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संसद की कार्यवाही में लगता है कितना पैसा? जानिए फंडिंग से लेकर मॉनिटरिंग तक सब कुछ

भारतीय संसद को सुचारु रूप से चलाने में प्रतिदिन करोड़ों रुपये का खर्च आता है, जो आम जनता द्वारा दिए गए करों से आता है। इस पैसे का उपयोग देश की नीतियां बनाने, कानून पारित करने और सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए किया जाता है। लेकिन जब संसद में केवल हंगामा होता है, या कार्यवाही बाधित रहती है, तो यह खर्च एक "लोकतांत्रिक नुकसान" बन जाता है- ना केवल पैसे का, बल्कि समय और विश्वास का भी।

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संसद चलाने में कितना खर्च होता है?
Curated by: Shishupal Kumar
Updated Aug 23, 2025, 08:31 IST
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भारतीय संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, जहां देश के सबसे महत्वपूर्ण कानून, नीतियां और बजट तय किए जाते हैं। जहां देश के चुने हुए प्रतिनिधि बैठकर कानून बनाते हैं, बहस करते हैं, सवाल पूछते हैं और सरकार से जवाब मांगते हैं। इसी संसद से देश का बजट तय होता है, संसद ही शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक, विज्ञान से लेकर व्यापार तक पर बजट तय करती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस संसद में पूरे देश का बजट पेश होता है, देश के भविष्य का निर्धारण होता है, वो चलता कैसे है, संसद के लिए फंड कहां से आता है, एक दिन में संसद की कार्यवाही पर कितना खर्च होता है, इसका हिसाब-किताब कौन रखता है? आइए इसी को समझते हैं...

संसद को चलाने के लिए पैसा कहां से आता है?

संसद को चलाने के लिए हर क्षेत्र की तरह यहां भी भारत सरकार ही पैसा देती है। संसद को चलाने के लिए धन भारत सरकार के वार्षिक बजट से आता है, यह बजट हर वर्ष वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार किया जाता है और संसद के दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा- में प्रस्तुत किया जाता है। संसद के संचालन पर होने वाला खर्च इस बजट का हिस्सा होता है, जिसे विशेष रूप से लोकसभा सचिवालय और राज्यसभा सचिवालय के अंतर्गत रखा जाता है। संसद के संचालन से संबंधित सभी खर्चों के लिए बजट में दो मुख्य मद होते हैं:

  • लोकसभा सचिवालय
- यह लोकसभा (निचला सदन) के प्रशासन, वेतन, भत्तों, तकनीकी संसाधनों, संसदीय समितियों आदि का खर्च देखता है। इसके लिए अलग से बजट आवंटित होता है।
  • राज्यसभा सचिवालय
- यह राज्यसभा (उच्च सदन) से संबंधित सभी खर्चों को संभालता है।

संसद का बजट कहां-कहां खर्च होता है?

संसद का बजट केवल एक भवन या वेतन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे संसदीय तंत्र को सशक्त और प्रभावशाली बनाने के लिए होता है। यह खर्च इसलिए जरूरी है ताकि संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्य कर सके, विधायन प्रक्रिया ठीक से चले और सरकार की जवाबदेही तय की जा सके।

  1. सांसदों के वेतन और भत्ते- सांसदों को मासिक वेतन के साथ-साथ कई तरह के भत्ते भी दिए जाते हैं, जैसे यात्रा भत्ता, कार्यालय खर्च, सहायक स्टाफ के लिए भुगतान आदि। संसद के बजट का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं खर्चों में जाता है।
  2. संसद भवन का रखरखाव और संचालन- संसद भवन एक ऐतिहासिक और अत्यधिक संरक्षित परिसर है। इसके रखरखाव, बिजली-पानी, सुरक्षा, स्वच्छता, तकनीकी व्यवस्था और नवीनीकरण पर नियमित खर्च होता है।
  3. सचिवालयों का प्रशासनिक खर्च- लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय में सैकड़ों अधिकारी और कर्मचारी कार्यरत रहते हैं। इनके वेतन, कार्यालय की जरूरतें, प्रशिक्षण और संचालन पर भी संसद का बजट खर्च होता है।
  4. संसदीय समितियों का संचालन- संसद में विभिन्न विषयों पर काम करने वाली स्थायी और अस्थायी समितियां होती हैं (जैसे वित्त, रक्षा, पर्यावरण आदि)। इन समितियों की बैठकें, रिपोर्ट्स, दस्तावेजों की तैयारी और यात्रा संबंधी खर्च संसद के बजट से किया जाता है।
  5. दस्तावेज, प्रकाशन और अनुवाद- संसदीय कार्यवाही, प्रश्नोत्तर, विधेयक, रिपोर्ट्स और अन्य दस्तावेजों को छपवाने, डिजिटली प्रकाशित करने और विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कराने का खर्च भी संसद के बजट में शामिल होता है।
  6. सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटलीकरण- संसद में कार्य को अधिक कुशल और पारदर्शी बनाने के लिए डिजिटल सिस्टम, कंप्यूटर नेटवर्क, संसद टीवी, रिकॉर्डिंग और दस्तावेजों के ऑनलाइन आर्काइव पर खर्च किया जाता है।
  7. संसद टीवी और मीडिया सुविधाएं- संसद टीवी चैनल और उससे जुड़ी तकनीकी सेवाएं, प्रसारण, मीडिया कवरेज और पत्रकारों के लिए बनाए गए संसाधन संसद के बजट का हिस्सा होते हैं।
  8. सांसदों के यात्रा, आवास और सुविधाएं- दिल्ली में सांसदों के लिए आवास की व्यवस्था, उनके लिए फ्लाइट या ट्रेन से यात्रा भत्ते, टेलीफोन, इंटरनेट, फर्नीचर, आदि की सुविधा संसद के बजट से दी जाती है।
  9. सुरक्षा और प्रोटोकॉल- संसद भवन और सांसदों की सुरक्षा के लिए तैनात स्पेशल सिक्योरिटी फोर्स, बैरिकेडिंग, सीसीटीवी, पहचान प्रणाली और अन्य प्रोटोकॉल संबंधित खर्च भी इसी बजट से पूरे किए जाते हैं।
  10. प्रशिक्षण, शोध और अध्ययन दौरे- सांसदों और सचिवालय के अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, विदेश यात्राएं, अध्ययन दौरे, सेमिनार और कार्यशालाएं भी संसद के बजट में शामिल होती हैं।
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संसद की कार्यवाही पर कितना खर्च

जब संसद का सत्र चलता है, तब उसका प्रतिदिन का खर्च करोड़ों रुपये में होता है। प्रति मिनट तक इसकी लागत ₹2.5 लाख है। 2012 में, तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने बताया था कि संसद के संचालन में ₹2.5 लाख प्रति मिनट खर्च होता है। हालांकि आज की तारीख में यह खर्च और बढ़ा ही होगा।

इस हिसाब से अगर संसद रोजाना करीब 6 घंटे काम करती है, तो:

  • प्रति घंटे खर्च = ₹1.5 करोड़
  • प्रति दिन खर्च = ₹9 करोड़ तक हो सकता है

वार्षिक बजट में संसद के लिए कितना आवंटन होता है?

भारत सरकार अपने वार्षिक आम बजट में लोकसभा सचिवालय और राज्यसभा सचिवालय के लिए अलग-अलग राशि आवंटित करती है। उदाहरण के तौर पर:

  • लोकसभा सचिवालय के लिए 2024-25 में आवंटन: ₹862 करोड़
  • राज्यसभा सचिवालय के लिए 2024-25 में आवंटन: ₹416 करोड़
rajya sabha (3)

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कौन रखता है हिसाब-किताब

इन खर्चों का लेखा-जोखा लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय द्वारा रखा जाता है और इसकी निगरानी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा की जाती है। CAG संसद के खर्च की ऑडिट रिपोर्ट तैयार करता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सार्वजनिक धन का सही उपयोग हो रहा है। इसके अलावा, संसद की सार्वजनिक लेखा समिति और अन्य संसदीय समितियां भी इन खर्चों की समीक्षा करती हैं।

हंगामे के दौर में जवाबदेही की जरूरत?

संसद का बजट केवल एक भवन या वेतन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे संसदीय तंत्र को सशक्त और प्रभावशाली बनाने के लिए होता है। यह खर्च इसलिए जरूरी है ताकि संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्य कर सके, विधायन प्रक्रिया ठीक से चले और सरकार की जवाबदेही तय की जा सके। संसद को चलाने के लिए जो पैसा खर्च होता है, वह भारत की जनता का होता है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि यह धन उचित, पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से खर्च किया जाए। जब संसद में हंगामा होता है, कार्यवाही बाधित होती है या बहुमूल्य समय बर्बाद होता है, तो वह केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया का नुकसान नहीं होता, बल्कि जनता के पैसे की भी बर्बादी होती है। इसीलिए संसद को कुशल, सार्थक और जिम्मेदार ढंग से चलाना न सिर्फ जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखने का माध्यम भी है।

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