Saudi Arabia Rejects Netanyahu Proposal Houthis: मध्य पूर्व (Middle East) की बदलती भू-राजनीति में एक बार फिर कूटनीतिक दूरियां साफ तौर पर देखने को मिल रही हैं। हाल ही में ऐसी खबरें सामने आई थीं कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) ने यमन के हूती (Houthi) विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब के साथ मिलकर मुकाबला करने का प्रस्ताव रखा था, जिसे रियाद ने साफ तौर पर ठुकरा दिया।
मुस्लिम बहुल देशों और इजरायल के बीच चल रहे क्षेत्रीय तनाव के बीच सऊदी अरब का यह कदम काफी अहम माना जा रहा है। आइए जानते हैं कि इस प्रस्ताव के पीछे की पूरी कहानी क्या है और सऊदी अरब ने इसे क्यों खारिज किया। इस कारण को हम 3 हिस्सों में समझेंगे कि कैसे फिलिस्तीन मुद्दा और अरब दुनिया का रुख इस इनकार के पीछे हो सकता है और यमन में शांति प्रक्रिया चल रही है, जिस कारण भी एक्शन मोड में ना आने के लिए सऊदी सोच रहा है और अंत में सबसे पहले सऊदी अपने घर को देख रहा है। यानी घरेलू आवाज के विरुद्ध जाकर सऊदी कोई फैसला नहीं लेना चाहता।
1. फिलिस्तीन मुद्दा और अरब दुनिया का रुख
सऊदी अरब और इजरायल के बीच पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी मध्यस्थता से संबंधों को सामान्य बनाने (Normalization of Relations) को लेकर बातचीत चल रही थी। हालांकि, गाजा युद्ध और फिलिस्तीनियों के खिलाफ इजरायली सैन्य कार्रवाई के बाद पूरा परिदृश्य बदल गया है।
सऊदी अरब ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि जब तक एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना नहीं हो जाती, तब तक इजरायल के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध या किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष सैन्य सहयोग संभव नहीं है।
ऐसे समय में इजरायल के साथ किसी भी तरह की सुरक्षा साझेदारी स्वीकार करने से अरब जगत में सऊदी अरब की छवि और नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठ सकते थे।

सऊदी के फंसने की कई वजह
2. यमन शांति प्रक्रिया और हूतियों के साथ नाजुक समझौता
सऊदी अरब पिछले कई वर्षों से यमन में हूती विद्रोहियों के साथ चल रहे गृहयुद्ध को समाप्त करने और शांति समझौता करने के लिए गंभीर प्रयास कर रहा है।
रियाद अब युद्ध के बजाय कूटनीति के जरिए अपनी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है।
यदि सऊदी अरब इजरायल के साथ मिलकर हूतियों के खिलाफ किसी सैन्य गठबंधन में शामिल होता, तो यमन में चल रही नाजुक शांति प्रक्रिया पूरी तरह पटरी से उतर सकती थी और सऊदी क्षेत्र एक बार फिर बड़े पैमाने पर मिसाइल व ड्रोन हमलों की जद में आ सकते थे।
3. घरेलू और क्षेत्रीय संदेश
सऊदी अरब अपने रणनीतिक फैसलों को लेकर बेहद सतर्क है। देश के नेतृत्व का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बाहरी ताकतों (विशेषकर इजरायल) के साथ प्रत्यक्ष सैन्य गठबंधन इस समय देश के दीर्घकालिक हितों के अनुकूल नहीं है। रियाद अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और खाड़ी देशों के बीच अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए स्वतंत्र रूप से अपनी सुरक्षा नीतियां तय करना चाहता है।
