संयुक्त राष्ट्र संघ, जिसकी स्थापना ही इस उद्देश्य से की गई थी कि यह दुनिया में शांति को बनाए रखेगा और विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से हल करते रहेगा, लेकिन ऐसा लगता है द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी दुनिया की इस सर्वोच्च संस्था ने अपने आप को बदलने से ही इनकार कर रखा है, यही कारण है कि दुनिया के कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ की खुलेआम आलोचना करने लगे हैं, भारत जैसे कई देश इसमें सालों से सुधार की अपील कर रहे हैं। आज की तारीख में संयुक्त राष्ट्र संघ न केवल जंगों को रोकना में नाकाम रहा है, बल्कि विवादों को भी सुलझाने में फेल रहा है। इजराइल के साथ इसकी सीधी तनतनी है, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जबतब यूएन की आलोचना करते रहे हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या UN सख्त एक्शन के बजाय सिर्फ बयान जारी करने तक सीमित रह गया है, अपने ही चार्टर पर खरा उतरने में विफल रहा है? आइए इसी को समझते हैं।
संयुक्त राष्ट्र: शांति का प्रहरी या मूक दर्शक?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया को एक ऐसी संस्था की जरूरत थी जो भविष्य में बड़े युद्धों को रोक सके और विवादों को बातचीत से सुलझाने का रास्ता दिखाए। इसी सोच से संयुक्त राष्ट्र का जन्म हुआ। लेकिन हाल के वर्षों में जब धरती पर एक के बाद एक युद्ध, नागरिक संघर्ष और मानवीय त्रासदियां भड़कती रहीं, तो संयुक्त राष्ट्र बार-बार अपने उद्देश्य पर खरा उतरने में असफल साबित हुआ।
- यूक्रेन युद्ध
Secretary General of the United Nations
- गाजा संघर्ष
- सूडान और म्यांमार में गृहयुद्ध
अफ्रीका और एशिया में संयुक्त राष्ट्र की असफलता और गहरी दिखती है। सूडान में सेना और अर्धसैनिक बलों के बीच संघर्ष ने लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया, जबकि म्यांमार में सेना ने लोकतांत्रिक सरकार को अपदस्थ कर तख्तापलट किया। दोनों ही मामलों में संयुक्त राष्ट्र कोई ठोस कदम नहीं उठा सका- न तो अंतरराष्ट्रीय दबाव बना, न ही शांति बलों को प्रभावी भूमिका मिली।
- हैती, लीबिया और यमन जैसे संघर्षग्रस्त देश
हैती में हिंसा और गिरोहों का कब्जा, लीबिया में विभाजित सत्ता और यमन में वर्षों से जारी युद्ध- इन सभी में संयुक्त राष्ट्र की मौजूदगी तो है, पर प्रभाव नहीं। शांति मिशन कमजोर हैं, नेतृत्व बिखरा हुआ है और स्थानीय राजनीतिक ताकतें संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशों को नजरअंदाज करती हैं।
मानवाधिकारों की रक्षा पर भी फेल दिख रहा UN
मानवाधिकारों की रक्षा, जो संयुक्त राष्ट्र का मूल उद्देश्य था, वह भी अब राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ चुका है। संगठन की मानवाधिकार परिषद छोटे या कमजोर देशों पर तो सख्ती दिखाती है, लेकिन शक्तिशाली देशों के मामले में अक्सर चुप्पी साध लेती है। चाहे चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों का मुद्दा हो या पश्चिमी देशों के सैन्य अभियानों से जुड़े सवाल- संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया अक्सर संतुलन साधने वाली बयानबाज़ी तक सीमित रह जाती है।
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जलवायु संकट पर भी विफलता
जलवायु संकट पर भी संयुक्त राष्ट्र के प्रयास खोखले साबित हो रहे हैं। हर साल आयोजित होने वाले COP सम्मेलन बड़ी घोषणाओं और वादों से भरपूर होते हैं, पर जब बात ठोस कार्रवाई की आती है तो विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद सामने आ जाते हैं। वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य लगातार फिसलता जा रहा है और संयुक्त राष्ट्र का प्रभाव वहां भी घटता दिख रहा है।
क्यों असफल रहा संयुक्त राष्ट्र
इन तमाम घटनाओं ने एक बात स्पष्ट कर दी है- संयुक्त राष्ट्र की संरचना अब मौजूदा विश्व-राजनीति के अनुरूप नहीं रही। सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्यों का वीटो अधिकार उसे पंगु बना देता है। शक्तिशाली देशों के हितों से टकराने वाले किसी भी निर्णय का अंजाम यही होता है कि वह प्रस्ताव कभी पारित नहीं हो पाता। महासचिव की भूमिका केवल अपील करने या बयान जारी करने तक सीमित रह गई है, जबकि जमीनी स्तर पर कोई दबाव बनाने की क्षमता नहीं बची। आज जब हर क्षेत्र में भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, तो संयुक्त राष्ट्र अपने मूल उद्देश्य- “अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की रक्षा”- से दूर होता जा रहा है। वह एक ऐसे मंच में बदल चुका है जहां वैश्विक नैतिकता की बातें तो होती हैं, पर निर्णय की ताकत कुछ गिने-चुने देशों के हाथों में कैद है।
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UN की सबसे बड़ी समस्या
जब UN की स्थापना हुई थी तब इसके सदस्य देशों की संख्या 50 थी, जिसमें से पांच शक्तिशाली देशों अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन वीटो पावर वाले देश बने। लेकिन अब संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश 190 से अधिक हैं, जबकि सुरक्षा परिषद में वही पांच देश स्थायी सदस्य हैं और वही “वीटो” का अधिकार रखते हैं। यानी दुनिया बदल गई है- सत्ता, जनसंख्या, आर्थिक ताकत और क्षेत्रीय प्रभाव के केंद्र अब अलग हैं- लेकिन संयुक्त राष्ट्र अब भी 1945 की सोच पर टिका हुआ है। यही इसकी सबसे बड़ी समस्या है।
UN में क्यों है सुधार की जरूरत और क्या है राह में रोड़ा
संयुक्त राष्ट्र सुधार की बातें नई नहीं हैं। पिछले 30 सालों से इस पर चर्चा चल रही है, कई देशों ने ठोस प्रस्ताव भी दिए हैं, लेकिन हर बार यह प्रक्रिया वहीं अटक जाती है- सत्ता और हितों की राजनीति में। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे बड़े भूभाग आज भी स्थायी प्रतिनिधित्व से वंचित हैं। भारत, जो दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में लगातार योगदान देता है, पर निर्णय लेने वाली मेज पर उसकी कोई सीट नहीं है। यह अन्यायपूर्ण और अव्यवहारिक दोनों है। पांचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी देश अपने हितों के खिलाफ किसी प्रस्ताव को रोक सकता है। यही वजह है कि सुरक्षा परिषद बार-बार असहाय साबित होती है। जब संयुक्त राष्ट्र कुछ देशों के मामलों में कठोर रुख अपनाता है और कुछ में चुप रहता है, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठता है। जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, महामारी जैसी नई चुनौतियां हैं, जिन पर पुराने ढांचे के भीतर समुचित निर्णय नहीं लिए जा पा रहे। ऐसे में संगठन को आधुनिक और अधिक जवाबदेह बनाना जरूरी है। सुधार का मतलब है कि नए देशों को सुरक्षा परिषद में शामिल किया जाए या वीटो अधिकार को सीमित किया जाए। लेकिन जिन देशों के पास यह विशेषाधिकार है, वे इसे छोड़ना नहीं चाहते।
