Voter roll revision in Bihar : बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण वाले चुनाव आयोग की पहल पर बढ़ा विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। ईसी के इस फैसले के खिलाफ बिहार की विपक्षी पार्टियां लामबंद हो गई हैं। राजद, कांग्रेस इसे कराए जाने के समय और लोगों से मांगे जाने वाले दस्तावेज सहित चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। चुनाव आयोग के मतदाता सूची के पुनरीक्षण वाले फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कोर्ट 10 जुलाई को सुनवाई करने वाला है। अब सभी की नजरें शीर्ष अदालत से आने वाले फैसले पर टिकी हैं। कोर्ट भी यदि ईसी के इस फैसले को अनुमति दे देता है तो राज्य में मतदाता सूची नए तरीके से तैयार होगी।
बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण का विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।
आखिर पुनरीक्षण की जरूरत क्यों?
चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची से फर्जी और नकली मतदाताओं को बाहर करने की जरूरत है, इसलिए उसने 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) कराने का फैसला किया है। खासकर, ऐसे मतदाताओं को सूची से बाहर किया जाएगा जिनका पंजीकरण उनके स्थायी और स्थायी दोनों पते पर हुआ है। चुनाव में केवल भारतीय नागरिक ही मतदान कर सकें, यह सुनिश्चित करने वाले संविधान के मानकों के अनुरूप ईसी इलाके में मौजूद रहने वाले निवासियों के मतदान पर ही जोर दे रहा है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण इससे पहले 2003 में हुआ था। अब इसे कराने का लक्ष्य सूची को अद्यतन बनाना और अयोग्य वोटरों को इससे बाहर करना है। बिहार में इस समय करीब 7.9 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं।
प्रवासियों को डरने की जरूरत नहीं
बिहार से बड़ी संख्या में मजदूर पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में जाकर काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर श्रमिक एवं कामगार चुनाव के समय वापस राज्य में लौटते हैं और मतदान करते हैं। ऐसे मतदान कर्मियों के नाम वोटर लिस्ट में मौजूद है। ईसी का कहना है कि ऐसे लोगों के नाम 2003 के मतदाता सूची में पहले से मौजूद है। ऐसे लोगों को बूथ स्तर पर दिए जा रहे नामांकन फॉर्म में अपने पूर्वजों के बारे में दस्तावेजी प्रमाण देने की जरूरत नहीं है।
आधार, मनरेगा अथवा राशन कार्ड क्यों नहीं?
दरअसल, मतदाता पुनरीक्षण के लिए चुनाव आयोग लोगों से जो दस्तावेज मांग रहा है, उस पर विपक्ष को घोर आपत्ति है। दरअसल, वैध प्रमाण के दस्तावेजों में ईसी ने आधार, राशन और मनरेगा कार्ड को शामिल नहीं किया है। ईसी की दलील है कि बांग्लादेश से घुसपैठ कर दाखिल होने वाले अवैध प्रवासियों के पास ये दस्तावेज हो सकते हैं। सरकार को आशंका है कि ऐसे अवैध प्रवासियों की संख्या बंगाल और नेपाल से सटे इलाकों में ज्यादा हो सकती है। आधार के गलत इस्तेमाल के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। ईसी का कहना है कि इसलिए उनसे आधार, मनरेगा और राशन कार्ड को जरूरी वैध दस्तावेज की सूची से बाहर रखा है।
बिहार का एक मतदान केंद्र। (फाइल फोटो-पीटीआई)
लोगों को इन 11 में से एक दस्तावेज देने होंगे
1-केंद्र, राज्य सरकार एवं सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत कर्मियों के पहचान पत्र, पेंशन भुगतान आदेश
2-एक जुलाई 1987 के पूर्व सरकारी, स्थानीय प्राधिकार, बैंक, पोस्टऑफिस, एलआईसी एवं पब्लिक सेक्टर उपक्रमों से जारी आईकार्ड, दस्तावेज
3-सक्षम प्राधिकार से जारी जन्म प्रमाणपत्र
4-पासपोर्ट
5-मान्यता प्राप्त बोर्ड, विश्वविद्यालय से निर्गत मैट्रिक व अन्य शैक्षणिक प्रमाणपत्र
6-स्थायी आवासीय प्रमाणपत्र
7-वन अधिकार प्रमाणपत्र
8-सक्षम प्राधिकार द्वारा निर्गत ओबीसी/एससी/एसटी जाति प्रमाणपत्र
9-राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (जहां उपलब्ध हो)
10-राज्य/स्थानीय प्राधिकार द्वारा तैयार पारिवारिक रजिस्टर
11-सरकार की कोई भूमि/मकान आवंटन प्रमाणपत्र
विपक्ष का दावा-बिहार में बहुत सारे लोग भूमिहीन
विपक्षी दलों का कहना है कि जरूरी दस्तावेजों का सत्यापन अब आधार के जरिए होता है लेकिन इसे वैध दस्तावेजों से बाहर कर दिया गया है। यह नहीं बिहार में एक बहुत बड़ी आबादी भूमिहीनों की है। 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण में यह सामने आया कि बिहार के ग्रामीण इलाकों के 65.58 प्रतिशत लोगों के पास कोई भूमि नहीं थी। ऐसे में बहुत से लोगों के बास भूमि से जुड़ा कोई दस्तावेज नहीं होगा। यही नहीं, पुनरीक्षण के लिए निर्धारित समय को भी विपक्षी दल पर्याप्त नहीं बता रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसे लोग जिनके पास जन्म अथवा स्कूल प्रमाणपत्र दोनों नहीं है, वे एक महीने से भी कम समय में इन दस्तावेजों को कैसे तैयार करा पाएंगे।
बिहार के मतदान केंद्र पर कतार में खड़ी महिलाएं। (फाइल फोटो-पीटीआई)
सीईसी ने कहा-ऐसे लोगों को कागज देने की जरूरत नहीं
बिहार में मतदाता पुनरीक्षण सूची पर उठ रहे सवालों पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने शनिवार को कहा कि निर्वाचन आयोग विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ संवाद करता रहता है और पिछले चार महीनों में 5,000 ऐसी बैठकें हुई हैं, जिनमें राजनीतिक दलों के नेताओं सहित 28,000 लोग शामिल हुए हैं। बिहार की मतदाता सूची का जिक्र करते हुए, जहां विधानसभा चुनाव होने हैं, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि बिहार में जो भी व्यक्ति एक जनवरी 2003 की मतदाता सूची में है, उसे संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत प्राथमिक दृष्टिकोण से योग्य माना जाएगा। दूसरे शब्दों में, जिन लोगों के नाम उस सूची में हैं, उन्हें कोई कागज जमा करने की जरूरत नहीं है।
बिहार में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में होंगे चुनाव
उन्होंने कहा कि आयोग जल्द ही 2003 की बिहार मतदाता सूची को अपनी वेबसाइट पर अपलोड करेगा, ताकि इसमें शामिल करीब 4.96 करोड़ मतदाताओं को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए गणना प्रपत्र के साथ संलग्न किए जाने वाले संबंधित हिस्से को निकालने में सुविधा हो। कुमार ने बताया कि जिन मतदाताओं के माता-पिता का नाम 2003 की मतदाता सूची में है, उन्हें केवल अपने जन्म स्थान/तिथि के बारे में दस्तावेज देने होंगे। बिहार में अभी 243 विधानसभा सीट पर 7.89 करोड़ से अधिक मतदाता हैं। राज्य में इस साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।
