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National Saras Mela 2026: सपने कैसे होते हैं सच? जानना है तो एक बार जरूर जाएं ये मेला

सरस मेला 2026 में 1500 से अधिक महिला उद्यमियों की मौजूदगी यह याद दिलाती है कि भारत के गांवों में सपनों की कमी नहीं है। जरूरत है उन सपनों को हुनर, पूंजी, बाजार और भरोसे से जोड़ने की।

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राष्ट्रीय सरस मेला 2026

किसी स्टॉल पर हाथ से बने कपड़े सजे हैं तो किसी पर सजावटी सामान और पारंपरिक हस्तशिल्प। कहीं स्थानीय पकवानों की खुशबू लोगों को खींच रही है, तो कहीं अचार-चटनी की खुशबू। हर उत्पाद के पीछे किसी का हुनर, मेहनत और आमदनी की उम्मीद है। इनमें से कई काम घरों में शुरू हुए होंगे, जहां कारोबार के लिए अलग जगह या बड़े संसाधन नहीं थे। लेकिन भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा आयोजित सरस मेला की मदद से अब वही उत्पाद नए ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं।

आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में 13 से 31 अक्टूबर तक आयोजित राष्ट्रीय सरस मेला 2026 में 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से करीब 1500 महिला उद्यमी हिस्सा ले रही हैं। 650 से अधिक स्टॉलों पर उनके उत्पाद प्रदर्शित किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर का यह मेला पहली बार दिल्ली-एनसीआर से बाहर आयोजित हो रहा है।

क्या है सरस मेला?

सरस मेला ग्रामीण विकास मंत्रालय की उस पहल का हिस्सा है, जिसका मकसद स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को अपने उत्पाद बेचने और कारोबार बढ़ाने के अवसर देना है। स्वयं सहायता समूह यानी ऐसे समूह, जिनमें महिलाएं मिलकर बचत करती हैं, आर्थिक गतिविधियां शुरू करती हैं और एक-दूसरे को आगे बढ़ने में मदद देती हैं।

राष्ट्रीय सरस मेला 2026

राष्ट्रीय सरस मेला 2026

ग्रामीण इलाकों में हुनर की कमी नहीं है। महिलाएं कपड़े बुनती हैं, कढ़ाई करती हैं, अचार-पापड़ बनाती हैं, ऑर्गैनिक उत्पाद तैयार करती हैं और पीढ़ियों से चली आ रही हस्तशिल्प परंपराओं को संभालती हैं। लेकिन अच्छा उत्पाद तैयार कर लेना और उसे एक सफल कारोबार में बदल देना दो अलग बातें हैं। इसके लिए ग्राहकों तक पहुंच, सही कीमत, पैकेजिंग, प्रचार और नियमित ऑर्डर भी चाहिए।

सरस मेला इसी दूरी को कम करने का प्रयास है। यहां महिलाओं को सीधे ग्राहकों से मिलने, अपने उत्पादों की खासियत समझाने और नए बाजार तलाशने का मौका मिलता है। इस बार मेले में लखपति दीदी पवेलियन के साथ ब्रांडिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग और कारोबार विस्तार से जुड़े मार्गदर्शन की व्यवस्था भी की गई है। ई-सरस जैसे डिजिटल मंच महिलाओं के उत्पादों को मेले से आगे भी ग्राहकों तक पहुंचाने की संभावना खोलते हैं।

असम की महिलाओं को मिला पैन इंडिया मार्केट

मेले में असम की सृष्टि स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने भी अपना स्टॉल लगाया था। ये महिलाएं पहले असम की पारंपरिक साड़ियां, स्टोल, कुशन कवर और मेखेला चादर जैसे कपड़े तैयार करती थीं। उनके पास हुनर था, लेकिन ग्राहक सीमित थे। कारोबार स्थानीय इलाके तक सिमटा हुआ था और ऑर्डर भी नियमित नहीं मिलते थे।

महिलाओं के सच होते सपनों का मेला है SARAS

महिलाओं के सच होते सपनों का मेला है SARAS

सरस मेले से जुड़ने के बाद उनके उत्पादों को अपने गांव और आसपास के बाजार से बाहर पहचान मिलने लगी। यहां उन्हें सामान बेचने का अवसर तो मिला ही, देशभर के ग्राहकों से संवाद करने और अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग समझने का अनुभव भी मिला। भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहे इस मेले से जुड़ने के बाद उनकी बिक्री तीन से चार गुना तक बढ़ गई।

मांग बढ़ने लगी, तो उत्पादन बढ़ाने के लिए पूंजी की जरूरत भी सामने आई। उन्होंने गांव के संगठन और क्लस्टर स्तर के संघों से कर्ज लेकर अपने काम को विस्तार दिया। इससे ज्यादा सामान तैयार करना और बढ़ते ऑर्डर पूरे करना संभव हुआ। कभी कौड़ियों के भाव में अपने हुनर का व्यापार करती ये ग्रामीण महिलाएं आज लाखों रुपये का कारोबार करती हैं।

सच होते राजस्थान की महिलाओं के सपने

राजस्थान के लड्डू गोपाल आजीविका स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के सामने भी संसाधनों की कमी एक बड़ी चुनौती थी। परिवार की जरूरतें पूरी करना और बच्चों की पढ़ाई का खर्च संभालना आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने मिलकर ऐसा काम शुरू करने का फैसला किया, जिससे आमदनी का एक स्थायी रास्ता बन सके।

ग्रामीण महिलाओं के हुनर को हौसला देता है सरस मेला

ग्रामीण महिलाओं के हुनर को हौसला देता है सरस मेला

भारत सरकार की 'लखपति दीदी योजना' से जुड़ने के बाद समूह को चार लाख रुपये का कर्ज मिला। इस मदद से महिलाओं ने घरों में मशीनें लगाईं और लोहे के बर्तन बनाने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे यह प्रयास परिवारों के लिए आमदनी का महत्वपूर्ण साधन बन गया।

इस समूह की मासिक बिक्री छह से सात लाख रुपये तक पहुंच गई और सालाना मुनाफा करीब दस लाख रुपये तक पहुंच गया। कारोबार बढ़ने के साथ उनके उत्पादों का स्टॉक भी पहले के मुकाबले छह से सात गुना हो गया। सबसे बड़ा बदलाव घरों में भी दिखाई दिया। बच्चों की पढ़ाई को लेकर उम्मीदें मजबूत हुईं और परिवारों को भविष्य के लिए नए रास्ते नजर आने लगे।

महज नाम नहीं, आर्थिक बदलाव की पहचान है 'लखपति दीदी'

लखपति दीदी पहल का मकसद स्वयं सहायता समूहों से जुडी ग्रामीण महिलाओं की आमदनी को टिकाऊ बनाना है। सरकारी परिभाषा के अनुसार, लखपति दीदी वह महिला है, जिसके परिवार की सालाना आमदनी कम से कम एक लाख रुपये हो और यह कमाई एक बार की उपलब्धि न होकर नियमित आजीविका के जरिए बनी रहे।

महिलाओं बन रही हैं लखपति दीदी

महिलाओं बन रही हैं लखपति दीदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2023 को दो करोड़ लखपति दीदियां बनाने का लक्ष्य रखा था। बाद में सरकार ने तीन करोड़ का लक्ष्य हासिल करने के बाद मार्च 2029 तक छह करोड़ लखपति दीदियां बनाने का लक्ष्य तय किया। इस पहल के पीछे विचार यह है कि महिलाएं सिर्फ छोटे-मोटे काम तक सीमित न रहें, बल्कि अपने हुनर को कारोबार में बदलें और परिवार की आर्थिक तरक्की में निर्णायक भूमिका निभाएं।

इस बार के मेले में क्या है खास?

विजयवाडा का राष्ट्रीय सरस मेला इस साल कई मायनों में खास है। पहली बार राष्ट्रीय स्तर का यह आयोजन दिल्ली-एनसीआर से बाहर हो रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों से आई महिलाएं अपने क्षेत्र की कला, कपड़े, हस्तशिल्प, घरेलू उत्पाद और स्थानीय स्वाद यहां लेकर पहुंची हैं। 650 से अधिक स्टॉलों पर देश की विविधता दिखाई देती है। साथ ही, लखपति दीदी पवेलियन महिलाओं के सफर को सामने लाने और कारोबार से जुड़े कौशल पर मार्गदर्शन देने का मंच बना है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया राष्ट्रीय सरस मेला 2026 का उद्घाटन

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया राष्ट्रीय सरस मेला 2026 का उद्घाटन

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 15 अक्टूबर को मेले का उद्घाटन किया और महिला स्वयं सहायता समूहों के स्टॉल देखे। उन्होंने कहा कि स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक सशक्तीकरण में अहम भूमिका निभाई है।

सरस मेला 2026 में 1500 से अधिक महिला उद्यमियों की मौजूदगी यह याद दिलाती है कि भारत के गांवों में सपनों की कमी नहीं है। जरूरत है उन सपनों को हुनर, पूंजी, बाजार और भरोसे से जोड़ने की। जब यह साथ मिलता है, तो घर के एक छोटे से कोने में शुरू हुआ काम भी एक दिन बड़े कारोबार की शक्ल ले सकता है। और तब किसी महिला की सफलता सिर्फ उसकी अपनी कहानी नहीं रहती, पूरे परिवार और समुदाय के बदलते भविष्य की दास्तान बन जाती है।

सपनों को साथ मिले, तो बदल सकती है जिंदगी

असम की बुनकर महिलाएं हों या राजस्थान की लोहार औरतें, इनकी कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन एक बात समान है। इनके पास हुनर पहले से था। बदलाव तब आया, जब उन्हें समूह का सहयोग, वित्तीय मदद, बाजार तक पहुंच और अपने उत्पादों को लोगों के सामने रखने का मौका मिला।

राष्ट्रीय सरस मेला 2026 में महिला शक्ति की असली मिसाल है ये स्टैच्यू

राष्ट्रीय सरस मेला 2026 में महिला शक्ति की असली मिसाल है ये स्टैच्यू

यही सरस मेले की असली कहानी है। यहां हर स्टॉल के पीछे एक परिवार, एक संघर्ष और बेहतर जिंदगी की उम्मीद छिपी है। हालांकि हर कारोबार की राह आसान नहीं होती। बिक्री को नियमित बनाए रखना, लागत संभालना, गुणवत्ता बनाए रखना और बड़े बाजारों में टिके रहना आगे की चुनौतियां हैं। इसलिए भारत सरकार और ग्रामीण विकास मंत्रालय इनको हर तरह का सहयोग देने को तैयार है। सरस मेला 2026 ऐसी ही संभावनाओं का उत्सव है।

अगर आप भी देश की इन नई महिला उद्यमियों के सच होते सपनों को अपनी आंखों से देखना है तो आपको एक बार इस मेले में जरूर जाना चाहिए।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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