Sugar Price Hike Explained : त्योहारों का मौसम दस्तक दे रहा है और रसोई के बजट में मिठास घोलने वाली चीनी अब आम जनता का जायका कड़वा कर रही है। पिछले कुछ ही हफ्तों में खुदरा बाजारों से लेकर थोक मंडियों तक चीनी के दाम तेजी से उछले हैं। जुलाई में जो चीनी 48 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास बिक रही थी, वह अगस्त तक आते-आते 56 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर को छू चुकी है। पश्चिम बंगाल में 70 रुपये किलो तक पहुंच चुकी है। चीनी की कीमतों में आए इस अचानक उछाल ने उपभोक्ताओं और बाजार एक्सपर्ट्स दोनों को हैरान कर दिया है। बाजार के एक बड़े हिस्से में यह चर्चा जोरों पर है कि सरकार की पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने (E20) की महत्वाकांक्षी योजना के कारण गन्ने और चीनी का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में ज्यादा हो रहा है, जिससे बाजार में चीनी की किल्लत हो गई है। लेकिन क्या वाकई देश में चीनी की कड़वाहट के पीछे E20 पॉलिसी जिम्मेदार है या फिर इसके पीछे जमाखोरी, सट्टेबाजी और मौसम का कोई बड़ा खेल छिपा है? खाद्य मंत्रालय और उद्योग के आंकड़े इस पूरे मामले की एक अलग ही कहानी बयां करते हैं।
क्या एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) ही है चीनी महंगी होने का असली कारण?
आमतौर पर यह माना जा रहा है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के अत्यधिक उपयोग से घरेलू आपूर्ति प्रभावित हुई है। हालांकि, खाद्य मंत्रालय ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 में जहां एथेनॉल बनाने में कुल चीनी का करीब 12 प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल होता था, वहीं 2025-26 के मार्केटिंग सत्र में यह घटकर महज 9 प्रतिशत (करीब 28 लाख टन) रह गया है। दरअसल, सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के स्रोतों में बड़ा बदलाव किया है। अब कुल एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई (75%) हिस्सा चीनी या गन्ने के बजाय अनाज, मुख्य रूप से मक्के से तैयार किया जा रहा है। एथेनॉल उत्पादन के डायवर्सीफिकेशन के कारण चीनी पर एथेनॉल पॉलिसी का दबाव काफी कम हुआ है। ऐसे में एथेनॉल ब्लेंडिंग को चीनी के बढ़ते दामों का मुख्य विलेन मानना आंकड़ों के लिहाज से सही साबित नहीं होता।
उत्पादन का गणित: बारिश, बीमारियां और कम होता अनुमान
चीनी की कीमतों में तेजी का एक बड़ा कारण चालू सीजन में उत्पादन का अनुमान से कम रहना है। शुरुआत में गन्ना उत्पादक राज्यों ने 2025-26 सत्र के लिए 343 लाख टन (3.43 करोड़ टन) चीनी उत्पादन का अनुमान जताया था। हालांकि, मौसम की मार और फसलों में लगी बीमारियों के कारण यह अनुमान घटकर 306 लाख टन (3.06 करोड़ टन) पर आ गया है। उत्पादन में इस गिरावट के पीछे दो मुख्य वजहें रही हैं:-
- मौसम का मिजाज:- कई प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और जलभराव के कारण गन्ने की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है।
- फसलों की बीमारियां:- गन्ने के खेतों में 'रेड रॉट' (लाल सड़न रोग) और 'टॉप बोरर' (कीट) जैसे गंभीर रोगों के फैलने से प्रति एकड़ उपज और रिकवरी रेट में गिरावट आई है।
जमाखोरी, सट्टेबाजी और त्योहारी मांग का गठजोड़
जब देश में पर्याप्त भंडार मौजूद है, तो फिर मिल स्तर पर 7 से 10 दिनों के भीतर कीमतें 47-48 रुपये से बढ़कर 62 रुपये प्रति किलोग्राम तक कैसे पहुंच गईं? सरकार के अनुसार, इस अप्रत्याशित मूल्य वृद्धि का कोई ठोस और बुनियादी कारण नहीं है। यह विशुद्ध रूप से बाजार के कुछ हिस्सों द्वारा की जा रही सट्टेबाजी, मुनाफाखोरी और कृत्रिम किल्लत पैदा करने की साजिश है। अगस्त और सितंबर के महीनों में रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, कजरी तीज और आने वाले नवरात्र-दीपावली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की डिमांड चरम पर होती है। शीतल पेय, मिठाई और आइसक्रीम विनिर्माताओं जैसे थोक उपभोक्ता इस दौरान बड़े पैमाने पर चीनी खरीदते हैं। इसी का फायदा उठाते हुए कुछ व्यापारियों और चीनी मिलों ने कृत्रिम कमी का डर पैदा कर चीनी का स्टॉक रोकना शुरू कर दिया, जिससे कीमतें अचानक बढ़ गईं।
सरकार का दावा- चीनी का भंडार फुल
अंतरराष्ट्रीय बाजार का दबाव और वैश्विक किल्लत
घरेलू कारकों के अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार के हालात ने भी आग में घी डालने का काम किया है। वैश्विक स्तर पर भी चीनी की आपूर्ति तंग बनी हुई है। मौसम की अनिश्चितताओं के कारण 2026-27 में वैश्विक स्तर पर करीब 33 लाख टन चीनी की कमी का अनुमान लगाया जा रहा है। जून के अंत में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्ची चीनी की कीमत जो 474 डॉलर प्रति टन थी, वह अगस्त तक 16 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई। वैश्विक बाजार में तेज उछाल के कारण घरेलू सट्टेबाजों को कीमतें बढ़ाने का एक मनोवैज्ञानिक बहाना मिल गया।
कीमतों को अंकुश में लाने के लिए सरकार के कड़े कदम
चीनी के कड़वे होते स्वाद को वापस मीठा करने और त्योहारी सीजन में आम उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने कई एहतियाती कदम उठाए हैं:-
- स्टॉक सीमा में कटौती:- कारोबारियों के लिए 30 नवंबर तक चीनी भंडारण की अधिकतम सीमा 400 टन तय की गई है, जिसे और कम करने पर विचार हो रहा है। इसके अलावा, थोक उपभोक्ताओं (जैसे कोल्ड ड्रिंक्स और मिठाई कंपनियां) के लिए 15 दिन की खपत से ज्यादा का स्टॉक रखने पर रोक लगा दी गई है।
- शुल्क-मुक्त आयात:- बाजार में आपूर्ति तुरंत बढ़ाने के लिए सरकार ने 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के बिना सीमा शुल्क आयात की अनुमति दी है।
- रिफाइनरियों को छूट:- अग्रिम मंजूरी योजना के तहत कच्ची चीनी आयात करने वाली रिफाइनरियों को अपने घरेलू भंडार की बिक्री करने की इजाजत दी गई है, जिससे बाजार में 3 से 4 लाख टन अतिरिक्त चीनी आ चुकी है।
- जांच और सख्त कार्रवाई:- राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सट्टेबाजों, कालाबाजारियों और जमाखोरों पर नकेल कसें। केंद्र और राज्यों की संयुक्त टीमें चीनी मिलों में रखे स्टॉक की जांच कर रही हैं।
- जल्दी पेराई सत्र:- मिलों को 15 अक्टूबर के आसपास ही नए पेराई सत्र की शुरुआत करने को कहा गया है, जिससे अक्टूबर महीने में ही 10 से 12 लाख टन नई चीनी बाजार में उपलब्ध हो जाएगी।
गन्ना किसानों और चीनी उद्योग के लिए एथेनॉल पॉलिसी का सच
कीमतों में अस्थाई उछाल के बावजूद, एथेनॉल कार्यक्रम ने लॉन्गटर्म रूप से भारत के चीनी उद्योग को मजबूती दी है। अतीत में भारत में चीनी का अत्यधिक उत्पादन होता था, जिससे मिलों की कार्यशील पूंजी फंस जाती थी और वे गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान नहीं कर पाती थीं। एथेनॉल पॉलिसी के कारण मिलों की वित्तीय स्थिति सुधरी है। 2025-26 के चालू सत्र में 20 अगस्त तक गन्ना किसानों के कुल बकाये का 97 प्रतिशत भुगतान किया जा चुका है। मिलों के आत्मनिर्भर होने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी खत्म हुआ है। 2014 से 2021 के बीच सरकार को उद्योग को संभालने के लिए करीब 14,600 करोड़ रुपये की सब्सिडी देनी पड़ी थी, लेकिन 2021-22 के बाद से किसी नई सब्सिडी की जरूरत नहीं पड़ी है।
मिठास वापस लौटने का भरोसा
साफ है कि चीनी की कीमतों में आई हालिया तेजी का कारण एथेनॉल ब्लेंडिंग या गन्ने का विचलन नहीं है। यह तेजी मौसम की मार से उत्पादन में आई मामूली कमी, त्योहारी सीजन से ठीक पहले सट्टेबाजी और मुनाफाखोरी का नतीजा है। सितंबर 2026 के अंत तक देश के पास 33 से 35 लाख टन चीनी का मजबूत बफर स्टॉक बचा रहने का अनुमान है। सरकार द्वारा आयात शुल्क हटाने, स्टॉक लिमिट तय करने और मिलों में नए सत्र की पेराई जल्दी शुरू कराने जैसे सख्त फैसलों से साफ संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में चीनी की जमाखोरी पर लगाम लगेगी और कीमतें वापस सामान्य स्तर पर लौट आएंगी।
