सुप्रीम कोर्ट (SC) ने शिक्षा के अधिकार (RTE) को लेकर एक ऐतिहासिक टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं (Pre-Primary) में बच्चों का प्रवेश केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है बल्कि एक 'राष्ट्रीय मिशन' है। न्यायालय ने जोर देते हुए कहा कि RTE कानून के तहत आवंटित छात्रों को बिना किसी देरी के दाखिला देना निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी है। सुप्रिम कोर्ट का यह फैसला RTE के तरह प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश लेने वाले छात्रों के लिए एक बड़ा फैसला बताया जा रहा है।
SC ने की लखनऊ पब्लिक स्कूल की याचिका खारिज
शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पड़ोस के स्कूलों द्वारा वंचित वर्ग के छात्रों को प्रवेश देने से इनकार करना, संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत दिए गए मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट के अनुसार, RTE अधिनियम 2009 की धारा 12 के तहत कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों आरक्षित हैं। इन सीटों पर बच्चों को प्रवेश देना समाज की सामाजिक संरचना को बदलने की क्षमता रखता है। यह न केवल शिक्षा की दिशा में एक कदम है, बल्कि समाज में 'दर्जे की गई समानता' सुनिश्चित करने का एक ठोस जरिया भी है।
खारिज हुई लखनऊ पब्लिक स्कूल की अपील
बता दें कि आरटीई के तहत प्रवेश से इंकार करने का यह मामला उत्तर प्रदेश के लखनऊ पब्लिक स्कूल से जुड़ा था। स्कूल ने शैक्षणिक सत्र 2024-25 के लिए आवंटित एक छात्र को दाखिला देने से मना कर दिया था। स्कूल का तर्क था कि छात्र की पात्रता को लेकर 'अनिश्चितता' है, जबकि छात्र का चयन आधिकारिक सरकारी प्रक्रिया के तहत हुआ था। हाई कोर्ट ने स्कूल को दाखिला देने का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट के इस फैसले को स्कूल ने सुप्रिम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल की इस अपील को खारिज करते हुए कड़ा रुख अपनाया और स्पष्ट किया कि सरकारी सूची में नाम आने के बाद स्कूल देरी नहीं कर सकते।
'राष्ट्रीय मिशन' और सामाजिक बदलाव
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अधिनियम के प्रावधानों का ईमानदारी से पालन करना भारत के भविष्य के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकता है। मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का वैधानिक आदेश तभी सार्थक होगा जब स्कूल अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित समूहों के बच्चों को मुख्यधारा के स्कूलों में जगह देना समानता के संवैधानिक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है।
