South India Language Controversy: दक्षिण भारतीय राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु में थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला (Three-Language Formula) या त्रिभाषा सूत्र का विरोध कोई नया राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि यह एक बेहद संवेदनशील भाषाई, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मुद्दा है।जब भी देश में शिक्षा या प्रशासनिक स्तर पर भाषाओं के तालमेल की बात आती है, तो 'त्रिभाषा सूत्र' और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है।
त्रिभाषा सूत्र का विरोध कोई नया राजनीतिक विवाद नहीं (AI Image)
विशेषकर तमिलनाडु शुरू से ही केंद्र सरकार की इस नीति के खिलाफ ढाल बनकर खड़ा रहा है।राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है।
आखिर क्या है यह त्रिभाषा सूत्र? (What is 3 Language Formula)
त्रिभाषा सूत्र की शुरुआत 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत की गई थी, जिसे बाद में 1986 और हालिया NEP 2020 में भी दोहराया गया। इसका मुख्य उद्देश्य देश के छात्रों को बहुभाषी बनाना और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना था।
इस फॉर्मूले के तहत स्कूलों में तीन भाषाएं पढ़ाई जानी अनिवार्य हैं-
पहली भाषा: मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा (जैसे तमिलनाडु में तमिल, पंजाब में पंजाबी)
दूसरी भाषा: हिंदी भाषी राज्यों में: अंग्रेजी या कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा
गैर-हिंदी भाषी राज्यों में: हिंदी या अंग्रेजी।
तीसरी भाषा-
हिंदी भाषी राज्यों में: अंग्रेजी या कोई आधुनिक भारतीय भाषा (जो दूसरी भाषा न हो)।
गैर-हिंदी भाषी राज्यों में: अंग्रेजी या कोई आधुनिक भारतीय भाषा (जो दूसरी भाषा न हो)।
आखिर दक्षिण के राज्य क्यों करते हैं इसका विरोध?
दक्षिण भारत के राज्यों (विशेषकर तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश) का विरोध नीति से ज्यादा उसके असंतुलित क्रियान्वयन को लेकर है। इसके पीछे निम्नलिखित तर्क हैं-
'हिंदी थोपने' का डर (Fear of Hindi Imposition)
दक्षिण के राज्यों का मानना है कि त्रिभाषा सूत्र के बहाने केंद्र सरकार गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर पिछले दरवाजे से हिंदी थोपना चाहती है। उनका तर्क है कि यदि कोई छात्र तमिल और अंग्रेजी पढ़ रहा है, तो उसे तीसरी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ने के लिए मजबूर क्यों किया जाए?
एकतरफा बोझ (One-sided Burden)
दक्षिण के नीति निर्माताओं का आरोप है कि यह फॉर्मूला उत्तर भारत के राज्यों में ईमानदारी से लागू नहीं होता। उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों (जैसे यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश) में छात्र पहली भाषा हिंदी, दूसरी अंग्रेजी और तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत या उर्दू चुन लेते हैं। वे दक्षिण भारत की भाषाएं (जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़ या मलयालम) नहीं सीखते। ऐसे में दक्षिण के छात्रों पर तीन भाषाएं (क्षेत्रीय, अंग्रेजी और हिंदी) सीखने का अतिरिक्त बोझ पड़ता है, जबकि उत्तर के छात्र दो ही मुख्य लिपियों (देवनागरी और रोमन) में सिमट कर रह जाते हैं।
तमिलनाडु का '2-भाषा मॉडल' क्या है? (Tamilnadu Two-Language Policy)
तमिलनाडु भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने कानूनी तौर पर त्रिभाषा सूत्र को खारिज कर दिया है और वहां 'द्विभाषा सूत्र' (Two-Language Formula) लागू है। तमिलनाडु के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में केवल दो ही भाषाएं पढ़ाई जाती हैं। पहली- तमिल (मातृभाषा) और दूसरी अंग्रेजी (अंतर्राष्ट्रीय भाषा) यानी वहां तीसरी भाषा के रूप में हिंदी या किसी अन्य भाषा को पाठ्यक्रम में अनिवार्य स्थान नहीं दिया गया है।
जान लें कब हुई थी शुरुआत?
साल 1968 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री और डीएमके (DMK) के संस्थापक सी.एन. अन्नादुरई (C.N. Annadurai) ने राज्य विधानसभा में एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर त्रिभाषा सूत्र को पूरी तरह से राज्य से बाहर कर दिया था और दो-भाषा नीति को कानूनी अमलीजामा पहनाया था। तब से लेकर आज तक, चाहे एआईएडीएमके (AIADMK) सत्ता में रहे या डीएमके (DMK),तमिलनाडु इस नीति पर अडिग है।
1965 का हिंसक हिंदी विरोधी आंदोलन
इस विवाद की जड़ें आज की राजनीति में नहीं, बल्कि आजादी के समय के इतिहास में हैं। संविधान का अनुच्छेद 343- भारतीय संविधान में प्रावधान था कि आजादी के बाद शुरुआती 15 साल (यानी 1965 तक) अंग्रेजी आधिकारिक भाषा बनी रहेगी, जिसके बाद हिंदी पूरी तरह उसकी जगह ले लेगी। जैसे ही 1965 की समयसीमा नजदीक आई, तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। छात्र सड़कों पर उतर आए। जनवरी-फरवरी 1965 में यह आंदोलन हिंसक हो गया, जिसमें कई लोगों की जान गई और कुछ छात्रों ने आत्मदाह तक कर लिया।
फिर आया प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आश्वासन
आंदोलन की उग्रता को देखते हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (और बाद में लाल बहादुर शास्त्री) ने दक्षिण भारत को आश्वासन दिया कि 'जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे, तब तक अंग्रेजी का उपयोग आधिकारिक भाषा के रूप में जारी रहेगा।' इसी आश्वासन को कानूनी रूप देने के लिए 'आधिकारिक भाषा अधिनियम' में संशोधन किया गया।
वर्तमान विवाद क्या है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में जब एक बार फिर तीन भाषाओं के विकल्प को प्रमोट किया गया, तो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इसका कड़ा विरोध किया। तमिलनाडु का कहना है कि वे किसी भाषा (हिंदी) के दुश्मन नहीं हैं। यदि कोई छात्र स्वेच्छा से हिंदी सीखना चाहता है, तो कई निजी संस्थान (जैसे दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा) मौजूद हैं, जहां लाखों बच्चे हिंदी सीखते हैं। लेकिन इसे सरकारी स्तर पर स्कूली शिक्षा में अनिवार्य (Mandatory) बनाना स्वीकार्य नहीं होगा।थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला बनाम टू-लैंग्वेज फॉर्मूला की यह जंग सिर्फ अक्षरों की नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पहचान, सांस्कृतिक गौरव और संघीय ढांचे के सम्मान की है।
