GST Council Meeting: देश के हजारों निर्यातकों की निगाहें GST Council की 57वीं बैठक पर हैं। क्योंकि इस बैठक में निर्याातकों (Exporters) के लिए बड़े GST सुधारों पर विचार हो सकता है। यह बैठक 7 अक्टूबर को होनी थी, जिसे अब 8 अक्टूबर, 2026 के लिए टाल दिया गया है। प्रस्ताव के तहत 38,000 से ज्यादा एक्सपोर्ट टैक्सपेयर को सेवाओं और प्लांंट व मशीनरी पर लगने वाले GST का रिफंड जल्दी मिल पाएगा।
जीएसटी काउंसिल की बैठक पर निगाहें
इससे कंपनियों का टैक्स सिस्टम में फंसा पैसा वर्किंग कैपिटल के तौर पर वापस उपलब्ध हो सकेगा।
क्या होगा सबसे बड़ा बदलाव?
सबसे बड़ा बदलाव रिफंड मैकेनिज्म में प्रस्तावित है। रिस्क बेस्ड जांच के बाद रिफंड क्लेम का 90% हिस्सा जल्दी जारी करने की व्यवस्था को ज्यादा व्यापक बनाने पर विचार है। बाकी रकम सामान्य वेरिफिकेशन के बाद जारी की जाएगी। इसके साथ ही रिफंड एप्लिकेशन पर 10 दिन में कार्रवाई नहीं होने पर अभिस्वीकृति को मंजूर माना जा सकता है।
सर्विसेज पर चुकाए GST की वापसी का रास्ता
अभी तक निर्यातकों के लिए बड़ी समस्या यह है कि बिजनेस चलाने में इस्तेमाल होने वाली सेवाओं पर चुकाए गए GST की वापसी मुश्किल होती है। क्योंकि, इसके लिए एक्सपोर्ट रिफंड मैकेनिज्म में कोई सटीक व्यवस्था नहीं है। प्रस्तावित बदलाव में इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के जरिये सेवाओं पर चुकाए गए टैक्स को रिफंडेबल बनाने की बात की गई है। इससे खासतौर पर IT, कंसल्टिंग, इंजीनियरिंग और दूसरी सर्विस एक्सपोर्ट कंपनियों की लिक्विडिटी बेहतर हो सकती है।
प्लांट और मशीनरी पर रिफंड
प्लांट और मशीलरी पर चुकाए गए GST को भी रिफंड मैकेनिज्म में शामिल करने का प्रस्ताव है। हालांकि, इसका रिफंड एक साथ नहीं, बल्कि 5 साल में स्प्रेड किया जाएगा। इसका सीधा फायदा उन एक्सपोर्ट से जुड़ी कंपनियों को हो सकता है, जिनका बड़ा निवेश मशीनलरी, इक्विपमेंट और प्रोडक्शन इन्फ्रा में होता है। अभी ऐसे टैक्स क्रेडिट का एक हिस्सा लंबे समय तक सिस्टम में अटका रह सकता है। यानी सरकार का मकसद सिर्फ टैक्स वापस करना नहीं, बल्कि एक्सपोर्टर्स के लिए वर्किंग कैपिटल को अनलॉक करना भी है।
विदेशी ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं पर टैक्स में राहत
GST Council एक्सपोर्ट की परिभाषा में भी बदलाव पर विचार कर सकती है। प्रस्ताव के मुताबिक विदेशी ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं और सप्लाई को ज्यादा व्यापक तरीके से जीरो रेटेड एक्सपोर्ट दर्जा दिया जा सकता है। इसका महत्व उन कंपनियों के लिए है, जो विदेश में अपनी ही ब्रांच या संस्था के जरिए बिजनेस करती हैं। मौजूदा परिभाषा के तहत इस तरह की स्थिति में ट्रांजैक्शन को एक्सपोर्ट ट्रीटमेंट मिलने में दिक्कत आती है।
फॉरेन क्लाइंट के गुड्स पर काम भी एक्सपोर्ट माना जाएगा
एक और बड़ा प्रस्ताव उन कंपनियों से जुड़ा है, जो भारत में किसी विदेशी क्लाइंट के गुड्स पर टेस्टिंग, रिपेयर, प्रॉसेसिंग या दूसरी सेवाएं देती हैं।
प्रस्ताव के तहत ऐसी सेवाओं को भी एक्सपोर्ट के तौर पर क्लासिफाई किया जा सकता है, जिससे उन पर GST का बोझ घटेगा। अभी ऐसी कई सेवाओं पर 18% GST है। इसका सबसे बड़ा फायदा Global Capability Centres (GCCs) को हो सकता है। मल्टीनेशनल कंपनियों के Indian GCCs इंजीनियरिंग, प्रोडक्ट डेवलपमेंट और टेस्टिंग जैसे काम अपनी ओवरसीज ग्रुप कंपनियों के लिए करते हैं और बदले में फॉरेन एक्सचेंज में पेमेंट हासिल करते हैं।
