मेडिकल कॉलेजों में दाखिले और पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल काउंसलिंग की व्यवस्था को पारदर्शी और आसान बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव हो सकता है। NEET-PG और NEET-SS की काउंसलिंग प्रक्रिया में पर्सेंटाइल आधारित सिस्टम की जगह रैंक आधारित मेरिट सिस्टम लागू करने की तैयारी है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में एक एक्सपर्ट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने 2027 से NEET-PG और NEET-SS काउंसलिंग में रैंक आधारित सिस्टम अपनाने के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।
NEET PG Admission 2027
यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में मामले में दाखिल की गई है। यह मामला NEET में पर्सेंटाइल घटाने की वैधता और उससे जुड़े सवालों से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) ने मौजूदा एडमिशन और काउंसलिंग व्यवस्था का व्यापक ऑडिट किया। इसके बाद विभिन्न संबंधित संस्थाओं और हितधारकों के साथ बैठकें कर सुधारों के सुझाव तैयार किए गए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट सत्यम सिंह राजपूत की भूमिका भी इस मामले में अहम है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में वह याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है, ताकि अदालत को मेडिकल काउंसलिंग और NEET एडमिशन प्रक्रिया से जुड़े तकनीकी एवं नीतिगत पहलुओं पर सहायता मिल सके। रिपोर्ट के मुताबिक, एमिकस क्यूरी ने भी विचार के लिए सुझाव और बिंदु प्रस्तुत किए थे, जिन पर एक्सपर्ट कमेटी ने विचार किया।
एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट में केवल परीक्षा के क्वालिफाइंग सिस्टम में बदलाव की बात नहीं है, बल्कि मेडिकल काउंसलिंग की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने का रोडमैप भी दिया गया है।
NEET-PG और NEET-SS में पर्सेंटाइल की जगह रैंक से दाखिले की तैयारी
रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश NEET-PG और NEET-SS के क्वालिफाइंग सिस्टम को लेकर है। फिलहाल इन परीक्षाओं में उम्मीदवारों की पात्रता तय करने के लिए पर्सेंटाइल आधारित व्यवस्था अपनाई जाती है। इसमें निर्धारित क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल के आधार पर उम्मीदवार काउंसलिंग में शामिल होने के योग्य होते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, कम पर्सेंटाइल वाले उम्मीदवारों को भी काउंसलिंग में शामिल करने के लिए कई बार क्वालिफाइंग कटऑफ घटाने का मुद्दा सामने आता है। कम स्कोर वाले उम्मीदवारों को पात्र बनाने के लिए कटऑफ में बदलाव से मेडिकल शिक्षा के न्यूनतम शैक्षणिक मानकों पर सवाल उठ सकते हैं। इसी समस्या के समाधान के लिए NMC ने पर्सेंटाइल आधारित सिस्टम की जगह रैंक आधारित मेरिट सिस्टम अपनाने के प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति दी है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि NMC के सचिव ने 1 अक्टूबर 2026 को DGHS को पत्र लिखकर NEET-PG और NEET-SS के लिए पर्सेंटाइल आधारित व्यवस्था से रैंक आधारित व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव भेजा था। इस प्रस्ताव को NMC कमीशन ने सैद्धांतिक मंजूरी दी है। हालांकि, इसके लिए नए नियम तैयार किए जा रहे हैं और उन्हें अभी अंतिम रूप दिया जाना बाकी है।
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि न्यूनतम क्वालिफाइंग मानकों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। केवल संस्थानों में सीटें खाली रह जाने के कारण कटऑफ घटाने की व्यवस्था उचित नहीं मानी जानी चाहिए।
सीट आवंटन की प्रक्रिया में NMC की सीधी भूमिका
रिपोर्ट में मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध सीटों की जानकारी और सीट मैट्रिक्स तैयार करने की प्रक्रिया में भी बदलाव का सुझाव दिया गया है। अब तक सीट मैट्रिक्स में मेडिकल संस्थानों की ओर से MCC पोर्टल पर उपलब्ध कराई गई जानकारी पर निर्भरता रहती थी। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में कॉलेजों ने सीधे MCC पोर्टल पर सीटों की जानकारी दी थी। कई मामलों में इस जानकारी का NMC के डेटा से मिलान नहीं हो पाता था। इससे सीटों की संख्या को लेकर विसंगतियां सामने आईं और काउंसलिंग प्रक्रिया प्रभावित हुई।
इस समस्या को दूर करने के लिए 2026 में NMC को भी काउंसलिंग सॉफ्टवेयर में शामिल किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, NMC को सीधे सीट मैट्रिक्स में नई सीटों की जानकारी देने की जिम्मेदारी दी गई है। इससे सीटों की संख्या में दोहराव और गलतियों को कम करने में मदद मिलेगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगले वर्षों में सीटों का एक मुख्य डेटाबेस तैयार रखा जाएगा। इसमें केवल नई सीटें जुड़ने या हटने की स्थिति में बदलाव करना होगा। इससे हर बार पूरी सीट मैट्रिक्स का दोबारा सत्यापन करने की जरूरत कम होगी।
FREEZE और FLOAT सिस्टम से छात्रों को मिलेगी राहत
काउंसलिंग प्रक्रिया में छात्रों को होने वाली परेशानियों को कम करने के लिए FREEZE और FLOAT की व्यवस्था लागू की गई है। इसके तहत उम्मीदवारों को अपनी सीट और आगे अपग्रेडेशन के विकल्प के आधार पर निर्णय लेने का मौका मिलता है।
FREEZE का मतलब: उम्मीदवार को जो सीट आवंटित हुई है, वह उसे स्वीकार कर उसी सीट पर दाखिला लेने का फैसला करता है।
FLOAT का मतलब: उम्मीदवार आवंटित सीट को स्वीकार करते हुए अगले राउंड में अपनी पसंद के बेहतर कॉलेज या सीट पर अपग्रेड होने का विकल्प बनाए रखता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पहले उम्मीदवारों को अपग्रेडेशन के लिए कई बार कॉलेजों में जाकर दस्तावेजों और फीस से संबंधित औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती थीं। इससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती थी।
अब अपग्रेडेशन की प्रक्रिया ऑनलाइन की गई है। उम्मीदवारों को अपने दस्तावेज ऑनलाइन अपलोड करने की सुविधा दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, उम्मीदवार को फीस का भुगतान केवल एक बार करना होगा, जहां वह अंततः दाखिला लेने का फैसला करेगा। इस व्यवस्था का मकसद छात्रों को बार-बार कॉलेज जाने, फीस जमा करने और दस्तावेजों के सत्यापन की परेशानी से बचाना है।
कॉलेजों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे, ऑनलाइन होंगे दस्तावेज सत्यापित
रिपोर्ट में बताया गया है कि काउंसलिंग प्रक्रिया में दस्तावेज अपलोड करने और उनकी जांच की व्यवस्था को भी डिजिटल बनाया गया है। अब उम्मीदवार ऑनलाइन अपने दस्तावेज अपलोड कर सकते हैं। हालांकि, दस्तावेजों का सत्यापन संबंधित कॉलेज के नोडल अधिकारी की ओर से ऑनलाइन किया जाएगा।
यदि किसी दस्तावेज में कमी या गड़बड़ी पाई जाती है तो उम्मीदवार को उसे दोबारा अपलोड करने का अवसर मिलेगा। इसके लिए Query Resolution Mechanism भी बनाया गया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि उम्मीदवार को छोटी-मोटी दस्तावेजी कमियों के कारण काउंसलिंग से बाहर न होना पड़े और प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी न हो।
प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस को लेकर भी सुझाव
एक्सपर्ट कमेटी ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटी में फीस के ढांचे को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी मेडिकल संस्थानों में 50 प्रतिशत सीटों की फीस निर्धारित करने के लिए NMC के 2022 के दिशा-निर्देश मौजूद हैं। हालांकि, फीस को लेकर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं और इस विषय पर कई मामले अदालतों में भी लंबित हैं।
कमेटी ने सुझाव दिया है कि संबंधित राज्य सरकारों की फीस निर्धारण समितियां इस मामले को देखें और फीस के ढांचे को तर्कसंगत बनाने पर विचार करें। इसका उद्देश्य निजी मेडिकल कॉलेजों में फीस से जुड़ी असमानताओं को कम करना और उम्मीदवारों के लिए एडमिशन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है।
खाली नॉन-क्लीनिकल सीटों पर सर्विस बॉन्ड से छूट का सुझाव
रिपोर्ट में खाली रह जाने वाली पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल सीटों का मुद्दा भी उठाया गया है। कमेटी ने सुझाव दिया है कि नॉन-क्लीनिकल और क्लीनिकल ब्रांच की फीस में अंतर पर विचार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही नॉन-क्लीनिकल ब्रांच में खाली रह जाने वाली सीटों को भरने के लिए फीस को तर्कसंगत बनाने की संभावना पर विचार करने को कहा गया है।
एक और महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि यदि उम्मीदवार खाली रह गई नॉन-क्लीनिकल सीटों पर दाखिला लेते हैं तो उन्हें सर्विस बॉन्ड से छूट देने पर विचार किया जा सकता है। कमेटी का मानना है कि इससे खाली सीटों को भरने में मदद मिल सकती है और मेडिकल शिक्षा में उपलब्ध सीटों का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा।
सीट ब्लॉकिंग रोकने के लिए बायोमेट्रिक और KYC व्यवस्था
काउंसलिंग प्रक्रिया में सीट ब्लॉकिंग यानी उम्मीदवारों की ओर से सीट रोककर रखने की समस्या को भी रिपोर्ट में शामिल किया गया है। कमेटी ने सुझाव दिया है कि इस पर रोक लगाने के लिए परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों और NBEMS को तकनीकी उपाय अपनाने चाहिए।
इसके लिए KYC और बायोमेट्रिक सत्यापन की व्यवस्था लागू करने की संभावना पर विचार करने को कहा गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उम्मीदवारों की पहचान सही तरीके से सत्यापित हो और कोई उम्मीदवार अनुचित तरीके से एक से अधिक सीटों को रोककर न रख सके।
काउंसलिंग की समयसीमा तय करने और जवाबदेही बढ़ाने की तैयारी
रिपोर्ट में काउंसलिंग प्रक्रिया के लिए समयसीमा निर्धारित करने पर भी जोर दिया गया है। कमेटी ने कहा है कि NMC को नए मेडिकल कॉलेजों, सीटों की संख्या में वृद्धि और नवीनीकरण से संबंधित मंजूरियां समय पर देनी चाहिए, ताकि काउंसलिंग में देरी न हो। इसके अलावा MCC को हर साल काउंसलिंग प्रक्रिया का ऑडिट करने, SOP तैयार करने और संबंधित संस्थाओं के साथ नियमित बैठकें आयोजित करने का सुझाव दिया गया है। कमेटी ने काउंसलिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए फीडबैक सिस्टम और काउंसलिंग प्रोजेक्ट चार्टर तैयार करने की भी बात कही है। इससे प्रक्रिया में शामिल सभी संस्थाओं की जिम्मेदारियां तय की जा सकेंगी।
2027 के लिए क्या है आगे का रोडमैप?
रिपोर्ट में मेडिकल काउंसलिंग व्यवस्था में 2027 से लागू किए जाने वाले सुधारों का भी जिक्र है। MCC पूरे काउंसलिंग सिस्टम को डिजिटल बनाने की दिशा में काम कर रही है। इसमें सॉफ्टवेयर के जरिए सीट आवंटन, दस्तावेजों का सत्यापन, फीस से जुड़ी जानकारी और उम्मीदवारों की शिकायतों के समाधान को अधिक पारदर्शी बनाने की योजना है।
NMC की ओर से भी रैंक आधारित मेरिट सिस्टम के लिए नए नियम तैयार किए जा रहे हैं। वहीं NBEMS और NTA ने भी भविष्य में परीक्षा परिणामों को रैंक आधारित बनाने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव पर NMC की अंतिम नियामकीय प्रक्रिया अभी पूरी होनी है।
रिपोर्ट में साफ किया गया है कि इन बदलावों का मकसद केवल खाली सीटों को भरना नहीं, बल्कि मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखते हुए काउंसलिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और प्रभावी बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट में पेश इस एक्सपर्ट कमेटी रिपोर्ट के जरिए मेडिकल एडमिशन की मौजूदा व्यवस्था में सुधार का एक व्यापक खाका सामने आया है। अब इन सिफारिशों पर संबंधित संस्थाओं की आगे की कार्रवाई और नेशनल मेडिकल काउंसिल के प्रस्तावित नियमों पर नजर रहेगी।
