मिडिल ईस्ट में भड़की आग की आंच कच्चे तेल पर लगातार लगती दिख रही है, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर दुनिया भर के ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। युद्ध की आहट और बिगड़ते हालातों के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी क्रूड ऑयल की कीमतें शुरुआती कारोबार में ही 9 फीसदी से ज्यादा उछलकर 92 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। यह अक्टूबर 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। वहीं, ब्रेंट क्रूड भी 90 डॉलर के स्तर को पार कर चुका है। वहीं, घरेलू सिलेंडर की कीमतें भी 60 रु तक महंगी हो गई हैं।
ऐसे में जानकारों का मानना है कि अगर यह तनाव कम नहीं हुआ, तो कच्चा तेल जल्द ही 100 और फिर 150 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा छू सकता है, जो भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरे की घंटी है। अगर क्रूड ऑयल की कीमतें यूं ही बढ़ती रहीं तो पेट्रोल-डीजल भी महंगा हो सकता है ।
क्यों उबल रहा है तेल का बाजार?
तेल की कीमतों में इस अचानक तेजी की मुख्य वजह ईरान से जुड़ा संघर्ष और 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) में पैदा हुआ संकट है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल रास्तों में से एक है। हर दिन यहाँ से लगभग 2.08 करोड़ बैरल तेल गुजरता है, जिसका 80 फीसदी हिस्सा एशियाई देशों को जाता है। मौजूदा तनाव के कारण सुरक्षा जोखिम और बीमा की लागत इतनी बढ़ गई है कि इस रास्ते से गुजरने वाले टैंकरों की संख्या में 90 फीसदी तक की गिरावट आई है। अधिकतर जहाज खाड़ी के बाहर खड़े होकर स्थिति सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं। अगर यह रुकावट लंबे समय तक जारी रहती है, तो दुनिया भर में तेल की भारी किल्लत हो सकती है।
ग्लोबल मार्केट और अर्थव्यवस्था पर दबाव
इस संकट का असर केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर के शेयर बाजारों में भी इसकी तपिश महसूस की जा रही है। अमेरिका में राजनीतिक बयानों और कमजोर आर्थिक आंकड़ों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। ईरान को लेकर आए सख्त बयानों के बाद अमेरिकी शेयर बाजार (डाउ जोंस) में 900 अंकों तक की गिरावट देखी गई। साथ ही, अमेरिका में नौकरियों के कम होते आंकड़ों ने 'स्टैगफ्लेशन' (महंगाई और आर्थिक सुस्ती का एक साथ होना) का डर पैदा कर दिया है। जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था दबाव में होती है, तो उसका असर भारत समेत तमाम विकासशील देशों पर भी पड़ता है।
भारत के लिए क्यों है यह बुरी खबर?
भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाली हर छोटी बढ़त भारत के खजाने पर भारी पड़ती है। रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोत्तरी से भारत का आयात बिल लगभग 13 से 14 अरब डॉलर बढ़ जाता है। अगर ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर तक पहुंचता है, तो भारत को तेल खरीदने के लिए सालाना 20 से 25 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे। इससे न केवल देश का विदेशी मुद्रा भंडार कम होगा, बल्कि डॉलर के मुकाबले रुपया भी कमजोर हो सकता है।
आम आदमी की जेब पर क्या होगा असर?
कच्चा तेल महंगा होने का मतलब सिर्फ महंगा पेट्रोल-डीजल नहीं है। जब ईंधन महंगा होता है, तो ट्रकों और जहाजों का भाड़ा बढ़ जाता है। इससे फल, सब्जी, अनाज और कारखानों में बनने वाले सामानों की ढुलाई महंगी हो जाती है। अंततः कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत का बोझ आम जनता पर ही डालती हैं, जिससे हर चीज के दाम बढ़ जाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो जाती है, क्योंकि महंगाई बढ़ने पर ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो जाता है, जिससे लोन (EMI) महंगे बने रह सकते हैं।
क्या है राहत की उम्मीद?
इन सबके बीच भारत के लिए एक छोटी लेकिन राहत भरी खबर भी है। अमेरिका ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिन की एक विशेष छूट दी है। इसके तहत भारत समुद्र में पहले से लोड हो चुके रूसी कच्चे तेल के कार्गो को अप्रैल की शुरुआत तक खरीद सकता है। यह व्यवस्था भारत को अचानक आए इस झटके को संभालने के लिए थोड़ा समय देगी। सरकार और तेल कंपनियां अब वैकल्पिक रास्तों और 'प्लान-बी' पर काम कर रही हैं ताकि देश में ईंधन की सप्लाई बनी रहे और आम आदमी को कम से कम परेशानी हो।
