Azadi Ke Kisse: जब भारत पर अंग्रेजों की हुकूमत थी, उस वक्त हमारे देश के कैसे हालात रहे होंगे इसकी कल्पना कर पाना भी किसी डरावने सपने से कम नहीं होगा। 190 साल तक गोरों ने हिंदुस्तान पर अपनी तानाशाही चलाई, क्रूरते की सारी हदें तोड़ दीं। मगर उस वीर सपूतों के बलिदान को याद कर हर भारतीय का सीना फक्र से चौड़ा हो जाता है। उन क्रातिंकारियों ने देश को आजाद कराने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान करने से पहले एक पल भी नहीं सोचा। गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के कई स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी, एक पल के लिए भी हार नहीं मानी। कई गुमनाम हीरो की कहानियां किताबों में बंद हैं, इन्हीं में से एक ऐसा क्रांतिकारी था, जिसने जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए 21 साल तक इंतजार किया।
जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने वाले क्रांतिकारी की कहानी।
वो क्रांतिकारी जिसने अंग्रेजों से 21 साल बाद लिया था बदला
वैसे तो कई कहानियां और किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, लेकिन इस लेख में आपको उस क्रांतिकारी के बारे में बताते हैं, जिसने अंग्रेजों की धरती लंदन जाकर जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लिया, वो भी एक या दो साल नहीं, बल्कि 21 साल बाद। उसने उस अंग्रेज अफसर को गोली मारी और मौत के घाट उतारा दी थी, जिसके कार्यकाल के दौरान, 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था। उस अंग्रेज अफसर का नाम सर माइकल फ्रांसिस ओ'डायर था, जो 1913 और 1919 के बीच ब्रिटिश भारत के पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे। ओ'डायर को मारकर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने वाले क्रांतिकारी का नाम सरदार उधम सिंह है।
जलियांवाला बाग नरसंहार। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
जलियांवाला बाग नरसंहार के गुनहगार को ऐसे दी सजा
वो तारीख थी 13 मार्च, 1940... जब लंदन के कैक्सटोन हॉल में जाकर सरदार उधम सिंह ने माइकल ओ डायर को गोली मार दी थी और जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया था। 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर में इस बर्बर गोलीकांड को जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर ने उस वक्त के पंजाब के गवर्नर जनरल माइकल ओ डायर के कहने पर अंजाम दिया था। इस नरसंहार में 1000 से अधिक निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया था। जबकि 1200 से अधिक लोग इस गोलीकांड में घायल हो गए थे।
किताब में छिपाकर रिवॉल्वर ले गए थे उधम सिंह
सरदार उधम सिंह ने किताब के पन्ने रिवॉल्वर को रिवॉल्वर के आकार में काटा और उसी में छिपाकर वो उस स्थान पर गए, जहां उन्होंने ओ'डायर को गोली मारी। उस वक्त माइकल फ्रांसिस ओ'डायर ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की एक बैठक में भाषण देने के बाद अपनी सीट पर बैठने जा रहे थे, इसी बीच उधम सिंह ने गोली चलाई और अगले कुछ ही मिनट में डायर का अंत हो गया। इसके तुरंत बाद सरदार उधम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके खिलाफ मुकदमा चलाया गया और कुछ ही दिनों बाद 31 जुलाई 1940 को उन्हें फांसी दे दी गई।
उधम सिंह को टैक्सन हॉल से ले जाया गया।
जलियांवाला बाग का बदला लेने की खाई थी कसम
जब जनरल डायर ने जलियांवाला बाग नरसंहार को अंजाम दिया था, तो उस वक्त उधम सिंह भी वहीं मौजूद थे। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उनके मन में इसी के बाद इस कदर गुस्सा भर गया कि वह अपनी पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। उन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद यही बना लिया कि वो जनरल डायर और पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर को सबक सिखाएंगे। आखिरकार उन्हें 6 साल तक लंदन में रहने के बाद मौका मिल ही गया और उन्होंने अपने मकसद को अंजाम दिया।
वैसे तो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, वीर सावरकर, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे हजारों क्रांतिकारियों की कहानियां मशहूर हैं और इनकी चर्चाएं भी होती रहती हैं, लेकिन ऐसे कई गुमनाम हीरो हैं, जिन्होंने देश को आजादी दिलाने के लिए बिना सोचे समझे अपने जान कुर्बान कर दी। अंग्रेजों ने अत्याचार की सारी हदें पार कर दीं, लेकिन भारतीयों ने हार नहीं मानी और आखिरकार 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ। ऐसे वीर सपूतों का जितना सम्मान हो वो कम ही होगा।
