Delhi Riots 2020: राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान हिंसा भड़काने के मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दो साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने कहा कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होने के नाते उसकी जिम्मेदारी इलाके में शांति और सद्भाव बनाए रखने की थी, लेकिन उसने अपनी स्थिति का इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए किया।
हुसैन को 10 अक्टूबर को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 147 (दंगा करने) और 109 (अपराध के लिए उकसाने या उसमें सहायता करने) के तहत दोषी ठहराया गया था। शुक्रवार को सुनाए गए फैसले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने कहा, ''दोषी को कम सजा देने के पक्ष में पेश की गई परिस्थितियों की तुलना में अधिक सजा देने को उचित ठहराने वाले कारक कहीं अधिक प्रभावी हैं। ऐसी कोई भी ठोस वजह सामने नहीं आई है, जो कम सजा दिए जाने को उचित ठहरा सके।''
विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडे ने हुसैन के लिए अधिकतम सजा का अनुरोध किया। उन्होंने दलील दी कि दंगों से जुड़े एक मामले में यह उसकी दूसरी दोषसिद्धि है। उन्होंने दलील दी कि उस समय निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने के नाते हुसैन की जिम्मेदारी शांति बनाए रखने की थी, लेकिन इसके बजाय उसने दंगाइयों को अपने घर का इस्तेमाल आम लोगों पर हमला करने के लिए करने दिया और इस तरह दंगों को बढ़ावा दिया।
अदालत ने इस दलील पर गौर करते हुए कहा कि सांप्रदायिक तनाव से भरे माहौल में हुसैन से अपेक्षा की जाती थी कि वह लोगों को संयम बरतने के लिए प्रेरित करें और उन्हें हिंसा करने से रोकें। न्यायाधीश ने कहा, ''इस जिम्मेदारी को निभाने के बजाय, दोषी को दंगों को भड़काने में मदद करने का दोषी पाया गया है। उसने अपना घर दंगाइयों को उपलब्ध कराया, जो इलाके की सबसे ऊंची जगह पर स्थित था और जहां से दंगाई लोगों पर हमला कर सकते थे तथा संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकते थे।"
बचाव पक्ष के कम सजा देने के अनुरोध को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि दंगाई भीड़ में हुसैन की प्रत्यक्ष मौजूदगी न होने से उसके अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती। अदालत ने हुसैन के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि जब भीड़ ने जबरन उसके घर पर कथित तौर पर कब्जा कर लिया था, तब वह मजबूर थे और उसने पुलिस नियंत्रण कक्ष में कई बार फोन किया था। अदालत ने कहा कि वह न तो कथित फोन कॉल किए जाने का सबूत पेश कर सका और न ही अपने बचाव में कोई अन्य साक्ष्य प्रस्तुत कर सका।
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न्यायाधीश ने यह भी कहा कि हुसैन ने किसी ज्ञात या अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ यह आरोप लगाते हुए कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी कि उन्होंने दंगों के दौरान जबरन उनके घर पर कब्जा कर लिया था और वहां से लोगों पर हमले किए थे। अदालत ने कहा कि बचाव पक्ष की ओर से सजा में रियायत देने के पक्ष में पेश की गई परिस्थितियों की तुलना में सजा को कठोर बनाने वाले कारक कहीं अधिक प्रभावी थे। अदालत ने हुसैन को दो साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई और 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
हुसैन को 24 फरवरी, 2020 को अपने घर की छत का इस्तेमाल भीड़ को करने देने के लिए दोषी ठहराया गया था। उसका यह घर मेन करावल नगर रोड पर स्थित था, जहां से भीड़ ने राहगीरों और आसपास की संपत्तियों पर पथराव किया था। अदालत ने 10 अक्टूबर के अपने फैसले में उसे अधिक गंभीर आरोपों से बरी कर दिया था।
दंगों से जुड़े एक मामले में हुसैन को दूसरी बार दोषी ठहराया गया है। इससे पहले 31 जुलाई को दिल्ली की एक अदालत ने आसूचना ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में हुसैन और चार अन्य दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दंगों के सिलसिले में उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के कुछ ही घंटों बाद, फरवरी 2020 में आम आदमी पार्टी ने हुसैन को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और संपत्ति को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा था।
