दुनिया भर में जहां एक तरफ महाशक्तियों के बीच युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ पड़ोसी देशों के लिए यह स्थिति 'कंगाल में आटा गीला' जैसी हो गई है। आर्थिक तंगी से पहले ही जूझ रहे पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में अब ईंधन (Fuel) का ऐसा संकट खड़ा हो गया है कि वहां की पूरी व्यवस्था ठप होने की कगार पर है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान में एलपीजी (LPG) का स्टॉक महज 5 दिनों का बचा है, जबकि पेट्रोल और डीजल जैसे जरूरी ईंधनों का भंडार भी सिर्फ 7 दिनों के लिए ही पर्याप्त है। अगर समय रहते नई सप्लाई नहीं पहुंची, तो इन देशों में गाड़ियों के पहिए थम जाएंगे और घरों के चूल्हे जलना बंद हो जाएंगे।
ईरान-इजरायल युद्ध का पड़ रहा है सीधा असर
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने वैश्विक तेल बाजार (Global Oil Market) को हिलाकर रख दिया है। क्योंकि पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात (Import) पर निर्भर हैं, इसलिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रास्तों में थोड़ी सी भी हलचल इनके लिए काल बन जाती है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और सप्लाई चैन में आ रही रुकावटों ने इन देशों की विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Reserve) को पूरी तरह खाली कर दिया है। इनके पास अंतरराष्ट्रीय बाजार से महंगा तेल खरीदने के लिए डॉलर नहीं बचे हैं, जिसके कारण तेल कंपनियां नए ऑर्डर देने में असमर्थ हैं।
जनता पर महंगाई और किल्लत की दोहरी मार
ईंधन की इस कमी का सबसे बुरा असर आम जनता पर पड़ रहा है। पाकिस्तान के कई शहरों में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं और कालाबाजारी (Black Marketing) अपने चरम पर है। एलपीजी की भारी कमी के कारण रसोई गैस के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के लिए दो वक्त का खाना बनाना भी मुश्किल हो गया है। श्रीलंका में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है; वहां बिजली कटौती और परिवहन सेवाओं में भारी कमी देखने को मिल रही है। जानकारों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें कम नहीं हुईं, तो इन देशों में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
क्या है भविष्य की राह?
इन देशों की सरकारों ने अब राशनिंग (Rationing) शुरू कर दी है, यानी एक व्यक्ति को सीमित मात्रा में ही तेल दिया जा रहा है। साथ ही, वे मित्र देशों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मदद की गुहार लगा रहे हैं। लेकिन युद्ध के इस माहौल में कोई भी देश जोखिम लेने को तैयार नहीं है। भारत जैसे पड़ोसी देशों की नजर भी इस संकट पर बनी हुई है, क्योंकि पड़ोसी की अस्थिरता का असर पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर पड़ सकता है। आने वाले कुछ दिन इन देशों की किस्मत का फैसला करेंगे क्या इन्हें नई सप्लाई मिलेगी या ये देश पूरी तरह 'अंधेरे' में डूब जाएंगे?
