अल नीनो के कारण इस साल मानसूनी बारिश औसत से कम हुई है। हालांकि, बाद के महीनों में बारिश होने से किसानों को राहत हुई है। हालांकि, अभी अल नीनो का खतरा खत्म नहीं हुआ है। अल नीनो से रबी फसल पर खतरा मडरा रहा है। दरअसल, गेहूं, सरसों और अन्य प्रमुख रबी फसलों की बुवाई अक्टूबर से शुरू होती है। कृषि सचिव ने कहा कि आगामी रबी सीजन में उत्पादन पर असर पड़ सकता है और वर्षा आधारित क्षेत्रों में किसानों के सामने मौसम की चुनौती बनी रह सकती है।
रबी फसलों पर मंडराया खतरा
उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों में मिट्टी में जरूरत से ज्यादा नमी की समस्या पैदा हो सकती है। वहीं, कम बारिश वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक मिट्टी में नमी की कमी रह सकती है। ऐसे में रबी फसलों के लिए क्षेत्रवार रणनीति बनाने की जरूरत है।
अक्टूबर में शुरू होगी बुवाई
चंद्रा ने रबी सत्र की तैयारियों पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि खासकर वर्षा आधारित क्षेत्रों में खरीफ सत्र भी काफी चुनौतीपूर्ण रहा। कई राज्यों को पहले फसल का रकबा बढ़ाने और बाद में फसल को बचाए रखने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों की बुवाई अक्टूबर में शुरू होती है। उन्होंने कहा, हम देख रहे हैं कि आगामी सत्र में उत्पादन काफी हद तक प्रभावित हो सकता है। रबी सत्र भी वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए चुनौतीपूर्ण रहेगा।
इस कारण पैदावार पर असर
चंद्रा ने कहा कि कुछ राज्यों को मिट्टी में अत्यधिक नमी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है, जबकि कम बारिश वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक नमी की कमी का असर रह सकता है। उन्होंने कहा कि रबी सत्र के लिए इसी के अनुरूप रणनीति तैयार करने की जरूरत है।
जलवायु परिवर्तन को वास्तविकता बताते हुए चंद्रा ने कहा कि सिंचाई वाले क्षेत्रों में भी कई जगह बेमौसम तथा भारी बारिश हुई है जिससे फसलों को नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा, हम सोचते थे कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना बाद में करना होगा। हालांकि, अब हम बदलाव होते देख रहे हैं और ये बदलाव बहुत तेजी से हो रहे हैं।
दाल, तिलहन और फलों के लिए आयात पर निर्भर
चंद्रा ने कहा कि भारत ने अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है, लेकिन वह अब भी दाल, तिलहन और फलों जैसे कुछ बागवानी उत्पादों का आयात करता है। उन्होंने बताया कि रबी फसलों की आम तौर पर कुल करीब 638 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई होती है। इसमें 300 लाख हेक्टेयर से अधिक में गेहूं, 140 लाख हेक्टेयर में दाल, 87 लाख हेक्टेयर में तिलहन और 55 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाज बोए जाते हैं।
