घर खरीदना जिंदगी के सबसे बड़े वित्तीय फैसलों में से एक होता है। वर्षों की बचत और डाउन पेमेंट के बाद जब आप होम लोन लेते हैं, तो हर महीने EMI चुकाना शुरू करते हैं। लेकिन कुछ साल बाद जब लोन स्टेटमेंट देखते हैं, तो एक सवाल जरूर उठता है, इतनी EMI भरने के बाद भी मूलधन इतना कम क्यों घटा?
होम लोन
दरअसल, होम लोन की EMI का गणित ऐसा है कि शुरुआत में आपकी किस्त का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि शुरुआती 10 साल आप सिर्फ ब्याज भरते हैं। हर EMI में मूलधन भी चुकता होता है, लेकिन शुरुआत में उसका हिस्सा छोटा होता है। जैसे-जैसे बकाया लोन घटता है, ब्याज कम होता जाता है और EMI में मूलधन का हिस्सा बढ़ता जाता है।
EMI में होता क्या है?
हर EMI दो हिस्सों में बंटी होती है, ब्याज और मूलधन। ब्याज की गणना आम तौर पर उस समय बकाया मूलधन पर होती है। इसलिए लोन की शुरुआत में जब बकाया रकम सबसे ज्यादा होती है, तब ब्याज भी ज्यादा बनता है।
मान लीजिए आपने ₹50 लाख का होम लोन 20 साल के लिए 7.5% सालाना ब्याज पर लिया। इस दर पर आपकी मासिक EMI करीब ₹40,280 होगी।
पहले साल लगभग ₹3,71,197 ब्याज और करीब ₹1,12,159 मूलधन में जाएगा। यानी EMI का बड़ा हिस्सा ब्याज में चला गया। यही प्रक्रिया करीब 10 साल तक चलती रहती है। दसवें साल तक पहुंचते-पहुंचते दोनों हिस्सों का अंतर और कम हो जाता है। आगे चलकर मूलधन का हिस्सा ब्याज से बड़ा हो जाता है और लोन तेजी से घटने लगता है। यही अमॉर्टाइजेशन शेड्यूल का मूल खेल है।
बैंक ऐसा क्यों करते हैं?
इसे बैंक की कोई अलग रणनीति या चाल समझना सही नहीं होगा। यह तय EMI और समय के साथ घटते बकाया मूलधन का गणितीय परिणाम है। अगर ब्याज दर स्थिर हो और EMI भी तय रहे, तो शुरुआत में ब्याज ज्यादा और मूलधन कम चुकता होता है। बाद के वर्षों में इसका उल्टा होने लगता है।
हालांकि फ्लोटिंग रेट वाले लोन में ब्याज दर बदलने पर EMI या लोन की अवधि भी बदल सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के तहत ब्याज दर रीसेट होने पर पात्र उधारकर्ताओं को EMI बढ़ाने, अवधि बढ़ाने या दोनों के संयोजन जैसे विकल्प दिए जाने चाहिए।
ब्याज का बोझ कैसे कम करें?
अगर आपकी आय में समय के साथ बढ़ोतरी होती है, तो लोन को तय अवधि तक खींचने के बजाय आंशिक प्री-पेमेंट पर विचार किया जा सकता है। बकाया मूलधन जितना जल्दी कम होगा, भविष्य में उस पर लगने वाला ब्याज भी उतना कम होगा।
आप सालाना अतिरिक्त रकम लोन में डाल सकते हैं या आय बढ़ने पर EMI बढ़ाने का विकल्प चुन सकते हैं। लेकिन प्री-पेमेंट से पहले अपने लोन की शर्तें और उपलब्ध शुल्क जरूर जांचें। RBI के अनुसार व्यक्तिगत उधारकर्ताओं के फ्लोटिंग-रेट टर्म लोन पर बैंकों को प्रीपेमेंट/फोरक्लोजर शुल्क लगाने की अनुमति नहीं है; फिर भी अपने लोन की प्रकृति और लागू नियमों की पुष्टि करना जरूरी है।
