सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन कैदियों के वोटिंग अधिकार को लेकर केंद्र सरकार से जवाब तलब; याचिका के जरिए मांगी​ 3 राहतें

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें जेल में बंद विचाराधीन कैदियों को मतदान का अधिकार देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि विचाराधीन कैदी, जो दोष सिद्ध होने से पहले हैं, उन्हें वोटिंग से वंचित रखना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के खिलाफ है। इसमें जेलों में मतदान केंद्र स्थापित करने या डाक मतपत्र के माध्यम से वोट डालने की सुविधा देने की भी अपील की गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें जेल में बंद विचाराधीन कैदियों को मतदान का अधिकार देने की मांग की गई है। यह याचिका अधिवक्ता डॉ. सुनीता शर्मा ने दाखिल की है, जिसकी सुनवाई की मांग आज वकील प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश बी आ गवई के समक्ष की। याचिकाकर्ता ने कहा है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां हर नागरिक को शासन चुनने का समान अधिकार मिला है। संविधान के अनुच्छेद 326 में स्पष्ट कहा गया है कि हर वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार है। लेकिन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 62(5) जेल में बंद सभी व्यक्तियों को मतदान से वंचित करती है, चाहे वे दोषी सिद्ध हुए हों या नहीं। यह ब्लैंकेट बैन यानी एक समान रोक, संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के खिलाफ है।

Supreme Court of India (Photo: ANI)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: ANI)

निर्दोषता की धारणा के सिद्धांत के खिलाफ

याचिका में कहा गया है कि लगभग 4.5 लाख कैदी देशभर की 1,330 जेलों में बंद हैं, जिनमें 75 प्रतिशत से अधिक विचाराधीन हैं। इनमें से कई लोग वर्षों से मुकदमे के लंबित रहने के कारण जेल में हैं। ऐसे में जब उनका दोष सिद्ध नहीं हुआ है, तो उन्हें मतदान से वंचित रखना निर्दोषता की धारणा (Presumption of Innocence) के सिद्धांत के खिलाफ है। याचिका में यह भी कहा गया कि भारतीय दंड संहिता या नई न्याय संहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो कैदियों के मतदान अधिकार को खत्म करता हो। याचिका में निर्वाचन आयोग की वर्ष 2016 की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है, जिसमें आयोग ने नो वोटर टू बी लेफ्ट बिहाइंड मिशन के तहत कहा था कि विचाराधीन कैदियों को मतदान का अधिकार दिया जाना चाहिए।

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