अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर भारत पहुंच चुके हैं। डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने और विदेश मंत्री का पद संभालने के बाद रुबियो का यह पहला भारत दौरा है। उनकी इस यात्रा को महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि पिछले कुछ समय से भारत-अमेरिका संबंधों में आई तल्खी और ठंडेपन को दूर करने के लिए एक 'रिपेयर मिशन' (सुधार मिशन) के रूप में देखा जा रहा हैय़
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अपने 4 दिनों के भारत दौरे के लिए शनिवार को कोलकाता पहुंचे। AI IMAGE
रुबियो ने भारत आते ही अपनी यात्रा की शुरुआत कोलकाता से की, जहां उन्होंने सेंट मदर टेरेसा के 'मदर हाउस' जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। कोलकाता के बाद वे आगरा, जयपुर और नई दिल्ली का दौरा करेंगे। दिल्ली में वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बेहद महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठकें करेंगे।
मार्को रुबियो शनिवार सुबह पहुंचे कोलकाता। AP
कितना महत्वपूर्ण है मार्को रुबियो का भारत दौरा?
विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस दौरे के रणनीतिक और आर्थिक मायने बहुत गहरे हैं। अमेरिका-ईरान युद्ध और भारत का ऊर्जा संकट (The Oil Factor) पश्चिम एशिया में चल रहे अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मची है। खाड़ी देशों में जारी तनाव और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) के प्रभावित होने की आशंका से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।
इस संकट के बीच अमेरिका खुद को भारत के एक मजबूत और भरोसेमंद ऊर्जा साझेदार के रूप में पेश कर रहा है। रुबियो भारत को अमेरिकी और वेनेजुएला के कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने का प्रस्ताव दे रहे हैं ताकि भारत की ईरान या अन्य अनिश्चित स्रोतों पर निर्भरता को कम किया जा सके।
क्वाड (Quad) को दोबारा जिंदा करने की कोशिश
चार देशों (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के रणनीतिक समूह 'क्वाड' को लेकर पिछले कुछ समय से संशय के बादल मंडरा रहे थे। ट्रंप प्रशासन के आने के बाद से इस समूह की सक्रियता थोड़ी धीमी पड़ती दिख रही थी और लगातार दूसरे साल भी 'क्वाड लीडर्स समिट' की संभावनाएं कम नजर आ रही हैं।
मार्को रुबियो अपने दौरे के आखिरी दिन (26 मई) दिल्ली में क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेंगे। हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए क्वाड को मजबूत बनाए रखना वाशिंगटन के लिए बेहद जरूरी है।
व्यापारिक टैरिफ और रक्षा सौदों पर तल्खी कम करनापिछले कुछ समय में भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक मोर्चे पर काफी तनाव देखा गया है। अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर लगाए गए कड़े टैरिफ और भारत द्वारा रूस से तेल खरीदे जाने पर वाशिंगटन की नाराजगी ने दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित किया था।
पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की फाइल फोटो। AP
रक्षा और तकनीक
रुबियो इस दौरे के माध्यम से रक्षा सहयोग, नई सैन्य तकनीकों के सह-उत्पादन (Co-production) और छोटे परमाणु रिएक्टरों (Small Nuclear Reactors) को भारत को बेचने की वकालत करेंगे। इसके अलावा दोनों देशों के बीच अटके पड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते को भी आगे बढ़ाने पर बातचीत होगी।
पाकिस्तान और ब्रिक्स (BRICS) पर भारत की चिंताएं
भारतीय कूटनीतिज्ञों के मन में इस बात को लेकर भी असहजता है कि अमेरिकी प्रशासन का हालिया झुकाव पाकिस्तान के प्रति थोड़ा नरम दिखा है, जिसे भारत एक सुरक्षा जोखिम के रूप में देखता है. दूसरी तरफ, अमेरिका को भारत की ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे गैर-पश्चिमी मंचों पर बढ़ती सक्रियता से थोड़ी परेशानी रही है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
विदेश नीति के विशेषज्ञों का मानना है कि मार्को रुबियो हमेशा से भारत के साथ मजबूत संबंधों के पक्षधर रहे हैं और वे भारत को केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि चीन को संतुलित करने वाली एक 'महान सभ्यतागत शक्ति' (Civilizational Power) मानते हैं।
मार्को रुबियो का यह दौरा भारत को अमेरिका का कोई पारंपरिक 'गुलामी करने वाला सैन्य सहयोगी' बनाने के लिए नहीं है, बल्कि एक ऐसे 'स्वतंत्र रणनीतिक भागीदार'के रूप में स्वीकार करने की अमेरिकी मजबूरी को दर्शाता है जो अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से कभी समझौता नहीं करेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि रुबियो दोनों देशों के बीच के इन वैचारिक विरोधाभासों को पाटने में कितने सफल होते हैं।
