सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: पेंडिंग क्रिमिनल केस के आधार पर नौकरी से निकालना गैरकानूनी, 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश

Wrongful Termination: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पेंडिंग क्रिमिनल केस के आधार पर कर्मचारी को नौकरी से निकालना गैरकानूनी है। 14 साल की कानूनी लड़ाई के बाद पीड़ित को 5 लाख रुपये का मुआवजा मिला।

Wrongful Termination : सुप्रीम कोर्ट ने देश के श्रम और सेवा कानूनों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी नियोक्ता (Employer) को सिर्फ इसलिए 10 साल से अधिक समय से काम कर रहे कर्मचारी को नौकरी से निकालने या बर्खास्त करने की इजाजत देता हो, क्योंकि उसके खिलाफ कोई क्रिमिनल केस पेंडिंग है। सुप्रीम कोर्ट की बैंच (जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू) ने 14 साल लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने वाले एक पीड़ित कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसकी बर्खास्तगी को अनुचित और गैरकानूनी करार दिया। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कर्मचारी को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।

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पेंडिंग केस में बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कर्मचारी के हक में सुनाया 5 लाख रुपये के मुआवजे का फैसला (तस्वीर-AI)

क्या था पूरा मामला? 1991 से शुरू हुई कहानी

ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला पंजाब के रहने वाले कर्मचार से जुड़ा है। 17 अक्टूबर 1991 को सेवा में शामिल हुए थे और पंजाब के बटाला जिले में तैनात थे। उन्होंने अगस्त 2002 तक बिना किसी परेशानी के अपनी सेवाएं दीं। 27 अगस्त 2002 को उनका चयन पटियाला में एक उच्च पद के लिए हुआ। तीन दिन बाद 30 अगस्त 2002 को जब उन्होंने पटियाला कार्यालय में जॉइन करने के लिए रिपोर्ट किया, तो मैनेजमेंट ने उन्हें जॉइन कराने से इनकार कर दिया। इसके पीछे की वजह उनके खिलाफ पेंडिंग एक आपराधिक मामला (FIR) बताई गई। यह एफआईआर साल 2001 में पठानकोट के सदर पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 324, 326 और 34 के तहत दर्ज हुई थी।

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