Assembly Election Results: विधानसभा चुनाव में 'उपरोक्त में से कोई नहीं' या नोटा विकल्प को एक बार फिर मतदाताओं का खास समर्थन नहीं मिला। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों के आंकड़ों में यह बात सामने आयी है। असम को छोड़कर किसी भी राज्य में नोटा (NOTA) विकल्प ने एक प्रतिशत का आंकड़ा पार नहीं किया।
नोटा की लोकप्रियता हो रही कम (फोटो साभार: AI)
असम में 1.29 प्रतिशत मतदाताओं ने 'इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन' (EVM) पर नोटा बटन दबाया, इसके बाद पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 0.81 प्रतिशत रहा। पुडुचेरी तीसरे स्थान पर रहा, जहां 0.73 प्रतिशत मतदाताओं ने इस विकल्प का प्रयोग किया। केरल में 0.58 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा बटन दबाया, जबकि तमिलनाडु में यह आंकड़ा 0.41 प्रतिशत रहा।
कब हुई थी NOTA की शुरुआत?
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, विभिन्न राज्यों में नोटा वोट की संख्या अलग-अलग रही, जो क्षेत्रीय राजनीतिक गतिशीलता, मतदाताओं की पसंद और राजनीतिक भागीदारी के स्तर को दर्शाता है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, ईवीएम में नोटा विकल्प ने 2013 में इसकी शुरुआत के बाद से 2024 के लोकसभा चुनावों में सबसे कम प्रतिशत हिस्सेदारी दर्ज की।
NOTA में लगातार आ रही गिरावट
लोकसभा चुनाव में इस विकल्प को 2014 में पहली बार लागू किया गया था। निर्वाचन आयोग की 'एटलस-2024' नामक पुस्तक के अनुसार, पिछले तीन लोकसभा चुनावों में नोटा मत में धीरे-धीरे गिरावट आई है, जो 2014 में 1.08 प्रतिशत से घटकर 2024 में 0.99 प्रतिशत हो गई है। इस पुस्तक में पिछले वर्ष के लोकसभा चुनावों के आंकड़े शामिल हैं।
इवीएम पर नोटा विकल्प का अपना प्रतीक है, जिसमें एक मतपत्र पर एक काला 'क्रॉस' बना हुआ है। सितंबर 2013 में उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद निर्वाचन आयोग ने ईवीएम में नोटा बटन को 'वोटिंग पैनल' के अंतिम विकल्प के रूप में जोड़ा।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से पहले, जो लोग किसी भी उम्मीदवार को वोट देने के इच्छुक नहीं थे उनके पास फॉर्म 49-ओ भरने का विकल्प था। लेकिन चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 49-ओ के तहत मतदान केंद्र पर फॉर्म भरना मतदाता की गोपनीयता से समझौता करता था।
