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रईसी की मौत से आखिर किसको फायदा? भारत के लिए क्यों झटका है राष्ट्रपति की मौत

Ebrahim Raisi Death: 1979 के बाद ईरान बहुत हद तक बदल गया। सत्ता के शीर्ष पर चरमपंथी गुटों और मौलवियों का कब्जा है। यहां अमेरिका, ब्रिटेन और भारत की तरह लोकतांत्रिक तरीसे से चुनाव नहीं होता। सेना, राजनीति और धार्मिक ओहदों पर बैठे कुछ विशेष लोग आपसी साठगांट और मिलीभगत से सरकार का चुनाव कर लेते हैं।

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रविवार को हेलिकॉप्टर दुर्घटना में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत हो गई।

Photo : AP

Ebrahim Raisi : रविवार को ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई। यह हादसा तब हुआ जब ये दोनों अजरबैजान की सीमा पर स्थित एक बांध का उद्घाटन करने के बाद वापस लौट रहे थे। ईरानी मीडिया ने हादसे की वजह खराब मौसम बताया है। बांध का उद्घाटन करने के बाद वापस लौट रहे राष्ट्रपति के काफिले में तीन हेलिकॉप्टर शामिल थे। इन्हीं में से एक में रईसी और ईरान के विदेश मंत्री भी सवार थे। सवाल उठ रहा है कि यदि मौसम खराब था तो बाकी दो हेलिकॉप्टरों पर भी इसका असर पड़ना चाहिए था। दोनों बड़े नेताओं की मौत पर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं और साजिश की बातें कही जा रही हैं। सवालों के घेरे में देश और लोग हैं।

ईरान में लोकतांत्रिक तरीके से नहीं होते चुनाव

सवाल यह भी है कि रईसी की मौत से सबसे ज्यादा फायदा किसे होना था। तो सबसे पहले शक की सुई रईसी के नंबर दो उप राष्ट्रपति मोहम्मद मोखबर पर है। सोशल मीडिया में लोगों का कहना है कि रईसी की कुर्सी खाली होने पर मोखबर का दावा बनता है क्योंकि वह डिप्टी हैं। हालांकि अब उन्हें चुनाव तक राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी दे दी गई है। 1979 के बाद ईरान बहुत हद तक बदल गया। सत्ता के शीर्ष पर चरमपंथी गुटों और मौलवियों का कब्जा है। यहां अमेरिका, ब्रिटेन और भारत की तरह लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव नहीं होता। सेना, राजनीति और धार्मिक ओहदों पर बैठे कुछ विशेष लोग आपसी साठगांठ और मिलीभगत से सरकार का चुनाव कर लेते हैं। रईसी अंदरूनी राजनीति और साजिश का शिकार भी हो सकते हैं।

दरअसल, चाबहार पोर्ट को लेकर भारत और ईरान दोनों के बीच समझौता हुआ है। भारत 10 सालों तक इस बंदरगाह का संचालन करेगा। इस पोर्ट के विकास के लिए भारत भारी भरकम राशि का निवेश भी कर रहा है। इस समझौते पर अमेरिका ने भारत का नाम लिए बगैर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी। इस अहम समझौते के चंद दिन बाद हुआ यह हादसा हुआ है। क्या यह मात्र संयोग है?

इजरायल का ट्रैक रिकॉर्ड अपने दुश्मनों के खात्मे का है

दूसरा, राष्ट्रपति रईसी और विदेश मंत्री हुसैन अमीर दोनों इजरायल के खिलाफ थे। आए दिन दोनों नेता इस यहूदी देश को बर्बाद करने की धमकियां देते थे। इजरायल को लेकर इनके नफरती एवं उग्र भाषण किसी से छिपे नहीं थे। कुछ समय पहले ईरान ने अपनी मिसाइलों एवं ड्रोन से इजरायल पर हमला किया था। बताया जाता है कि यह हमला भी इन्हीं दोनों नेताओं के दिमाग की उपज था। रिपोर्टों के मुताबिक ईरान परमाणु हथियार विकसित कर लेने के बेहद करीब पहुंच चुका है। इजरायल के खिलाफ नफरत और उसे तबाह करने के इरादे को अगर देखें तो जाहिर है कि परमाणु हथियार हासिल कर लेने पर उसका पहला निशाना कौन बनेगा, इसे बताने की जरूरत नहीं है। इजरायल कुछ दिनों पहले ईरान के परमाणु कार्यक्रम वाले ठिकानों को निशाना बना चुका है। अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाने के इजरायल के ट्रैक रिकॉर्ड को यदि देखें तो रईसी की मौत के पीछे उसकी साजिश से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, रईसी की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो जाने की जैसी ही बात सामने आई। इजरायल ने कहा कि इसमें उसका हाथ नहीं है।

हादसे के पीचे चीन और अमेरिका भी हो सकते हैं

दरअसल, चाबहार पोर्ट को लेकर भारत और ईरान दोनों के बीच समझौता हुआ है। भारत 10 सालों तक इस बंदरगाह का संचालन करेगा। इस पोर्ट के विकास के लिए भारत भारी भरकम राशि का निवेश भी कर रहा है। इस समझौते पर अमेरिका ने भारत का नाम लिए बगैर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी। उसके भीतर एक टीस है कि भारत उसकी बात नहीं सुन रहा। अपने हितों के लिए भारत उसे भी सुना दे रहा है। एक मजबूत एवं सशक्त भारत उसकी आंखों में खटक रहा है। वह भारत को मजबूत होते तो देखना चाहता है लेकिन अपनी शर्तों पर। जाहिर है कि रईसी और हुसैन अमीर जो कि इस समझौते को लेकर काफी मुखर थे, इनके न रहने से ईरान-भारत के बीच यह प्रोजेक्ट थोड़ा धीमा हो सकता है।

चीन चाहता है कि दुनिया ग्वादर पोर्ट आए

चीन की अगर बात करें तो यह करार उसके सीपेक को सीधे तौर पर चुनौती देने वाला है। चीन चाहता है कि दुनिया व्यापार के लिए पाकिस्तान स्थित ग्वादर एयरपोर्ट का इस्तेमाल करे। ग्वादर और चाबहार पोर्ट के बीच दूरी महज 170 किलोमीटर है। चाबहार को लेकर मध्य एशिया के देशों ने जिस तरह से दिलचस्पी दिखाई उससे चीन के पेट में दर्द होना स्वभाविक था। चाबहार के जरिए भारत नार्थ साउथ इकोनॉमिक कॉरीडोर से जुड़ जाएगा। यह कॉरीडोर भारत को सीधे अफगानिस्तान, मध्य एशिया, यूरोप और रूस से जोड़ देगा। जाहिर है कि आर्थिक गतिविधियां तेज होने पर भारतीय अर्थव्यवस्था को इसका फायदा होगा। भारत की आर्थिक तरक्की अमेरिका और चीन दोनों को पसंद नहीं आ रही है।

Alok Rao
आलोक कुमार रावauthor

19 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय आलोक राव ने प्रिंट, न्यूज एजेंसी, टीवी और डिजिटल चारों ही माध्यमों में काम किया है। इस लंबे अनुभव ने उन्हें समाचारों की समझ, प्रेजेंटेशन, डिटेलिंग और न्यूजरूम डायनेमिक्स में असाधारण दक्षता प्रदान की है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों में विशेष रुचि रखने के साथ-साथ जियो-पॉलिटिक्स एवं डिफेंस की स्टोरीज में इनकी खासी दिलचस्पी है। आलोक ने अलग-अलग माध्यमों में काम करते हुए समाचारों की समझ, प्रस्तुति और विश्लेषण में मजबूत दक्षता विकसित की है और अब तक 25,000 से अधिक आर्टिकल तैयार कर चुके हैं। तथ्यों की गहन जांच, मजबूत न्यूज सेंस और तेज निर्णय क्षमता उनकी पत्रकारिता की प्रमुख खासियतें हैं।

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