Kargil Vijay Diwas Poem In Hindi 26 (कारगिल विजय दिवस पर कविता): इस बार भारतवर्ष अपना 27वां कारगिल विजय दिवस मना (Kargil Vijay Diwas Poem) रहा है। यह दिन भारतीय सेना के अद्भुत साहस, वीरता और देशभक्ति को नमन करने का अवसर है। यह जीत केवल एक सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि पूरे देश के आत्मविश्वास, एकता और राष्ट्रभक्ति की मिसाल (Kargil Vijay Diwas Poem In Hindi) भी बनी। भारत- पाकिस्तान का यह युद्ध ऐतिहासिक माना (Kargil Vijay Diwas Par Kavita) जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इस युद्ध को सबसे भयानक माना जाता है। इस युद्ध में भारत के करीब 500 जवान शहीद हुए थे और 13000 से ज्यादा जवान घायल हुए थे, लेकिन इसके बावजूद सैनिकों ने भारत माता के मस्तक को नहीं झुकने दिया और पाकिस्तानी सैनिकों को रौंदते हुए कारगिल की चोटी पर तिरंगा फहरा दिया था। इस दिन को याद कर आज भी हर भारतीय का सीना गर्व से फूल जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।
Kargil Vijay Diwas Poem In Hindi 2026: कारगिल विजय दिवस पर देशभक्ति कविताएं
इस अवसर पर स्कूल, कॉलेज व अन्य शैक्षणिक संस्थानों और सामाजित स्थलों पर देशभक्ति कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। ऐसे में यहां हम आपके लिए कारगिल विजय दिवस पर देशभक्ति कविता लेकर आए हैं।
Kargil Vijay Diwas Poem In Hindi: कारगिल विजय दिवस पर कविता हिंदी में
कलम, आज उनकी जय बोल
जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल
- रामधारी सिंह दिनकर
मैं केशव का पाञ्चजन्य
मैं केशव का पाञ्चजन्य भी गहन मौन में खोया हूँ
उन बेटों की आज कहानी लिखते-लिखते रोया हूँ
जिस माथे की कुमकुम बिन्दी वापस लौट नहीं पाई
चुटकी, झुमके, पायल ले गई कुर्बानी की अमराई
कुछ बहनों की राखियां जल गई हैं बर्फीली घाटी में
वेदी के गठबन्धन खोये हैं कारगिल की माटी में
पर्वत पर कितने सिन्दूरी सपने दफन हुए होंगे
बीस बसंतों के मधुमासी जीवन हवन हुए होंगे
टूटी चूड़ी, धुला महावर, रूठा कंगन हाथों का
कोई मोल नहीं दे सकता वासन्ती जज्बातों का
जो पहले-पहले चुम्बन के बाद लाम पर चला गया
नई दुल्हन की सेज छोड़कर युद्ध-काम पर चला गया
उनको भी मीठी नीदों की करवट याद रही होगी
खुशबू में डूबी यादों की सलवट याद रही होगी
उन आँखों की दो बूंदों से सातों सागर हारे हैं
जब मेंहदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैं
गीली मेंहदी रोई होगी छुपकर घर के कोने में
ताजा काजल छूटा होगा चुपके-चुपके रोने में
जब बेटे की अर्थी आई होगी सूने आँगन में
शायद दूध उतर आया हो बूढ़ी माँ के दामन में
वो विधवा पूरी दुनिया का बोझा सिर ले सकती है
जो अपने पति की अर्थी को भी कंधा दे सकती है
मैं ऐसी हर देवी के चरणों में शीश झुकाता हूँ
इसीलिए मैं कविता को हथियार बनाकर गाता हूँ
जिन बेटों ने पर्वत काटे हैं अपने नाखूनों से
उनकी कोई मांग नहीं है दिल्ली के कानूनों से
जो सैनिक सीमा रेखा पर ध्रुव तारा बन जाता है
उस कुर्बानी के दीपक से सूरज भी शरमाता है
गर्म दहानों पर तोपों के जो सीने अड़ जाते हैं
उनकी गाथा लिखने को अम्बर छोटे पड़ जाते हैं
उनके लिए हिमालय कंधा देने को झुक जाता है
कुछ पल सागर की लहरों का गर्जन रुक जाता है
उस सैनिक के शव का दर्शन तीरथ-जैसा होता है
चित्र शहीदों का मन्दिर की मूरत जैसा होता है।
- हरिओम पंवार
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते
पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा
अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता
अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता
दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता
इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो
चिनगारी का खेल बुरा होता है
औरों के घर आग लगाने का जो सपना
वो अपने ही घर में सदा खरा होता है
अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो
अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ
ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो
आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ
पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है?
तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई
अंग्रेजों के बल पर दो टुकड़े पाये हैं
माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई?
अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को
दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से
तुम बच लोगे यह मत समझो
धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से
कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो
हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से
भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो
जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष
स्वातन्त्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
अगणित जीवन यौवन अशेष
अमरीका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध
काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते
पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा।
- अटल बिहारी वाजपेयी
पुष्प की अभिलाषा
चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना बनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने
जिस पथ पर जावें वीर अनेक
- माखनलाल चतुर्वेदी
यहां आप कारगिल विजय दिवस पर देशभक्ति कविताएं पढ़ सकते हैं।
