सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के कामकाज को चुनौती, मुख्य चुनाव आयुक्त पर सामूहिक शक्तियों के कथित एकतरफा इस्तेमाल का आरोप; फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने और ECINET-ERONET डेटाबेस की कार्यप्रणाली पर भी उठाए सवाल, टाइम्स नाउ नवभारत के पास याचिका की पूरी कॉपी मौजूद है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और 12 अन्य विपक्षी नेताओं ने विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) के दौरान चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई करेगा।
CJI की पीठ करेगी सुनवाई
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी। 12 अक्टूबर को दाखिल इस रिट याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग की सामूहिक शक्तियों का कथित तौर पर एकतरफा और मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया। याचिका में आयोग के फैसलों से जुड़े रिकॉर्ड, बैठकों के मिनट्स, फाइल नोटिंग और अन्य दस्तावेज अदालत में पेश करने की मांग की गई है। याचिका का दायरा केवल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण तक सीमित नहीं है। इसमें वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में कथित बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया, पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने की व्यवस्था, ECINET और ERONET डेटाबेस की सुरक्षा तथा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से जुड़ी प्रक्रियाओं की स्वतंत्र समीक्षा की मांग भी शामिल है।
राहुल गांधी और अन्य याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दाखिल की है। उनका कहना है कि हर पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इन मुद्दों की न्यायिक जांच जरूरी है।
आखिरी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने याचिका क्यों दाखिल की?
याचिका के मुताबिक, चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके अधिकारों का इस्तेमाल आयोग को एक संस्था के रूप में करना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि SIR से जुड़े कई फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी, मंजूरी या सहमति के बिना लिए या जारी किए। याचिका में द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने लगभग दस महीने की अवधि में कम से कम 14 मौकों पर मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, नाम बहाल करने और चुनावी आंकड़ों तक पहुंच से संबंधित फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन आरोपों की सच्चाई संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 के आदेश के जरिए देशभर में SIR शुरू करने का निर्णय लेने की बात कही थी। लेकिन सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगे गए दस्तावेजों के जवाब में आयोग के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी ने 27 अगस्त 2025 को प्रकाशित आदेश उपलब्ध कराया और कहा कि अन्य जानकारी उपलब्ध नहीं है। प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के जवाब में यह भी दर्ज होने का दावा किया गया है कि आयोग ने तब तक देशव्यापी SIR शुरू करने का कोई निर्णय नहीं लिया था। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, आयोग के आदेश और RTI के जवाबों के बीच यह विरोधाभास महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। इसलिए उन्होंने 24 जून 2025 को देशव्यापी SIR शुरू करने के निर्णय से संबंधित पूरी फाइल पेश करने की मांग की है। हालांकि, याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य केवल आरोपों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना नहीं, बल्कि संबंधित रिकॉर्ड की जांच के जरिए यह पता लगाना है कि फैसले संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार लिए गए थे या नहीं।
मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों पर क्या सवाल उठाए गए हैं?
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बहुसदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त को अन्य चुनाव आयुक्तों से ऊपर ऐसी स्थिति प्राप्त नहीं है कि वे आयोग के सामूहिक अधिकारों का अकेले इस्तेमाल कर सकें। इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ का उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार, 2023 के कानून की धारा 18 आयोग के कामकाज में सर्वसम्मति से निर्णय लेने और ऐसा संभव नहीं होने पर बहुमत के आधार पर फैसला करने की व्यवस्था करती है। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि SIR से संबंधित विवादित फैसलों की फाइलें, एजेंडा, बैठक के मिनट्स, नोटिंग और दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां पेश कराई जाएं। अदालत यह जांच करे कि फैसले आयोग ने सामूहिक रूप से लिए थे या किसी सदस्य ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय लिया।
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याचिका में कहा गया है कि यदि किसी फैसले के बारे में यह पाया जाता है कि उसे कानूनी अधिकार के बिना लिया गया था, तो उसे निरस्त करने या रद्द करने का निर्देश दिया जाए।
फॉर्म-6 में बदलाव किसने किया? बैठक के मिनट्स और रिकॉर्ड की मांग
याचिका का एक प्रमुख हिस्सा ऑनलाइन फॉर्म-6 में कथित बदलाव से जुड़ा है। फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। याचिका के मुताबिक, जुलाई 2026 में ECINET पर उपलब्ध ऑनलाइन फॉर्म-6 में एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। इसके तहत आवेदक या उसके रिश्तेदारों के किसी पिछली SIR वाली मतदाता सूची में शामिल होने से संबंधित जानकारी मांगे जाने का आरोप है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फॉर्म-6 का निर्धारित प्रारूप निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत तय है। इसलिए संबंधित नियमों में विधिवत संशोधन किए बिना उसमें अतिरिक्त शर्त जोड़ना कानूनी सवाल खड़े करता है। याचिका में दावा किया गया है कि इस बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्तों ने भी आपत्तियां उठाई थीं।सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2026 को SIR से संबंधित एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया था कि उसने संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी है। इस पृष्ठभूमि में याचिकाकर्ताओं ने फॉर्म-6 को नियमों में निर्धारित प्रारूप के अनुरूप रखने की मांग की है। याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि किसी अतिरिक्त शर्त के कारण पात्र नागरिक, खासकर पहली बार मतदाता बनने वाले लोग, पंजीकरण से वंचित होते हैं तो इससे उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए याचिका में केवल यह पता लगाने की मांग नहीं है कि बदलाव किसने किया, बल्कि आयोग के भीतर संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रिया और उसके आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच कराने पर भी जोर दिया गया है।
ECINET और ERONET डेटाबेस की स्वतंत्र जांच क्यों जरूरी बताई?
याचिका में चुनाव आयोग के ECINET और ERONET डेटाबेस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची के आंकड़ों तक पहुंच, उनमें बदलाव करने की अनुमति और गलत तरीके से हटाए गए नामों को बहाल करने की व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी हो सकती है। याचिका के मुताबिक, आयोग के भीतर इस बात को लेकर भी चिंता जताई गई थी कि मतदाता डेटाबेस तक किसकी पहुंच है और उसमें किए गए बदलावों का पूरा ऑडिट उपलब्ध है या नहीं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आयोग की ओर से गठित आंतरिक समीक्षा समिति स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट का विकल्प नहीं हो सकती। उन्होंने डेटाबेस तक पहुंच के अधिकार, उसमें किए गए बदलावों, हटाए गए नामों के रिकॉर्ड और पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने की तकनीकी व्यवस्था की स्वतंत्र जांच की मांग की है।याचिका में आरोप है कि यदि सॉफ्टवेयर में गलत तरीके से हटाए गए नामों को बहाल करने की प्रभावी सुविधा नहीं है, तो पात्र मतदाताओं को गंभीर नुकसान हो सकता है। इस मुद्दे को चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता से जोड़कर देखा गया है।
मतदाता सूची से नाम हटाने पर क्या आपत्ति है?
याचिका में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने एक अन्य लंबित मामले का हवाला देते हुए दावा किया है कि SIR के दौरान विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 13 करोड़ नामों को हटाने की प्रक्रिया से संबंधित सवाल उठे हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी दलील दी है कि चुनाव आयोग का कहना है कि यह संख्या अंतिम रूप से हटाए गए मतदाताओं की नहीं, बल्कि मसौदा सूची के चरण में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट के रूप में चिह्नित मतदाताओं की है। याचिका में फॉर्म-7 के जरिए थोक में आपत्तियां दाखिल किए जाने, कथित तौर पर गलत या फर्जी नामों के इस्तेमाल और महिलाओं तथा कुछ समुदायों को निशाना बनाए जाने की आशंकाएं भी उठाई गई हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पात्र मतदाताओं को पर्याप्त नोटिस और सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने मांग की है कि SIR के दौरान हटाए गए सभी मतदाताओं का बूथवार ब्योरा प्रकाशित किया जाए। इसमें नाम हटाने का कारण और उम्र तथा लिंग के आधार पर आंकड़ों का विवरण भी शामिल हो। साथ ही, जिन लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, उन्हें मतदाता सूची में दोबारा शामिल करने की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।
पंजाब में मतदाता सूची का उदाहरण देकर क्या कहा गया?
याचिका में पंजाब की मसौदा मतदाता सूची के आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। इसके मुताबिक, जून 2026 में लगभग 2.14 करोड़ मतदाताओं के मुकाबले 13 अगस्त 2026 को प्रकाशित मसौदा सूची में संख्या घटकर करीब 1.93 करोड़ रह गई थी। याचिकाकर्ताओं ने लगभग 20.66 लाख नामों की कमी का हवाला दिया है। इसके अतिरिक्त, लगभग 12.80 लाख मतदाताओं के नाम 2003 के बाद तैयार की गई मतदाता सूचियों से मैप नहीं हो पाने का उल्लेख किया गया है। याचिका के मुताबिक, ऐसे मतदाताओं को अपनी पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज देने थे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि नाम हटाने की प्रक्रिया में गलतियां होती हैं और उन्हें सुधारने या पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने का प्रभावी तंत्र नहीं होता, तो नागरिक चुनाव से पहले अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात है कि याचिका में दिए गए ये आंकड़े और आरोप याचिकाकर्ताओं के दावे हैं। इनका अंतिम सत्यापन न्यायिक जांच या संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड से होना बाकी है।
क्या विपक्ष ने SIR को अवैध घोषित करने की मांग की है?
याचिका में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे SIR की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के फैसले को दोबारा चुनौती नहीं दे रहे हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता को बरकरार रखा था। मौजूदा याचिका के अनुसार, सवाल यह है कि SIR लागू करते समय क्या चुनाव आयोग ने संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया तथा क्या मतदाताओं को वे सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराए गए, जिनका उल्लेख अदालत ने किया था। इसलिए याचिकाकर्ताओं का मुख्य जोर SIR के कार्यान्वयन, चुनाव आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया, डेटाबेस की विश्वसनीयता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा पर है।
EVM की स्वतंत्र समीक्षा की मांग भी शामिल
याचिका में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों यानी EVM के इस्तेमाल और उनकी तकनीकी व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि EVM से संबंधित नीतियों, प्रक्रियाओं, प्रोटोकॉल, तकनीकी डिजाइन और सिस्टम आर्किटेक्चर की समीक्षा वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के संदर्भ में की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि स्वतंत्र समीक्षा से चुनाव प्रक्रिया में जनता का भरोसा बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसके लिए याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की गई है। समिति में तकनीकी विशेषज्ञों और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों को शामिल करने का प्रस्ताव है। इस समिति से मतदाता सूची में हुए बदलावों और डेटाबेस की जांच के साथ EVM से संबंधित व्यवस्थाओं की समीक्षा कराने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट से कौन-कौन सी राहत मांगी गई है?
याचिका के प्रार्थना वाले हिस्से में कई अलग-अलग राहतों की मांग की गई है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: सभी रिकॉर्ड पेश कराने का निर्देश SIR से जुड़े विवादित फैसलों की पूरी फाइलें, एजेंडा, बैठक के मिनट्स, नोटिंग, चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां और ECINET-ERONET के एक्सेस लॉग अदालत में पेश कराए जाएं। 24 जून 2025 को देशव्यापी SIR शुरू करने के निर्णय से जुड़ी पूरी फाइल भी मांगी गई है।
फैसलों की वैधता की जांच
यह जांच की जाए कि विवादित फैसले संविधान के अनुच्छेद 324, 2023 के कानून की धारा 18 और सुप्रीम कोर्ट के टी.एन. शेषन फैसले के अनुरूप लिए गए थे या नहीं। अधिकार के बिना लिए गए फैसलों को निरस्त करने की मांग की गई है। जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई यदि संवैधानिक या कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन पाया जाता है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए।
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आगे के फैसलों में पारदर्शिता
याचिका के लंबित रहने के दौरान SIR से संबंधित प्रत्येक निर्णय कानून के अनुसार और विधिवत दर्ज प्रक्रिया के तहत लिया जाए।
फॉर्म-6 को निर्धारित प्रारूप में रखने का निर्देश
नियमों में विधिवत संशोधन होने तक ऑनलाइन फॉर्म-6 को निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के निर्धारित प्रारूप के अनुरूप रखा जाए।
स्वतंत्र जांच समिति का गठन
सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में तकनीकी विशेषज्ञों और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों की समिति बनाई जाए। यह समिति मतदाता सूची से हटाए गए नामों, डेटाबेस तक पहुंच और उसमें किए गए बदलावों की स्वतंत्र जांच करे तथा EVM से संबंधित तकनीकी प्रक्रियाओं की समीक्षा भी करे।
बूथवार जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश
SIR में हटाए गए सभी मतदाताओं के नाम, नाम हटाने के कारण और उम्र तथा लिंग के आधार पर ब्योरा प्रकाशित किया जाए। पात्र पाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने के लिए प्रभावी व्यवस्था भी बनाई जाए।
बिना नोटिस नाम न हटाने का निर्देश
किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे नोटिस और सुनवाई का उचित अवसर दिया जाए। पंजाब और अन्य चुनाव वाले राज्यों में पात्र लोगों को कानून के तहत निर्धारित अंतिम तारीख तक मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का अवसर मिले।
देशभर में SIR पर अंतरिम रोक
याचिका पर सुनवाई और अंतिम निर्णय होने तक विभिन्न राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया को निलंबित करने का अंतरिम निर्देश दिया जाए।
अन्य उचित आदेश देने की मांग
चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता और प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए अदालत आवश्यक समझे तो अन्य आदेश भी पारित करे।
क्या याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग की गई है?
याचिका में स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त या किसी अन्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग करना नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने संबंधित फैसलों और प्रक्रियाओं की जांच, रिकॉर्ड की उपलब्धता, कानून के पालन और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दिया है। इसलिए मामले का मूल सवाल यह है कि SIR से जुड़े विवादित निर्णय किस प्रक्रिया से लिए गए, क्या वे आयोग के सामूहिक निर्णय थे और क्या मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने के दौरान निर्धारित कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन किया गया।
राहुल गांधी और 12 अन्य विपक्षी नेताओं की याचिका चुनाव आयोग के निर्णय लेने के तरीके, फॉर्म-6 में कथित बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया और चुनावी डेटाबेस की विश्वसनीयता को अदालत की जांच के दायरे में लाना चाहती है। याचिकाकर्ताओं ने केवल दस्तावेज पेश करने की मांग नहीं की है, बल्कि स्वतंत्र ऑडिट, पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने की व्यवस्था और सुनवाई पूरी होने तक SIR पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की है। अब इन मांगों पर अदालत क्या रुख अपनाती है, यह आगे की सुनवाई और संबंधित पक्षों के जवाबों पर निर्भर करेगा।
