केंद्र सरकार के अध्यादेश से LG फिर हो जाएंगे दिल्ली के बॉस, 5 प्वाइंट्स के जरिए समझें

  • Authored by: ललित राय
  • Updated May 20, 2023, 08:34 AM IST

IAS Officers Transfer Posting: आईएएस अधिकारियों को किसी भी सरकार का आंख और कान माना जाता है। लेकिन उस आंख और कान पर नियंत्रण किसी और का हो तो सरकार काम कैसे कर पाएगी। करीब चार साल की कानूनी लड़ाई के बाद ट्रांसफर-पोस्टिंग के मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली थी। लेकिन केंद्र सरकार के एक अध्यादेश के बाद फिर लड़ाई आमने सामने की हो गई है।

IAS Officers Transfer Posting: दिल्ली का बॉस कौन होगा, इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में अरविंद केजरीवाल सरकार(Arvind Kejriwal government) की दलीलों पर मुहर लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court of India) ने कहा कि चुनी हुई सरकार जनता के लिए जवाबदेह होती है, लिहाजा अधिकारियों के ट्रांसफर और पॉवर का अधिकार दिल्ली सरकार के पास होना चाहिए। जाहिर सी बात थी कि यह दिल्ली के उपराज्यपाल(Lieutenant Governor V K Saxena) के लिए किसी झटके से कम नहीं था। अदालती आदेश के बाद केजरीवाल सरकार ने कहा कि काम में रोड़ा अटकाने वाले अधिकारियों की छुट्टी होगी। कुछ ट्रांसफर भी किए लेकिन एलजी दफ्तर की तरफ से रुकावट आई। केजरीवाल सरकार भागे भागे फिर सुप्रीम कोर्ट गई। लेकिन अब केंद्र सरकार ने ट्रांसफर पोस्टिंग के संदर्भ में अध्यादेश जारी किया है जिसके तहत दिल्ली के उपराज्यपाल वी के सक्सेना फिर ताकतवर हो गए हैं। इस पूरे मामले को कुछ खास बिंदुओं के जरिए समझने की कोशिश करेंगे।

ये हैं पांच खास प्वाइंट्स

  • केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिए राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण बनेगा जो ट्रांसफर- पोस्टिंग के साथ सतर्कता विभाग के कामकाज पर नजर रखेगी। इस प्राधिकरण में सीएम, मुख्य सचिव और प्रधानसचिव गृह होंगे। फैसला बहुमत से लिया जाएगा। लेकिन अंतिम फैसला उपराज्यपाल का होगा
  • आम आदमी पार्टी ने अध्यादेश को तानाशाही करार दे दिया। आप का कहना है कि बात तो फिर वही हुई कि दिल्ली सरकार को काम नहीं करने दिया जाएगा। अब इसके पीछे की डर समझिए।
  • दरअसल प्राधिकरण में दो सदस्यों मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव गृह की नियुक्ति केंद्र करता है लिहाजा दिल्ली सरकार का पलड़ा हमेशा कमजोर रहेगा।
  • जानकार कहते हैं कि प्राधिकरण के फैसले में दिल्ली सरकार बहुमत में होती है तो उस दशा में भी अंतिम फैसला तो उपराज्यपाल को ही करना है।
  • अध्यादेश में एक खास बात का भी जिक्र है कि अगर सिविल सेवा प्राधिकरण की तरफ से दूसरी दफा एलजी को वही प्रस्ताव भेजा जाता है तो उन्हें मंजूरी देनी पड़ेगी।

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