Nepal Flood Foreign Aid: नेपाल-चीन सीमा और रसुवा क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ से मची भीषण तबाही के बाद नेपाल सरकार ने अपना रुख बदल लिया है। शुरुआत में विदेशी सहायता लेने में हिचकिचाहट दिखाने के बाद, अब नेपाल सरकार ने राहत और बचाव कार्यों के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद स्वीकार करने का फैसला किया है। इस त्रासदी में 570 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और करीब एक हजार लोग अब भी लापता हैं।
नेपाल ने भारत-चीन से मांगी 42 बैली ब्रिज
नेपाली मीडिया 'काठमांडू पोस्ट' के अनुसार, विदेशी नागरिकों के लापता होने और कई देशों के बढ़ते कूटनीतिक दबाव के बाद नेपाल ने अपनी रणनीति में यह बदलाव किया है। इससे पहले, नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा था कि सरकार शुरुआती चरण में अपनी सुरक्षा एजेंसियों (नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल) की क्षमता का इस्तेमाल करने को प्राथमिकता दे रही थी।
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नेपाली विदेश मंत्री क्या बोले?
उनका तर्क था कि स्थानीय सुरक्षा बल यहां के कठिन इलाके और मौसम से अच्छी तरह वाकिफ हैं, जबकि बाहरी टीमों को अप्रत्याशित भौगोलिक जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि उन्होंने विदेशी सहायता को पूरी तरह से कभी खारिज नहीं किया था। उन्होंने कहा कि जहां विशेष तकनीकी कौशल और जटिल ढांचों को संभालने की आवश्यकता होगी, वहां अंतरराष्ट्रीय मदद जरूर ली जाएगी।
नेपाल ने भारत और चीन से 42 बैली ब्रिज की डिमांड की
बाढ़ के कारण नेपाल में तीन दर्जन से अधिक पुल बह गए हैं, जिससे कई दूरदराज के इलाकों का संपर्क पूरी तरह कट चुका है। आवागमन को जल्द से जल्द बहाल करने के लिए नेपाल सरकार ने भारत और चीन से 42 बैली ब्रिज (अस्थायी पोर्टेबल पुल) के निर्माण में मदद की मांग की है। ये पुल बिना भारी मशीनों के बहुत तेजी से जोड़े जा सकते हैं।
भारत ने 'पड़ोसी प्रथम' नीति के तहत पहले ही राहत सामग्री की कई खेप नेपाल भेज दी हैं। अब नेपाल द्वारा मांगी गई इस विशेष सहायता के बाद भारतीय और चीनी दल बुनियादी ढांचे को पटरी पर लाने और बचाव कार्यों में नेपाल की पूरी मदद कर रहे हैं।
