SEBI के 5 फैसले जो बदलने जा रहे बाजार में खेल, FII, रिटेल निवेशक और ब्रोकर सब पर होगा असर

SEBI की बोर्ड बैठक में कई अहम फैसले हुए हैं। आने वाले दिनों में ये फैसले शेयर बाजार के पूरे इकोसिस्टम पर असर डालेंगे। AIF, FPI, REIT-InvIT और रिटेल निवेशकों से जुड़े ये बदलाव न सिर्फ कारोबार को आसान बनाएंगे, बल्कि निवेश के रास्ते भी खोलेंगे। जानें कहां क्या असर।

KEY HIGHLIGHTS
  • AIF स्कीम बंद करने के नियम आसान किए गए, जिससे फंड मैनेजर टैक्स या कानूनी दायित्वों के चलते सीमित रकम रोककर भी स्कीम क्लोज कर सकेंगे और “inoperative fund” कैटेगरी के जरिए कंप्लायंस बोझ घटेगा।
  • FPI के लिए नेट सेटलमेंट सिस्टम को मंजूरी दी गई, जिससे खरीद-बिक्री को समायोजित कर सेटलमेंट होगा और फंडिंग कॉस्ट के साथ करेंसी लॉस भी कम होगा।
  • सोशल स्टॉक एक्सचेंज में रिटेल निवेश बढ़ाने के लिए Social Impact Fund में न्यूनतम निवेश सीमा 2 लाख रुपये से घटाकर 1,000 रुपये कर दी गई।
  • REIT और InvIT नियमों में ढील देते हुए SPV में निवेश जारी रखने, नए निवेश विकल्प जोड़ने और ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स में निवेश की अनुमति दी गई, जिससे इंफ्रा निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
  • इंटरमीडियरी के ‘Fit and Proper’ नियमों में बदलाव कर संतुलन बनाया गया, जिसमें FIR पर स्वतः अयोग्यता खत्म की गई और आर्थिक अपराधों पर सख्ती बढ़ाई गई।

भारतीय शेयर बाजार के नियामक SEBI की 23 मार्च, 2026 की बोर्ड बैठक में बाजार को अधिक लचीला और निवेशक-अनुकूल बनाने के मकसद से कई अहम फैसले लिए। AIF नियमों में ढील देकर फंड बंद करने की प्रक्रिया आसान की गई है। वहीं, विदेशी निवेगश यानी FII/FPIs के लिए नेट सेटलमेंट की मंजूरी देकर लागत घटाने का रास्ता खोला गया है। इसके अलावा सोशल स्टॉक एक्सचेंज में रिटेल निवेश की सीमा घटाकर भागीदारी बढ़ाई गई है। वहीं, REIT और InvIT के निवेश नियम सरल किए गए हैं। इसके साथ ही ब्रोकर और इंटरमीडियरी के ‘Fit and Proper’ मानकों को संतुलित बनाया गया है। कुल मिलाकर, ये फैसले बाजार में लिक्विडिटी, पारदर्शिता और निवेश के अवसर बढ़ाने की दिशा में उठाए गए कदम हैं।

Sebi Chief Tuhin Kant Pandey

सेबी प्रमुख तुहिन कांत पांडे (Image Credit SEBI)

AIF स्कीम बंद करना हुआ आसान

SEBI ने Alternative Investment Funds (AIF) के लिए स्कीम बंद करने और रजिस्ट्रेशन सरेंडर की प्रक्रिया को आसान बना दिया है। फंड मैनेजरों के लिए यह राहत इसलिए है़ क्योंकि पहले स्कीम बंद करते समय पूरी रकम तुरंत निवेशकों को लौटानी पड़ती थी और बैंक बैलेंस शून्य करना जरूरी होता था। अगर टैक्स नोटिस, कानूनी विवाद या कोई बकाया खर्च बच जाता था, तो फंड को जबरन चालू रखना पड़ता था और भारी कंप्लायंस बोझ उठाना पड़ता था। अब वे ऐसी स्थितियों में सीमित रकम रोककर स्कीम को बंद कर सकते हैं, जिससे ऑपरेशनल झंझट और लागत दोनों कम होंगे।

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