई सेंधमारी
राजनीतिक रूप से लगा यह जोरदार झटका इसलिए भी कचोट देने वाला था, क्योंकि उन्हें भवानीपुर से अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी सुवेंदु अधिकारी से हार का सामना करना पड़ा, जबकि यह निर्वाचन क्षेत्र लंबे समय से उनका राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा था।
चुनाव नतीजों ने विधानसभा में टीएमसी की ताकत घटाकर महज 80 विधायकों तक सीमित कर दी, जिससे ममता बनर्जी को अभूतपूर्व रूप से कमजोर स्थिति में विपक्ष का नेतृत्व करना पड़ रहा है। राज्य में 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में टीएमसी के सदन में 215 विधायक निर्वाचित हुए थे। हालांकि, पिछले महीने हुए चुनाव में मिली करारी हार ने तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच टीएमसी के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है।
ममता ने पार्टी की स्थापना 1998 में की थी। टीएमसी के बागी विधायकों के एक समूह ने बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को 58 विधायकों के समर्थन पत्र सौंपे, जिसमें निष्कासित नेता ऋतब्रता बनर्जी को अपने विधायक दल का नेता बताया गया और विपक्ष के नेता पद पर दावा किया गया। ऋतब्रता ने दावा किया कि बागी गुट के समर्थन में दो अन्य विधायक भी हैं।
निष्कासन ने भड़काई विरोध की आग
कुछ ही दिन पहले टीएमसी ने ऋतब्रता बनर्जी और उनके साथी विधायक संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया था तथा उन पर संगठन को कमजोर करने का आरोप लगाया गया था। बगावत को शांत करने के बजाय इस निष्कासन ने आग में घी डालने का काम किया।
TMC ने ढहाया था 34 साल पुराना किला
बंगाल विधानसभा में टीएमसी का सफर शुरू में जितना शानदार रहा उसका अंत उतना ही भयावह स्थिति को दर्शाता है। वाम दल विरोधी लहर पर सवार टीएमसी ने 2011 में 184 सीट पर जीत दर्ज की थी और सहयोगियों के साथ मिलकर वाम मोर्चे के 34 साल के शासन का अंत किया था।
वर्ष 2016 में 211 सीट पर जीत हासिल कर टीएमसी ने अपना दबदबा कायम रखा और 2021 में ममता के नेतृत्व में विधानसभा की 294 सीट में से 215 पर अपना परचम फहराया था।
'दीदी' के पास अब क्या हैं विकल्प?
समाचार एजेंसी पीटीआई/भाषा के मुताबिक, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी के सामने अब एक ऐसी चुनौती है, जिसका सामना उन्होंने अपने लगभग तीन दशकों के सार्वजनिक जीवन में कभी नहीं किया। राजनीतिक विश्लेषक शुभमय मैत्रा ने कहा, "चुनावी हार के बाद पार्टी में फूट कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पार्टी का प्राथमिक उद्देश्य वाम मोर्चे को सत्ता से हटाना, 2011 के चुनाव में जीत के साथ ही पूरा हो गया था।"
शुभमय मैत्रा ने कहा, "टीएमसी का कोई वैचारिक आधार नहीं था और न ही राज्य के लिए कोई दीर्घकालिक विकास योजना। पार्टी के विधायकों के पास निजी हितों के अलावा कुछ भी नहीं बचा था।" टीएमसी ने पार्टी पर पकड़ मजबूत करने के प्रयास में कई अहम संगठनात्मक समितियों और अग्रिम इकाइयों को भंग कर दिया, जिसे व्यापक रूप से औपचारिक फूट को रोकने के अंतिम प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
ममता बनर्जी स्वयं भाजपा पर पार्टी में फूट डालने के लिए "धन, गिरफ्तारियों और धमकियों" का इस्तेमाल करने का आरोप लगा रही हैं। शुभमय मैत्रा ने कहा, "ममता बनर्जी के शानदार सार्वजनिक जीवन के बावजूद इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उनकी उम्र 70 वर्ष से अधिक है। इस उम्र में, पिछले चार दशकों में उन्होंने जिस जोश के साथ राजनीति में सक्रियता दिखाई, उसी जोश के साथ वापसी करना मुश्किल लगता है। बशर्ते कोई ऐसी राजनीतिक रूप से अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हो जाए जो उनकी वापसी का मार्ग प्रशस्त कर दे।" फिर भी, ममता के राजनीतिक करियर का अंत मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
