भारतीय वायुसेना (IAF) की ताकत को और अधिक मजबूती देने के लिए रक्षा मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। इसके तहत वायुसेना को अपना पहला स्वदेशी और समर्पित मिलिट्री कम्युनिकेशंस सैटेलाइट 'जीसैट-7C' (GSAT-7C) मिलने जा रहा है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने 15 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु की न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के साथ सैटेलाइट के डिजाइन, विकास और निर्माण के लिए 2,563 करोड़ रुपये का करार किया है। इस सैटेलाइट के 2030 तक ऑपरेशनल होने की उम्मीद है। इसका मुख्य उद्देश्य वायुसेना के विमानों और जमीन पर मौजूद कमांड सेंटर के बीच सुरक्षित और बेहतर संचार व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
भारतीय वायुसेना को मिलेगा GSAT-7C सैटेलाइट, कैसे करेगा काम (सांकेतिक फोटो)
आधुनिक युद्ध में सिर्फ लड़ाकू विमानों और हथियारों का होना ही काफी नहीं है। जरूरी यह भी है कि अलग-अलग सैन्य इकाइयों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान तेज और सुरक्षित तरीके से हो सके। ऐसे में GSAT-7C वायुसेना की संचार व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आइए समझते हैं कि यह सैटेलाइट क्या है और भारत के लिए क्यों जरूरी है।
क्या है GSAT-7C सैटेलाइट?
GSAT-7C भारतीय वायुसेना के लिए तैयार किया जा रहा एक विशेष सैन्य संचार सैटेलाइट है। इसका उद्देश्य वायुसेना के अलग-अलग संसाधनों के बीच सुरक्षित संपर्क बनाए रखना है। इसके माध्यम से लड़ाकू विमानों, हवाई निगरानी करने वाले विमानों, मानवरहित हवाई प्लेटफॉर्म और जमीन पर मौजूद कमांड सेंटर के बीच संचार (Communications) को बेहतर बनाया जा सकेगा।
इस सैटेलाइट का मुख्य काम वायुसेना के सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (SDR) को रियल टाइम कम्युनिकेशन सुविधा देना है। SDR ऐसे रेडियो सिस्टम होते हैं, जिनमें संचार के कई काम सॉफ्टवेयर की मदद से किए जा सकते हैं। इससे अलग-अलग सैन्य प्लेटफॉर्म के बीच संपर्क और सूचना साझा करने की व्यवस्था बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
कैसे काम करेगा GSAT-7C?
आमतौर पर रेडियो संचार की क्षमता दूरी, पहाड़ी इलाकों और पृथ्वी की गोलाई जैसी वजहों से सीमित हो सकती है। कई बार दूर उड़ रहे विमान और जमीन पर मौजूद स्टेशन के बीच सीधा संपर्क बनाए रखना काफी मुश्किल होता है। सैटेलाइट के जरिए संचार करने पर इन बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है। GSAT-7C वायुसेना को लाइन ऑफ साइट यानी सीधी दृश्य सीमा से आगे भी संचार की सुविधा देने के लिए तैयार किया जा रहा है। इससे दूर-दराज के क्षेत्रों में ऑपरेशन कर रहे विमानों और जमीन पर मौजूद कमांड सेंटर के बीच संपर्क मजबूत करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, संचार की वास्तविक क्षमता सैटेलाइट की तकनीकी विशेषताओं और तैनाती पर निर्भर करेगी।
वायुसेना को इससे क्या फायदा होगा?
सुरक्षित संचार: समर्पित सैन्य सैटेलाइट वायुसेना के लिए सुरक्षित संचार व्यवस्था को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
बेहतर तालमेल: लड़ाकू विमानों, निगरानी प्लेटफॉर्म और कमांड सेंटर के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान बेहतर होने से हवाई अभियानों में समन्वय बढ़ सकता है।
दूर तक संपर्क: जहां सामान्य रेडियो संचार की सीमा आड़े आती है, वहां सैटेलाइट आधारित संचार उपयोगी साबित हो सकता है।
संचार व्यवस्था की मजबूती: सामान्य संचार माध्यमों में बाधा आने या दूरस्थ क्षेत्रों में ऑपरेशन के दौरान अतिरिक्त संचार क्षमता उपयोगी हो सकती है।
स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा: भारत में सैटेलाइट के विकास और निर्माण से देश की रक्षा संचार व्यवस्था में घरेलू तकनीक की भूमिका बढ़ेगी।
GSAT-7C प्रोजेक्ट कब शुरू हुआ?
मेक इन इंडिया' पहल के तहत इस प्रोजेक्ट को 23 नवंबर 2021 को रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) से 'स्वीकृति' (AoN) मिली थी। शुरुआती मंजूरी में सैटेलाइट और उससे जुड़े ग्राउंड हब के लिए करीब 2,236 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत थी। 15 अक्टूबर 2026 को रक्षा मंत्रालय ने NSIL के साथ 2,563 करोड़ रुपये का करार किया। NSIL अंतरिक्ष विभाग के तहत काम करने वाली कंपनी है, जो भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को सरकारी और व्यावसायिक ग्राहकों तक पहुंचाने में भूमिका निभाती है। यह करार रक्षा अधिग्रहण का हिस्सा है, जिसमें भारतीय नौसेना के लिए वरुणास्त्र (Varunastra) भारी टॉरपीडो भी शामिल हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है यह सैटेलाइट?
आधुनिक युद्धनीति में विमानों, निगरानी प्रणालियों और कमांड सेंटर के बीच तेजी से जानकारी साझा करना महत्वपूर्ण होता जा रहा है। इसे नेटवर्क-केंद्रित सैन्य अभियान कहा जाता है। ऐसी व्यवस्था में अलग-अलग प्लेटफॉर्म आपस में जुड़कर बेहतर तालमेल के साथ काम कर सकते हैं। GSAT-7C का लक्ष्य वायुसेना की इसी क्षमता को मजबूत करना है। इसके 2030 तक ऑपरेशनल होने की उम्मीद है। यह परियोजना भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक और सैन्य संचार व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है।
