Saudi Arabia Nuclear Bomb Possibility: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सऊदी अरब के साथ ऐतिहासिक नागरिक परमाणु समझौते को दी गई औपचारिक मंजूरी के बाद पूरी दुनिया में बहस छिड़ गई है। वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के अनुसार, 30 साल के इस बहु-अरब डॉलर के समझौते के तहत सऊदी क्षेत्र में यूरेनियम संवर्धन की सुविधा स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इस खबर के सामने आते ही सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि 'क्या इस समझौते के बाद सऊदी अरब परमाणु बम बनाने में सक्षम हो जाएगा?'इसका सीधा उत्तर 'नहीं' है, लेकिन इसने मध्य पूर्व के पूरे भू-राजनीतिक समीकरण को बदलकर रख दिया है।
क्या अब सऊदी अरब बना सकता है न्यूक्लियर बम? ट्रंप के साथ हुई रियाद की डील! जानें- यह कैसे है भारत के परमाणु समझौते से अलग
'सिविलियन न्यूक्लियर डील' (123 Agreement) क्या है?
अमेरिका के परमाणु ऊर्जा अधिनियम (Atomic Energy Act) की धारा 123 के तहत किए जाने वाले करारों को '123 एग्रीमेंट' कहा जाता है। अमेरिका ने भारत, यूएई, जापान और दक्षिण कोरिया समेत 20 से अधिक देशों के साथ ऐसे समझौते कर रखे हैं। इसके प्राथमिक उद्देश्य हैं:
शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन: परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण करना, बिजली पैदा करना, रेडियोधर्मी कचरा प्रबंधन और मेडिकल रिसर्च में तकनीक साझा करना।
सख्त कानूनी ढांचा: अमेरिका बिना किसी '123 एग्रीमेंट' के अपनी परमाणु सामग्री या रिएक्टर तकनीक किसी दूसरे देश को निर्यात नहीं कर सकता है।
यूरेनियम संवर्धन और परमाणु बम का विज्ञान
समझौते का सबसे संवेदनशील पहलू सऊदी अरब को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन की इजाजत मिलने की संभावना है। यूरेनियम तकनीक 'डुअल यूज' (द्वि-उपयोगी) होती है। इसको ऐसे समझे जैसे 3% से 5% संवर्धन स्तर होगा तो ये वाणिज्यिक बिजली उत्पादन के लिए उपयोग में आ सकता है। 20% तक हो तो इसको अनुसंधान/रिसर्च के तहत देखा जाएगा और मुख्य उद्देश्य मेडिकल आइसोटोप और शोध रिएक्टर माना जाएगा। अगर 90% या उससे अधिक संवर्धन स्तर हो जाए तो यह सैन्य/परमाणु बम के रूप में उपयोगी और मुख्य उद्देश्य परमाणु हथियारों का निर्माण करना होता है।
सऊदी अरब सीधे बम क्यों नहीं बना सकता?
सैकड़ों सेंट्रीफ्यूज चलाकर 3-5% तक संवर्धित यूरेनियम से बिजली बनाना अलग बात है और उसे 90% तक ले जाकर बम बनाना पूरी तरह अलग प्रक्रिया है। इसके लिए सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी से बाहर निकलना होगा, उच्च विस्फोटकों को सिंक्रनाइज करने की जटिल तकनीक सीखनी होगी और मिसाइल डिलीवरी सिस्टम विकसित करना होगा, जो गुप्त रूप से करना असंभव है।
अमेरिका की निगरानी में होगा परमाणु डील से जुड़ा सारा काम
यूएई (UAE) और भारत की डील से कितना अलग है सऊदी समझौता?
यूएई का 'गोल्ड स्टैंडर्ड': संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अमेरिका के साथ डील करते समय अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन और रीप्रोसेसिंग का विचार पूरी तरह छोड़ दिया था, जिसे अंतरराष्ट्रीय गैर-प्रसार का 'गोल्ड स्टैंडर्ड' माना जाता है। सऊदी अरब ने इस प्रतिबंध को मानने से साफ इनकार कर दिया था।
सऊदी मॉडल (मध्यम मार्ग): ट्रंप प्रशासन के तहत हुआ यह समझौता एक बीच का रास्ता है, जहां यूरेनियम संवर्धन सुविधा का निर्माण अमेरिका के साथ 2-वर्षीय संयुक्त व्यवहार्यता अध्ययन के बाद केवल अमेरिकी निगरानी और नियंत्रण में किया जाएगा।
भारत से भिन्नता: भारत NPT (परमाणु अप्रसार संधि) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं था और पहले से ही परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र था। इसके विपरीत, सऊदी अरब NPT का हस्ताक्षरकर्ता एक गैर-परमाणु राष्ट्र है।
तेल के सौदागर को क्यों चाहिए परमाणु ऊर्जा?
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के 'विजन 2030' का यह एक मुख्य हिस्सा है। सऊदी अरब अपने घरेलू बिजली संकट और एआई (AI) डेटा सेंटरों की विशाल बिजली मांगों को पूरा करने के लिए कच्चा तेल जलाने के बजाय परमाणु ऊर्जा का उपयोग करना चाहता है, ताकि वह अधिक से अधिक तेल निर्यात कर वैश्विक खजाना भर सके। वाशिंगटन का मानना है कि यदि अमेरिका ने यह सौदा नहीं किया, तो सऊदी अरब चीन या रूस के साथ परमाणु तकनीक साझा कर लेगा, जिससे अमेरिकी कंपनियों को अरबों डॉलर का नुकसान होता और क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव कम हो जाता।
अमेरिकी संसद में आ सकता है सियासी तूफान
यह समझौता ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जारी है और ट्रंप प्रशासन ने ईरान के नतांज स्थित परमाणु ठिकानों पर बमबारी की है। ऐसे माहौल में सऊदी अरब को संवर्धन क्षमता देना अमेरिकी संसद में कड़े विरोध का कारण बन सकता है।
डेमोक्रेटिक और कुछ रिपब्लिकन सांसदों को डर है कि यदि सऊदी अरब को संवर्धन का अधिकार मिला, तो तुर्की, मिस्र और अन्य खाड़ी देश भी परमाणु क्षमता हासिल करने की होड़ में शामिल हो जाएंगे। आलोचकों का कहना है कि इस सौदे में IAEA के अतिरिक्त निरीक्षण प्रोटोकॉल को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। हालांकि, अमेरिकी कांग्रेस को इस डील को रोकने के लिए दोनों सदनों में 'संयुक्त प्रस्ताव' पारित करना होगा जिसे राष्ट्रपति ट्रंप अपने वीटो पावर से निष्प्रभावी कर सकते हैं।
