Houthis attack on Saudi Arab: यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी अरब पस्त हो गया है। सऊदी अरब में तैनात दुनिया की एक से बढ़कर एक वायु रक्षा प्रणालियां इन हमलों को पूरी तरह से रोक नहीं पाईं। सुरक्षा पर जब खतरा पैदा हुआ तो क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS को बंकर वाले अपने महलों में शरण लेनी पड़ी। सऊदी अरब में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन यहां तक कि चीन की वायु रक्षा प्रणालियां तैनात हैं, फिर भी रियाद के इंटरनेशनल एयरपोर्ट सहित बंदरगाहों और तेल संयंत्रों पर हमले हुए। ये वायु रक्षा प्रणालियां इन हमलों को पूरी तरह से रोक नहीं पाईं। सवाल है कि हूतियों के पास आखिर ऐसा क्या है कि ये एयर डिफेंस सिस्टम एक तरीके से नाकाम साबित हुए। दूसरा सवाल है कि आखिर हूती सऊदी अरब के पोर्ट और एयरपोर्ट को ही निशाना क्यों बना रहे हैं। इन्हीं का जवाब हम यहां जानने की कोशिश करेंगे-
सऊदी अरब की ताकत उसकी सेना नहीं बल्कि उसका तेल और अथाह पैसा है। हूती ये बात जानते हैं और इसीलिए वे सऊदी अरब के पेट पर चोट कर रहे हैं। पेट पर चोट पड़ने से चीख निकलेगी। सऊदी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तेल निर्यात पर टिकी है। बंदरगाह, रिफाइनरी और भंडारण केंद्र उसकी सबसे संवेदनशील कड़ी हैं। यानबू, रास तनूरा और जेद्दा जैसे ठिकानों पर हमला सीधे सऊदी कमाई और वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर डालता है।
कम खर्च, बड़ा संदेश : अभा, जजान और नजरान जैसे हवाई अड्डे यमन सीमा के पास हैं। वहां छोटा ड्रोन भी उड़ानें रुकवा देता है, डर फैलाता है और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बनाता है। हूती इसे दबाव की राजनीति के रूप में इस्तेमाल करते हैं ताकि सऊदी अरब बातचीत की मेज पर आए और नाकेबंदी ढीली करे।
रणनीतिक छवि: सऊदी अरब अपने 'विजन 2030' के तहत पर्यटन, निवेश और खेल आयोजनों में अरबों डॉलर लगा रहा है। 2022 में जेद्दा में फॉर्मूला वन रेस के दौरान अरामको डिपो पर हमले ने दिखाया कि हूती वैश्विक मंच का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
ड्रोन और मिसाइल हमले रोक क्यों नहीं पा रहा सऊदी?
सऊदी अरब ने कई हमले नाकाम किए हैं, लेकिन सौ फीसदी सुरक्षा असंभव है। इसके मुख्य कारण हैं-विशाल भूगोल
सऊदी अरब का क्षेत्रफल बहुत बड़ा है और यमन के साथ लंबी सीमा लगती है। हर तेल ठिकाना, शहर और बंदरगाह एक साथ ढका नहीं जा सकता।
houthis
कम ऊंचाई और छोटा आकार
हूतियों के ड्रोन और क्रूज मिसाइलें बहुत नीचे उड़ती हैं और उनका रडार सिग्नल बेहद छोटा होता है। ये पारंपरिक रडार की पकड़ से बच निकलते हैं। 2019 का अबकैक-खुरैस हमला इसका उदाहरण है, जिसमें हमलावर ड्रोन और मिसाइलें सुरक्षा घेरे को चकमा देकर अंदर पहुंच गए।
झुंड वाली रणनीति
एक साथ कई ड्रोन और मिसाइलें दागने से रक्षा प्रणाली 'ओवरलोड' हो जाती है। कुछ को रोकने पर भी एक-दो निकल जाते हैं। पहले बड़ी संख्या में ड्रोन से हमले, फिर क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछार। यानी लगातार होने वाले हवाई हमलों को पूरी तरह से रोक पाना किसी भी एयर डिफेंस के लिए संभव नहीं है। कोई न कोई ड्रोन या मिसाइल अपने लक्ष्य तक पहुंच ही सकती है।
लागत का असंतुलन
यह सबसे बड़ा पेच है। एक हमलावर ड्रोन कुछ हजार डॉलर का होता है, जबकि पैट्रियट जैसी इंटरसेप्टर मिसाइल की एक यूनिट कई लाख डॉलर से लेकर करीब 30-40 लाख डॉलर तक की पड़ती है। सस्ते हमले को महंगे हथियार से रोकना लंबे समय में टिकाऊ नहीं है।
बाहरी आपूर्ति का सहारा
हूतियों को ईरान से तकनीकी मदद मिलने के आरोप लगते रहे हैं (ईरान इन आरोपों को खारिज करता है)। इससे उनकी ड्रोन और मिसाइल क्षमता लगातार बढ़ी है।
कई देशों के एयर डिफेंस, फिर भी...
सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े हथियार खरीदारों में है और उसका रक्षा बजट सालाना 60 अरब डॉलर से ऊपर रहता है। उसके पास अमेरिकी पैट्रियट और THAAD जैसी प्रणालियां हैं, फ्रांसीसी क्रोटाल/शाहीन मिसाइलें हैं, और यूरोपीय लड़ाकू विमान जैसे ब्रिटिश टाइफून भी उसके बेड़े में हैं। चीनी ड्रोन और अन्य तकनीक की खरीद भी चर्चा में रही है। समस्या यह है कि अलग-अलग देशों की प्रणालियां अलग-अलग दौर और डिजाइन की हैं। उनके बीच पूरी तरह एकीकृत कमांड-एंड-कंट्रोल नेटवर्क बनाना कठिन है। इसके अलावा पैट्रियट मूलतः बैलिस्टिक मिसाइलों और विमानों के लिए बनी प्रणाली है, छोटे और धीमे ड्रोन उसका प्राथमिक लक्ष्य नहीं थे।
क्या ये एयर डिफेंस नाकाफी साबित हुए?
पूरी तरह नाकाफी कहना गलत होगा। सऊदी दावों के मुताबिक रियाद, जेद्दा और अन्य इलाकों की ओर दागी गई हजारों मिसाइलों और ड्रोनों में से बड़ी संख्या को हवा में ही नष्ट किया गया। लेकिन 'ज्यादातर रोकना' और 'सबको रोकना' में बहुत फर्क है। तेल सुविधाओं पर एक सफल हमला भी भारी पड़ता है।
नाकामी के तीन ठोस कारण दिखते हैं:
छोटे ड्रोन के लिए सस्ती और तेज प्रणालियां (जैसे लेजर, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, तोप आधारित सिस्टम) पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं थीं। कम ऊंचाई वाले खतरों के लिए अलग तरह के रडार और सेंसर चाहिए। अलग-अलग स्रोतों की प्रणालियों के बीच तालमेल की कमी। इसी सीख के बाद सऊदी अरब ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया जैसे साझेदारों के साथ नई प्रणालियों और घरेलू उत्पादन पर जोर दिया है।
houthis
सऊदी अरब को कितना नुकसान?
सितंबर 2019 में अबकैक और खुरैस पर हमले से सऊदी उत्पादन अस्थायी रूप से करीब आधा घट गया, यानी लगभग 57 लाख बैरल प्रतिदिन, जो वैश्विक आपूर्ति का करीब 5 प्रतिशत था। तेल की कीमतों में एक दिन में रिकॉर्ड उछाल आया। पोर्ट, डिपो और हवाई अड्डों की मरम्मत, उड़ानों के रद्द होने और संचालन में रुकावट से सीधा आर्थिक नुकसान हुआ। सुरक्षा और बीमा की लागत भी बढ़ी। हमलों में आम नागरिक घायल हुए और कुछ की जान गई, खासकर सीमावर्ती इलाकों में। सबसे बड़ा असर साख पर पड़ा। जिस देश को पर्यटन और निवेश का नया केंद्र बनाने की कोशिश है, वहां हवाई अड्डों पर हमले निवेशकों के भरोसे को चोट पहुंचाते हैं।
हूतियों पर केवल हवाई हमले काफी नहीं
हूती हमलों की कहानी असल में युद्ध की एक शृंखला की तरह है। एक तरफ अरबों डॉलर की रक्षा प्रणालियां हैं, दूसरी तरफ सस्ते ड्रोन और मिसाइलें, और जीत 'संख्या' से नहीं बल्कि 'असर' से तय होती है। सऊदी अरब के लिए सबक साफ है कि सिर्फ महंगे हथियार खरीदना सुरक्षा की गारंटी नहीं, बल्कि एकीकृत, बहुस्तरीय और किफायती रक्षा के साथ कूटनीतिक समाधान ही टिकाऊ रास्ता है। दुश्मन को पूरी तरह से काबू केवल उस पर हवाई हमलों से नहीं पाया जा सकता है। हवाई हमलों से उसका नुकसान हो सकता है लेकिन उसका पूरी तरह से सफाया नहीं हो सकता। ईरान पर अमेरिका और इजराइल ने बहुत सारी मिसाइलें दागीं, उस पर बम गिराए। इन हमलों से ईरान को नुकसान जरूर पहुंचा लेकिन उसकी लड़ाकू क्षमता पूरी तरह से खत्म नहीं हुई। वह आज भी अपने पैरों पर खड़ा है और आक्रामक कार्रवाइयों का जवाब दे रहा है। सऊदी अरब यदि वास्तव में हूतियों को हराना और उन्हें खत्म करना चाहता है तो उसे आमने-सामने की पारंपरिक जंग लड़नी पड़ेगी।
