Diabetes and Constipation: डायबिटीज में ब्लड शुगर बढ़ने की बात आते ही ध्यान आमतौर पर आंखों, किडनी, दिल और पैरों पर जाता है। पेट की सेहत इस चर्चा में अक्सर पीछे छूट जाती है। कब्ज को भी लोग कम पानी पीने, गलत खानपान या सुस्त दिनचर्या से जोड़कर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन डायबिटीज के मरीज को नई कब्ज शुरू हो जाए, लंबे समय तक बनी रहे या सामान्य उपायों के बाद भी आराम न मिले, तो इसे मामूली पाचन समस्या मानना ठीक नहीं है।
डायबिटीज में कब्ज: क्या है दोनों प्रॉब्लम्स का आपस में कनेक्शन
लंबे समय तक बढ़ी हुई ब्लड शुगर पाचन तंत्र को नियंत्रित करने वाली नसों को प्रभावित कर सकती है। इसकी वजह से आंतों की चाल धीमी पड़ने लगती है। मल बड़ी आंत में ज्यादा समय तक रुका रहता है और उसमें मौजूद पानी अधिक मात्रा में सोख लिया जाता है। नतीजा होता है सख्त मल, पेट फूलना और शौच के समय जोर लगाना। विशेषज्ञों के अनुसार, डायबिटीज कब्ज को बढ़ा सकती है और लगातार कब्ज ब्लड शुगर संभालने की कोशिश को मुश्किल बना सकती है।
कब्ज और डायबिटीज का क्या संबंध है
CK Birla Hospital, Delhi में इंटरनल मेडिसिन विभाग में कंसल्टेंट डॉ. अमित प्रकाश सिंह बताते हैं कि कब्ज और डायबिटीज एक-दूसरे कनेक्टेड हैं। लंबे समय तक ब्लड शुगर बढ़ने पर आंतों की गति को नियंत्रित करने वाली नसों को नुकसान पहुंच सकता है। इससे मल को पाचन तंत्र से आगे बढ़ने में ज्यादा समय लगता है।
इस स्थिति को डायबिटिक ऑटोनॉमिक न्यूरोपैथी से जोड़कर देखा जा सकता है। इसमें शरीर के रेगुलर तौर पर अपनेआप चलने वाले सिस्टम की नसें प्रभावित होती हैं जिसमें दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर, पाचन और मूत्राशय का काम आदि शामिल हैं। पाचन तंत्र की नसों पर असर पड़ने से कब्ज, दस्त, पेट भरा लगना, मतली या भोजन पचने में देरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। NIDDK भी कब्ज को ऑटोनॉमिक न्यूरोपैथी से जुड़े पाचन लक्षणों में शामिल करता है।
हाई ब्लड शुगर से कब्ज क्यों बढ़ती है
कब्ज के पीछे केवल आंतों की धीमी चाल नहीं होती। लगातार बढ़ी हुई ब्लड शुगर के कारण शरीर पेशाब के रास्ते अतिरिक्त ग्लूकोज निकालने की कोशिश करता है। इससे पेशाब ज्यादा आ सकता है और शरीर में पानी की कमी होने लगती है। शरीर पहले ही डिहाइड्रेट हो तो मल और सख्त हो सकता है।
Kailash Hospital & Neuro Institute में सीनियर कंसल्टेंट–गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डॉ. अरुण अय्यर कहते हैं- आंतों की गति धीमी होने पर मल कोलन में अधिक समय तक रहता है। इस दौरान उससे ज्यादा पानी सोख लिया जाता है और कब्ज होने लगती है। हाई ब्लड शुगर के कारण पेशाब के रास्ते पानी अधिक निकलना स्थिति को और मुश्किल बना सकता है।
यानी डायबिटीज में कब्ज के पीछे दो स्थितियां एक साथ काम कर सकती हैं- नसों की गड़बड़ी से आंतों का धीमा होना और शरीर में पानी की कमी।
| कारण | शरीर में क्या होता है | दिखाई देने वाला असर |
|---|---|---|
| लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर | पाचन नियंत्रित करने वाली नसें प्रभावित हो सकती हैं | आंतों की गति धीमी |
| बार-बार पेशाब आना | शरीर से पानी ज्यादा निकल सकता है | मल सख्त और सूखा |
| कम शारीरिक गतिविधि | आंतों की प्राकृतिक हलचल कम होती है | पेट साफ होने में दिक्कत |
| भोजन में फाइबर की कमी | मल को पर्याप्त मात्रा और नमी नहीं मिलती | जोर लगाना पड़ता है |
| कुछ दवाएं | पाचन या आंतों की गति प्रभावित हो सकती है | कब्ज बढ़ सकती है |
क्या कब्ज से ब्लड शुगर भी बिगड़ सकती है
डायबिटीज और कब्ज का रिश्ता दोतरफा है। यदि पेट और आंतों से भोजन आगे बढ़ने की गति अनियमित हो जाए, तो पोषक तत्व और कार्बोहाइड्रेट कब अवशोषित होंगे, इसका अनुमान लगाना कठिन हो सकता है। इससे भोजन, डायबिटीज की दवा या इंसुलिन और ब्लड ग्लूकोज के बीच तालमेल प्रभावित हो सकता है।
डॉ. अमित प्रकाश सिंह के मुताबिक, कब्ज के कारण पेट में दर्द, भारीपन और बेचैनी हो सकती है। इससे मरीज कम खाना शुरू कर सकता है, चलना-फिरना घटा सकता है या तनाव में रह सकता है। ये सभी बातें अप्रत्यक्ष रूप से ब्लड शुगर नियंत्रण पर असर डाल सकती हैं।
डॉ. अरुण अय्यर भी बताते हैं कि लगातार कब्ज की वजह से भोजन के समय और शारीरिक गतिविधि की नियमितता बिगड़ सकती है। कुछ मामलों में पाचन में बदलाव के कारण दवाओं के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया भी पहले जैसी नहीं रहती। हालांकि हर मरीज में ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है। ब्लड शुगर में असामान्य उतार-चढ़ाव दिखे तो इसकी वजह स्वयं तय करने के बजाय डॉक्टर से बात करनी चाहिए।
पेट खाली होने की गंभीर देरी को गैस्ट्रोपेरेसिस कहा जाता है। डायबिटीज इसका एक जाना-पहचाना कारण है और इससे ब्लड ग्लूकोज संभालना मुश्किल हो सकता है। मगर केवल कब्ज होने का मतलब यह नहीं कि मरीज को गैस्ट्रोपेरेसिस है; इसकी पुष्टि चिकित्सकीय जांच से होती है। NIDDK के अनुसार, ब्लड ग्लूकोज और पेट खाली होने की रफ्तार एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं।
डायबिटीज में कब्ज की पहचान कैसे करें
रोज शौच न होना अकेले कब्ज की पहचान नहीं है। हर व्यक्ति की सामान्य दिनचर्या अलग हो सकती है। इन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए:
- सप्ताह में तीन बार से कम मल त्याग होना
- मल का सूखा, सख्त या गांठदार होना
- शौच के समय बहुत जोर लगाना
- पेट साफ न होने का एहसास बना रहना
- पेट में भारीपन, गैस या दर्द होना
- शौच की इच्छा होने के बावजूद मल न निकलना
अगर पहले पेट नियमित साफ होता था और अब अचानक कब्ज रहने लगी है, तो इस बदलाव को भी गंभीरता से लेना चाहिए।
डायबिटीज में कब्ज से बचने के लिए क्या खाएं
कब्ज से बचाव में फाइबर की बड़ी भूमिका है। डॉ. अमित प्रकाश सिंह रोज लगभग 25 से 35 ग्राम फाइबर लेने की सलाह देते हैं। अलग-अलग स्वास्थ्य दिशानिर्देशों में उम्र और लिंग के अनुसार मात्रा बदल सकती है; NIDDK वयस्कों के लिए रोज 22 से 34 ग्राम फाइबर बताता है। फाइबर को अचानक बहुत ज्यादा बढ़ाने से गैस और पेट फूल सकता है, इसलिए इसे धीरे-धीरे बढ़ाना बेहतर रहता है। NIDDK के कब्ज संबंधी पोषण दिशा-निर्देश भी यही सलाह देते हैं।
भोजन में इन चीजों को जगह दी जा सकती है:
- साबुत अनाज, दलिया और ओट्स
- दाल, चना, राजमा और दूसरी फलियां
- हरी सब्जियां और सलाद
- अमरूद, नाशपाती, संतरा या छिलके वाला सेब
- अलसी या चिया सीड्स की डॉक्टर अथवा डाइटिशियन द्वारा बताई मात्रा
- पर्याप्त पानी और बिना चीनी वाले तरल पदार्थ
फल का जूस पीने के बजाय साबुत फल चुनना ज्यादा अच्छा है, क्योंकि उसमें फाइबर रहता है। हालांकि डायबिटीज में फल की मात्रा और समय व्यक्ति के ग्लूकोज स्तर तथा उपचार के अनुसार तय होना चाहिए।
कब्ज से राहत के लिए ये आदतें अपनाएं
खानपान के साथ रोजमर्रा की कुछ छोटी आदतें भी असर दिखा सकती हैं:
- प्यास लगने का इंतजार किए बिना नियमित अंतराल पर पानी पिएं। किडनी या दिल की बीमारी में तरल की मात्रा डॉक्टर से पूछें।
- रोज टहलें या अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार सक्रिय रहें।
- शौच की इच्छा को देर तक रोककर न रखें।
- नाश्ते या भोजन के बाद कुछ समय आराम से टॉयलेट जाने की आदत बनाएं।
- फाइबर बढ़ाने के साथ पानी भी बढ़ाएं, अन्यथा कब्ज और बिगड़ सकती है।
- ब्लड शुगर की नियमित निगरानी करें और दवाएं समय पर लें।
- अपने आप लंबे समय तक लैक्सेटिव, हर्बल चूर्ण या पेट साफ करने वाली दवा न लें।
कब्ज में तुरंत डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए
डॉ. अरुण अय्यर के अनुसार, डायबिटीज के मरीज में नई कब्ज शुरू होना या पर्याप्त पानी और फाइबर लेने के बाद भी समस्या बने रहना जांच की जरूरत का संकेत है। यह खराब ग्लाइसेमिक कंट्रोल, दवा के असर या पाचन तंत्र की नसों में गड़बड़ी से जुड़ा हो सकता है।
इन लक्षणों के साथ देर न करें:
- मल में खून या मलद्वार से रक्तस्राव
- लगातार या तेज पेट दर्द
- उल्टी अथवा बुखार
- गैस भी पास न होना
- बिना कोशिश तेजी से वजन घटना
- पेट बहुत ज्यादा फूलना
- कब्ज के साथ ब्लड शुगर में असामान्य उतार-चढ़ाव
इन संकेतों में घरेलू नुस्खों के भरोसे रहना नुकसानदेह हो सकता है। NIDDK भी रक्तस्राव, लगातार पेट दर्द, उल्टी, बुखार और बिना कारण वजन घटने को तत्काल चिकित्सा सलाह लेने वाले संकेत मानता है।
हालांकि इसके साथ ये भी ध्यान रखें कि कब्ज हर बार डायबिटिक न्यूरोपैथी का प्रमाण नहीं होती। कम पानी, कम फाइबर, निष्क्रियता, थायरॉइड की समस्या या कुछ दवाएं भी इसकी वजह बन सकती हैं। फिर भी डायबिटीज के मरीज के लिए पेट की बदलती आदत शरीर का महत्वपूर्ण संकेत हो सकती है। समय पर ब्लड शुगर नियंत्रित करना, पर्याप्त फाइबर और पानी लेना तथा जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से जांच कराना ही बेहतर रास्ता है।
