सियासी गलियारों से आतंकी ठिकानों तक, पाकिस्तान में काफी पुराना है आतंकवाद और राजनीति का गठजोड़

दिफा-ए-पाकिस्तान काउंसिल पाकिस्तान में आतंकवादियों और राजनेताओं के एक साथ आने का सबसे बड़ा और खुला उदाहरण था। नवंबर 2011 में नाटो (NATO) हमले के विरोध में 40 से अधिक धार्मिक और दक्षिणपंथी संगठनों को मिलाकर इस काउंसिल का गठन किया गया था।

Politics and Terror in Pakistan: पाकिस्तान में आतंकवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसे आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता। इस जड़ को गहरा करने में वहां के सियासी हुक्मरानों का बहुत बड़ा योगदान है। पाकिस्तानी हुक्मरानों का उसे भरपूर साथ और समर्थन मिलता रहा है। समय के साथ इनका रिश्ता और मजबूत होता गया। दिफा-ए-पाकिस्तान काउंसिल पाकिस्तान में आतंकवादियों और राजनेताओं के एक साथ आने का सबसे बड़ा और खुला उदाहरण था। नवंबर 2011 में नाटो (NATO) हमले के विरोध में 40 से अधिक धार्मिक और दक्षिणपंथी संगठनों को मिलाकर इस काउंसिल का गठन किया गया था। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने बताया कि पाक-अफगान सीमा पर अमेरिकी सेना की ओर से पाकिस्तानी सैनिकों की हत्याओं की प्रतिक्रिया में 2011 में DPC की स्थापना की गई थी। हालांकि, 2018 में इसके संस्थापक मौलाना समीउल हक की हत्या के बाद से यह निष्क्रिय था।

Terrorism

पाकिस्तान में आतंकवाद और राजनीति का है 'कॉकटेल'। तस्वीर-AI

मुंबई हमले का मास्टरमाइंड और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का संस्थापक हाफिज सईद, सिपाह-ए-साहबा (ASWJ) का नेता अहमद लुधियानवी और हरकत-उल-मुजाहिदीन का संस्थापक फजलुर रहमान खलील। हाफिज सईद इन रैलियों में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल होता था, जहां भारत और अमेरिका के खिलाफ खुलेआम जहर उगला जाता था। इस मंच पर पूर्व ISI प्रमुख जनरल हामिद गुल, नवाज शरीफ की पार्टी (PML-N) के नेता एजाज-उल-हक और अवामी मुस्लिम लीग के प्रमुख शेख रशीद अहमद (जो बाद में इमरान खान सरकार में गृह मंत्री बने) जैसे मुख्यधारा के नेता एक ही मंच पर भाषण देते और रणनीति बनाते दिखे।

End of Feed