Saudi Arabia Houthi Conflict: सऊदी अरब और यमन के बीच संघर्ष धीरे-धीरे और खतरनाक मोड़ पर पहुंचता जा रहा है। 15 अक्टूबर को हूती विद्रोहियों ने यमन के अदन शहर में राष्ट्रपति भवन पर हमले किए। इस हमले में पांच लोगों की मौत हो गई। वहीं, हमले के बाद सऊदी ने जवाबी कार्रवाई और तेज कर दिए।
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब को यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में इजरायल की मदद स्वीकार करने का सुझाव दिया है। ट्रंप ने कहा कि इजरायल, सऊदी अरब के लिए काफी मददगार रहा है और उन्हें लगता है कि रियाद इस प्रस्ताव को स्वीकार कर सकता है।
हूतियों के खिलाफ इजरायल की मदद ले सऊदी अरब: ट्रंप
ट्रंप ने शुक्रवार को व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह टिप्पणी की। उनसे पूछा गया था कि क्या सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में इजरायल की ओर से दी जा रही मदद स्वीकार करनी चाहिए।
इस पर ट्रंप ने कहा कि उन्हें लगता है कि सऊदी अरब ऐसा करेगा। उन्होंने इजरायल की भूमिका की तारीफ करते हुए कहा कि वह सऊदी अरब के लिए काफी मददगार रहा है।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों ने सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
क्या हैं हूती विद्रोही और सऊदी अरब पर क्यों कर रहे हैं हमले?
बता दें कि हूती यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक-धार्मिक संगठन है, जो देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के बड़े क्षेत्र पर नियंत्रण रखता है। इसे ईरान का समर्थन प्राप्त है। पिछले कुछ समय में हूतियों ने सऊदी अरब के अहम ठिकानों पर हमले तेज किए हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हूतियों के हालिया हमलों में रियाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और सऊदी अरामको के मुख्यालय जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया गया। इन हमलों ने सऊदी अरब की हवाई सुरक्षा और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच टकराव का इतिहास काफी पुराना है। यमन के गृहयुद्ध में सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाया था। अब नए हमलों ने दोनों पक्षों के बीच संघर्ष फिर तेज होने की आशंका बढ़ा दी है।
क्या सऊदी अरब और इजरायल के रिश्ते सामान्य होंगे?
ट्रंप ने हूतियों के खिलाफ सहयोग की बात करने के साथ ही सऊदी अरब और इजरायल के संबंध सामान्य करने की संभावना पर भी टिप्पणी की। उन्होंने संकेत दिया कि सऊदी अरब के अब्राहम समझौते में शामिल होने की संभावना पहले से अधिक हो सकती है।
अब्राहम समझौते की शुरुआत 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान हुई थी। इसके तहत संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन समेत कुछ अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। सऊदी अरब अब तक इजरायल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित नहीं कर पाया है।
रियाद लंबे समय से कहता रहा है कि इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन की दिशा में स्पष्ट रास्ता जरूरी है। ऐसे में ट्रंप के ताजा बयान के बावजूद दोनों देशों के बीच किसी समझौते या औपचारिक सैन्य सहयोग की पुष्टि नहीं हुई है।
खुफिया जानकारी देने में मदद कर सकता है इजरायल
सूत्रों के मुताबिक, सऊदी अरब ने इजरायल से खुफिया जानकारी साझा करने की मांग की है, ताकि हूती विद्रोहियों की सैन्य तैनाती और उनकी गतिविधियों की सटीक जानकारी मिल सके। इससे हूतियों के संभावित आगामी ऑपरेशनों की रणनीति का आकलन करने में मदद मिलेगी।
