न आधार, न मनरेगा कार्ड, 11 'दस्तावेज' अनिवार्य, जानें बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण में क्या है विवाद

बिहार की मतदाता सूची का जिक्र करते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि बिहार में जो भी व्यक्ति एक जनवरी 2003 की मतदाता सूची में है, उसे संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत प्राथमिक दृष्टिकोण से योग्य माना जाएगा। दूसरे शब्दों में, जिन लोगों के नाम उस सूची में हैं, उन्हें कोई कागज जमा करने की जरूरत नहीं है। कुमार ने बताया कि जिन मतदाताओं के माता-पिता का नाम 2003 की मतदाता सूची में है, उन्हें केवल अपने जन्म स्थान/तिथि के बारे में दस्तावेज देने होंगे।

Voter roll revision in Bihar : बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण वाले चुनाव आयोग की पहल पर बढ़ा विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। ईसी के इस फैसले के खिलाफ बिहार की विपक्षी पार्टियां लामबंद हो गई हैं। राजद, कांग्रेस इसे कराए जाने के समय और लोगों से मांगे जाने वाले दस्तावेज सहित चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। चुनाव आयोग के मतदाता सूची के पुनरीक्षण वाले फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कोर्ट 10 जुलाई को सुनवाई करने वाला है। अब सभी की नजरें शीर्ष अदालत से आने वाले फैसले पर टिकी हैं। कोर्ट भी यदि ईसी के इस फैसले को अनुमति दे देता है तो राज्य में मतदाता सूची नए तरीके से तैयार होगी।

Bihar Assembly Election

बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण का विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।

आखिर पुनरीक्षण की जरूरत क्यों?

चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची से फर्जी और नकली मतदाताओं को बाहर करने की जरूरत है, इसलिए उसने 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) कराने का फैसला किया है। खासकर, ऐसे मतदाताओं को सूची से बाहर किया जाएगा जिनका पंजीकरण उनके स्थायी और स्थायी दोनों पते पर हुआ है। चुनाव में केवल भारतीय नागरिक ही मतदान कर सकें, यह सुनिश्चित करने वाले संविधान के मानकों के अनुरूप ईसी इलाके में मौजूद रहने वाले निवासियों के मतदान पर ही जोर दे रहा है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण इससे पहले 2003 में हुआ था। अब इसे कराने का लक्ष्य सूची को अद्यतन बनाना और अयोग्य वोटरों को इससे बाहर करना है। बिहार में इस समय करीब 7.9 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं।

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