Nitish Kumar Politics: नीतीश कुमार की राजनीतिक छवि को लेकर कहा जाता है कि वो बिन पेंदी के लोटा हैं। लोकसभा चुनाव को लेकर तैयारियां जोरों पर है और नीतीश की पार्टी जेडीयू फिलहाल विपक्षी गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इंक्लूसिव अलायंस का हिस्सा है। मगर नीतीश वहां टिक पाते हैं या नहीं, इसकी तस्वीर शायद सीट बंटवारे के बाद साफ हो जाएगी। कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू को उम्मीदें हैं कि बिहार में उनके खाते में ज्यादा से ज्यादा सीटें आएंगी। खासकर लालू यादव की पार्टी के लिए ये चुनाव बेहद अहम होगा। इसकी वजह ये है कि पिछले आम चुनावों में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का खाता तक नहीं खुल पाया था। हालांकि इसके बावजूद 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में वो सूबे की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। ऐसे में अगर नीतीश कुमार ने फिर पलटी मार ली तो आगामी चुनाव कितना बदल जाएगा, आपको समझाते हैं।
लोकसभा चुनाव से पहले क्या बिहार में होगा 'खेला'?
नीतीश के पलटीमार ट्रैक रिकॉर्ड के चलते सुगबुगाहट तेज
कभी एनडीए, कभी महागठबंधन, तो कभी INDIA... बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कब सियासी फायदे की खातिर पलटी मार लेंगे, इसका अंदाजा लगा पाना भी बिल्कुल वैसा ही है, जैसे रेत के मैदान में एक सुई को ढूंढना। लंबे वक्त तक भाजपा के साथ गठबंधन में रहने वाले नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा को पानी पी-पीकर कोसा था, इसके बाद लालू की पार्टी के साथ मिलकर वो बिहार में सरकार बनाते हैं, मुख्यमंत्री बनते हैं और देखते ही देखते एक बार फिर लालू से पीछा छुड़ाकर भाजपा को गले लगा लेते हैं। 2019 का आम चुनाव एनडीए में रहते हुए लड़ते हैं। फिर 2020 का विधानसभा चुनाव भी साथ में लड़ते हैं, जिसमें उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा, बावजूद इसके वो फिर से सीएम बनते हैं। मगर न जाने क्यों, नीतीश कुमार ने पलटी मार ली और फिर से लालू के साथ चले गए। ऐसे में अगर ये गुफ्तगू हो रही है कि वो फिर से पलटी मार सकते हैं, तो इसमें हैरानी को कोई बात नहीं है।
कैसे रहे 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे, समझें गणित
बिहार की 40 सीटों पर हुए पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा का बोलबाला रहा है। 2014 के चुनावी नतीजों में भाजपा ने अकेले 22 सीटें हासिल की थी, जबकि एनडीए गठबंधन ने 31 सीटें जीती थीं। हालांकि अगर 2019 के चुनावी नतीजों का जिक्र किया जाए तो 2014 की तुलना में भाजपा को 5 सीटों का नुकसान झेलना पड़ा था, मगर एनडीए गठबंधन ने बिहार की 40 में से 39 सीटों पर अपना कब्जा जमाया था। नीचे देखें आंकड़े...
लोकसभा चुनाव 2014 के नतीजे
| गठबंधन | पार्टी | सीटें |
| एनडीए | भारतीय जनता पार्टी | 22 |
| एनडीए | लोक जनशक्ति पार्टी | 6 |
| एनडीए | राष्ट्रीय लोक समता पार्टी | 4 |
| यूपीए | राष्ट्रीय जनता दल | 6 |
| यूपीए | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 2 |
| यूपीए | राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी | 1 |
| जदयू | जनता दल यूनाइटेड | 2 |
| कोई नहीं | निर्दलीय | 2 |
लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे
| गठबंधन | पार्टी | सीटें |
| एनडीए | भारतीय जनता पार्टी | 17 |
| एनडीए | जनता दल यूनाइटेड | 16 |
| एनडीए | लोक जनशक्ति पार्टी | 6 |
| महागठबंधन | राष्ट्रीय लोक समता पार्टी | 0 |
| महागठबंधन | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 1 |
| महागठबंधन | राष्ट्रीय जनता दल | 0 |
अगर नीतीश कुमार ने पलटी मारी, तो कितना बदलेगा समीकरण?
इस बार भाजपा के पास खुला मैदान है। एक बार फिर से बिहार में भाजपा इस कोशिश में होगी कि अपनी सीटें बढ़ाई जाए। मगर नीतीश कुमार को INDIA में रहते हुए उनके मनमाफिक सीटें नहीं मिली तो हो सकता है कि वो फिर से भाजपा के साथ आ जाएं। अगर ऐसा होता है तो भी नीतीश कुमार के खाते में भाजपा उतनी सीटें नहीं देगी, जितनी पिछले लोकसभा चुनावों में दी गई थी। इसकी वजह साफ है, भाजपा की सोच साल 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर होगी। पिछली बार के चुनाव में ये समझ आ गया है कि नीतीश का वजूद अब पहले की तरह नहीं है। पार्टी के दिग्गज नेता पाला बदल रहे हैं।
हां, ये बात जरूर है कि नीतीश के इस कदम से भाजपा को बड़ा फायदा होगा, जिसका उदाहरण 2019 का चुनाव है। अगर ऐसा होता है तो लालू की पार्टी को सबसे बड़ा झटका लगेगा और शून्य की चिंता सताएगी। आरजेडी नही चाहेगी कि उसे पिछली बार की तरह हार झेलनी पड़े। वहीं अगर नीतीश ने पलटी मार ली तो INDIA गठबंधन का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा, क्योंकि इस गठबंधन की पहल ही खुद नीतीश ने की थी।
क्या नीतीश ऐसा चाहेंगे तो भाजपा के दरवाजे उनके लिए खुल जाएंगे?
एनडीए और INDIA गठबंधन दोनों खेमे के लिए ही बिहार बेहद अहम है। नीतीश जिसके भी साथ जाएंगे, उसके लिए बिहार में जीत के दरवाजे खुल जाएंगे। भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए 2024 के लोकसभा चुनाव तक जरा भी लापरवाही बरतने के मूड में नहीं है, क्योंकि इंडिया के नेताओं की केवल एक ही प्लानिंग है कि तीन राज्यों बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड से एनडीए की 40 से 50 सीटें कम की जाएं। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 18, बिहार में 17 और झारखंड में 12 सीटों पर जीत का परचम फहराया था।
नीतीश कुमार और लालू यादव बढ़ा सकते हैं भाजपा की मुश्किलें
भाजपा को भी इस बात का बेहतर अंदाजा है कि यदि लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार में एक साथ चुनाव लड़ते हैं, तो दलित, महादलित, मुस्लिम, ओबीसी और ईबीसी वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ चला जाएगा और वे कई सीटों पर आसानी से जीत हासिल कर लेंगे। भाजपा के पास सिर्फ ऊंची जातियां और व्यापारी समुदाय के वोट होंगे और जो उसके लिए पर्याप्त नहीं होगा। अगर नीतीश कुमार बीजेपी के साथ जाते हैं, तो बड़ी संख्या में दलित, महादलित, मुस्लिम, ओबीसी और ईबीसी मतदाता एनडीए को वोट देंगे और भगवा ब्रिगेड के लिए बिहार में अपनी 17 सीटें बरकरार रखना आसान होगा।
बिहार विधानसभा चुनाव 2015 के नतीजे दे रहे हैं गवाही
भाजपा को इस बात का एहसास है कि अगर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद बिहार में एकसाथ चुनाव लड़ते हैं, तो साल 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों का असर 2024 के चुनाव में दिख सकता है। आपको याद दिला दें कि 2015 के नतीजों में आरजेडी को 80 सीटें, जदयू को 69 और भाजपा को सिर्फ 59 सीटें मिली थीं।
इन दिनों जेडीयू और बिहार की सियासत में काफी उथल-पुथल मची हुई है। जदयू की अंदरूनी कलह नीतीश का सिरदर्द बन गई, जबकि अयोध्या के राम मंदिर को लेकर तेजस्वी यादव का बयान चुनाव से पहले उनकी परेशानी बढ़ा सकता है। अब देखना होगा कि सीट बंटवारे के बाद कितनी पार्टियां विपक्षी गठबंधन में बनी रहती है और कितनी कन्नी काट लेती है। क्या नीतीश कुमार भी INDIA से पीछा छुड़ाकर कमल के साथ वापस आ जाएंगे।
