Wrongful Termination : सुप्रीम कोर्ट ने देश के श्रम और सेवा कानूनों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी नियोक्ता (Employer) को सिर्फ इसलिए 10 साल से अधिक समय से काम कर रहे कर्मचारी को नौकरी से निकालने या बर्खास्त करने की इजाजत देता हो, क्योंकि उसके खिलाफ कोई क्रिमिनल केस पेंडिंग है। सुप्रीम कोर्ट की बैंच (जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू) ने 14 साल लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने वाले एक पीड़ित कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसकी बर्खास्तगी को अनुचित और गैरकानूनी करार दिया। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कर्मचारी को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
पेंडिंग केस में बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कर्मचारी के हक में सुनाया 5 लाख रुपये के मुआवजे का फैसला (तस्वीर-AI)
क्या था पूरा मामला? 1991 से शुरू हुई कहानी
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला पंजाब के रहने वाले कर्मचार से जुड़ा है। 17 अक्टूबर 1991 को सेवा में शामिल हुए थे और पंजाब के बटाला जिले में तैनात थे। उन्होंने अगस्त 2002 तक बिना किसी परेशानी के अपनी सेवाएं दीं। 27 अगस्त 2002 को उनका चयन पटियाला में एक उच्च पद के लिए हुआ। तीन दिन बाद 30 अगस्त 2002 को जब उन्होंने पटियाला कार्यालय में जॉइन करने के लिए रिपोर्ट किया, तो मैनेजमेंट ने उन्हें जॉइन कराने से इनकार कर दिया। इसके पीछे की वजह उनके खिलाफ पेंडिंग एक आपराधिक मामला (FIR) बताई गई। यह एफआईआर साल 2001 में पठानकोट के सदर पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 324, 326 और 34 के तहत दर्ज हुई थी।
निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक का सफर
मामला अदालत में गया और अप्रैल 2006 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने कर्मचारी को दोषी ठहराते हुए दो और तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। हालांकि, इसके बाद एडिशनल सेशन जज के समक्ष अपील करने पर अगस्त 2007 में उन्हें राहत मिली। सेशन जज ने धारा 326 के तहत सजा रद्द कर दी और धारा 324 की सजा को बरकरार रखते हुए उन्हें प्रोबेशन (सदाचरण की शर्त) पर रिहा कर दिया। सबसे खास बात यह रही कि जज ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा था कि इस सजा का उनके सर्विस करियर (नौकरी) पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
इसके बाद कर्मचारी ने नौकरी में बहाली के लिए निचली अदालत का रुख किया। 2011 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें नौकरी पर वापस रखने का आदेश दिया, लेकिन बर्खास्तगी से लेकर बहाली तक की अवधि का वेतन देने से इनकार कर दिया। इसके खिलाफ जब नियोक्ता अपील में गया, तो 2014 में अपीलीय अदालत ने कर्मचारी का केस खारिज कर दिया। बाद में 2016 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अपीलीय अदालत के फैसले को सही ठहराया। अंततः कर्मचारी को न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
4 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्) ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि कर्मचारी के वकीलों (प्रदीप गुप्ता, परिणव गुप्ता और अन्य) की दलील में दम था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 12 किसी सरकारी कर्मचारी को अनुशासनात्मक कार्रवाई से पूरी तरह सुरक्षा नहीं देती। लेकिन, इसके बावजूद किसी भी कर्मचारी को केवल आपराधिक मुकदमा 'पेंडिंग' होने के आधार पर सेवा से बर्खास्त कर देना सरासर गलत और मनमाना कदम है। कोर्ट ने कहा कि जब बर्खास्तगी का आदेश जारी किया गया था (14 जनवरी 2003), तब केवल केस पेंडिंग था। बाद में हुई सजा उस समय के गैरकानूनी फैसले को सही साबित नहीं कर सकती।
खराब कानूनी सलाह और कमियों के बावजूद मिला न्याय
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सिंह के वकीलों द्वारा शुरू में तैयार किया गया केस काफी कमजोर था। याचिका में कई जरूरी जानकारियां गायब थीं, बर्खास्तगी के मूल आदेश को चुनौती देने के बजाय सीधे बहाली की मांग की गई थी (जो स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट के तहत सिविल कोर्ट नहीं दे सकता) और अतिरिक्त सबूत देने के लिए कोई अर्जी नहीं लगाई गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी वकील की खराब सलाह या प्रक्रियात्मक कमियों की वजह से किसी नागरिक को नियोक्ता के इतने अवैध और मनमाने रवैये का शिकार नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि सिविल कोर्ट केवल मुआवजे का आदेश दे सकता था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए नियोक्ता को 3 महीने के भीतर सिंह को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
