वाराणसी : कहते हैं कि बनारस में मेला नहीं, बल्कि लक्खा मेला लगता है। ऐसा मेला, जिसमें शामिल होने के लिए लाखों लोग पहुंचते हैं और भीड़ इतनी होती है कि पैर रखने तक की जगह नहीं बचती। काशी के ऐसे ही लक्खा मेलों में भरत मिलाप की परंपरा का खास स्थान है।
काशी में चन्द मिनटों की लीला को देखने पहुंचे लाखों लोग
धर्मनगरी काशी में एक बार फिर वह भावुक पल जीवंत हो उठा, जिसका इंतजार लोगों को पूरे साल रहता है। ढलते सूरज की रोशनी के बीच जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम अपने छोटे भाई भरत से मिलते हैं, तो यह दृश्य हर किसी को भावुक कर देता है। ऐसा लगता है, मानो पूरा बनारस इस मिलन के भाव में डूब गया हो।
भरत मिलाप की लीला भले ही महज 3 मिनट 36 सेकंड की होती है, लेकिन इसके लिए काशीवासियों का इंतजार पूरे साल रहता है। शाम 4:40 बजे जैसे ही समय हुआ, पुष्पक विमान के रूप में सजे रथ से भगवान श्रीराम नीचे उतरे और दौड़कर भरत को गले लगा लिया। चारों भाइयों के इस मिलन को देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के गले मिलते ही पूरा मैदान 'सियावर रामचंद्र की जय' और 'हर-हर महादेव' के जयकारों से गूंज उठा। काशी की यह परंपरा भाईचारे, प्रेम, त्याग और समर्पण का संदेश देती है।
यादव बंधु निभाते हैं परंपरा की अहम जिम्मेदारी
भरत मिलाप की लीला काशी की जीवंत सांस्कृतिक परंपरा की भी झलक दिखाती है। इस आयोजन की जिम्मेदारी काशी के यादव बंधु संभालते हैं। खास अवसर पर वे पारंपरिक वेशभूषा में नजर आते हैं। सफेद धोती-कुर्ता, सिर पर पगड़ी और आंखों में काजल लगाए यादव बंधु इस मेले की खास पहचान हैं। भगवान राम के पुष्पक विमान रूपी रथ को भी वे अपने कंधों पर उठाकर लाते हैं।
हाथी पर सवार होकर पहुंचे काशी नरेश
भरत मिलाप में काशी नरेश की मौजूदगी भी परंपरा का अहम हिस्सा है। इस बार भी काशी नरेश अनंत नारायण सिंह हाथी पर सवार होकर नाटी इमली मैदान पहुंचे। उन्होंने भगवान श्रीराम के चरणों में नमन कर आशीर्वाद लिया। उनके पीछे सैकड़ों यादव बंधुओं की टोली चलती है, जो इस आयोजन की पारंपरिक भव्यता को और खास बनाती है।
संत मेघा भगत से जुड़ी है भरत मिलाप की मान्यता
भरत मिलाप की शुरुआत को लेकर मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन संत मेघा भगत को एक बार सपने में भगवान श्रीराम ने दर्शन दिए थे। कहा जाता है कि प्रभु ने उन्हें इसी स्थान पर भरत मिलाप की लीला आयोजित करने का निर्देश दिया था। इसके बाद संत मेघा भगत ने नाटी इमली मैदान में पहली बार इस लीला का मंचन किया। मान्यता के अनुसार, राम-भरत मिलन के चरम क्षण में संत मेघा भगत भावविभोर होकर मूर्छित हो गए और उन्होंने देह त्याग दी। तभी से भरत मिलाप की यह परंपरा लगातार चली आ रही है और आज भी लाखों लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है।
