ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका-ईरान न्यूक्लियर बातचीत 'अभी के लिए' खत्म हो गई है, हालांकि सरकारी टीवी रिपोर्टर को पक्का नहीं पता था कि बातचीत कब फिर से शुरू होगी, रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया। बातचीत शुरू होने से पहले, ईरान ने कहा कि वह चाहता है कि विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिकी मध्य पूर्व दूत स्टीव विटकॉफ मस्कट में सिर्फ़ परमाणु मुद्दे पर बात करें।
ट्रंप और खामनेई (फाइल फोटो: facebook)
अराघची ने X पर भी पोस्ट किया, 'ईरान खुली आंखों और पिछले साल की पक्की याद के साथ कूटनीति में उतर रहा है। हम नेक नीयत से बातचीत कर रहे हैं और अपने अधिकारों पर मज़बूती से कायम हैं। वादों को पूरा करना होगा।'
इस बीच, ईरान ने हाल ही में यह भी कहा कि ओमान की राजधानी मस्कट में होने वाली बैठक में बारीक डिटेल्स के बजाय 'बड़े मुद्दों' पर ध्यान दिया जाएगा।
मोहम्मद फथाली ने कहा कि ईरान 'बिल्कुल युद्ध नहीं चाहता
भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली ने शुक्रवार को कहा कि ईरान 'बिल्कुल युद्ध नहीं चाहता, लेकिन सभी विकल्पों के लिए तैयार है।' फथाली ने आगे कहा, 'युद्ध के नतीजों को भी देखना चाहिए।' पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, वह इस सवाल का जवाब दे रहे थे कि अगर अमेरिका हमला करता है या यह एक बड़े युद्ध में बदल जाता है, तो ईरान कितनी तैयारी में है।
न्यूक्लियर मुद्दों पर ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत शुक्रवार को शुरू हुई, जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ओमान में मिले।
ओमान ने अमेरिका, ईरान के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता में मध्यस्थता की
ओमान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर बताया कि अल-बुसैदी ने पहले अराघची और फिर पश्चिम एशिया के लिए अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ तथा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर से अलग-अलग मुलाकात की।बयान में कहा गया है, "बातचीत मुख्यत: राजनयिक और तकनीकी वार्ताओं को फिर से शुरू करने के लिए उपयुक्त परिस्थितियां तैयार करने पर केंद्रित थी, क्योंकि दोनों पक्ष स्थायी सुरक्षा और स्थिरता हासिल करने के लिए इनकी सफलता सुनिश्चित करने के वास्ते दृढ़ संकल्पित हैं।"
अमेरिका और ईरान के बीच कई दौर की बातचीत पिछले साल जून में उस समय विफल हो गई थी, जब इजराइल ने तेहरान पर हमला कर दिया था। दोनों देशों के बीच 12 दिनों तक चले युद्ध के दौरान अमेरिका ने भी ईरान के परमाणु ठिकानों पर बम बरसाए थे, जिससे यूरेनियम संवर्द्धन के काम में जुटे कई सेंट्रीफ्यूज संभवत: नष्ट हो गए थे। वहीं, इजराइली हमलों में ईरान की वायु रक्षा प्रणाली और बैलिस्टिक मिसाइल भंडार को निशाना बनाया गया था।
