यात्रा

बस्तर दशहरा मेला: 75 दिनों तक चलने वाला अनोखा महा-उत्सव, जानिए देशभर से क्यों देखने पहुंचते हैं लोग

Bastar Dussehra Mela: बस्तर दशहरा की जड़ें करीब 600 साल पुरानी मानी जाती हैं। स्थानीय राजवंश, देवी आस्था और आदिवासी समुदायों की भागीदारी ने मिलकर इसे ऐसा स्वरूप दिया, जो देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग है।

Image

12 अगस्त से 22 अक्टूबर तक चलेगा बस्तर दशहरा (AI Generated and Newsroom Verified Image)

Bastar Dussehra Festival: आज से नवरात्रि का पवित्र पर्व शुरू हो चुका है। नौ दिनों तक देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना की जाती है। नवरात्रि के समापन के अगले दिन दशहरा का त्योहार मनाया जाता है। भारत में दशहरा का नाम आते ही रावण दहन, रामलीला और आतिशबाजी की तस्वीरें आंखों के सामने उभरने लगती हैं। लेकिन छत्तीसगढ के बस्तर में दशहरे की कहानी बिल्कुल अलग है।

यहां न रावण का पुतला जलता है, न दशहरे का मेला एक-दो दिन में खत्म होता है। करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन जंगल से लाई गई लकड़ी की पूजा, विशाल रथ, स्थानीय देवी-देवताओं और आदिवासी समुदायों की सामूहिक भागीदारी से आकार लेता है। इस साल बस्तर दशहरा उत्सव 12 अगस्त से 22 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। जगदलपुर में लगने वाला बस्तर दशहरा शुद्ध रूप से उस जीवंत संस्कृति की झलक है, जहां सदियों पुरानी परंपराएं आज भी लोगों की जिंदगी का हिस्सा हैं।

बस्तर दशहरा की जड़ें करीब 600 साल पुरानी मानी जाती हैं। स्थानीय राजवंश, देवी आस्था और आदिवासी समुदायों की भागीदारी ने मिलकर इसे ऐसा स्वरूप दिया, जो देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग है। बस्तर दशहरा को लेकर माना जाता है कि चालुक्य वंश के राजा पुरुषोत्तम देव ने इसकी शुरुआत की थी।

दुनिया का सबसे लंबा उत्सव है बस्तर दशहरा (Photo: BastarDussehra.com)

दुनिया का सबसे लंबा उत्सव है बस्तर दशहरा (Photo: BastarDussehra.com)

राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे, जहां उन्हें 'रथपति' की उपाधि प्राप्त हुई थी। पुरी से लौटने के बाद उन्होंने बस्तर की अधिष्ठात्री देवी मां दंतेश्वरी के सम्मान में रथ यात्रा और इस विशाल उत्सव की नींव रखी। यह पर्व राजा और प्रजा के बीच के आत्मीय संबंध का भी प्रतीक है। बस्तर के महाराजा को मां दंतेश्वरी का मुख्य सेवक माना जाता था और आज भी राजपरिवार परंपराओं के निर्वहन में प्रमुख भूमिका निभाता है।

मातृशक्ति और प्रकृति की उपासना का पर्व

जहां देश के अन्य भागों में विजयादशमी का पर्व भगवान श्री राम की रावण पर विजय के रूप में मनाया जाता है, वहीं बस्तर में यह उत्सव मां दंतेश्वरी देवी और स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति आभार प्रकट करने का माध्यम है।

बस्तर की जनजातीय संस्कृति में प्रकृति को ही ईश्वर माना गया है। इस दौरान बस्तर के दूर-दराज गांवों और जंगलों से ग्रामीण अपने-अपने स्थानीय देवी-देवताओं के आंगा, लाठ और छत्र को सिर पर उठाकर जगदलपुर लाते हैं, जिससे पूरा शहर देवी-देवताओं के संगम स्थल में बदल जाता है।

बस्तर दशहरा के प्रमुख विधान और रस्में

75 दिनों के इस लंबे उत्सव में कई जटिल और अद्भुत रस्में पूरी की जाती हैं, जिनमें से प्रत्येक विधान का अपना विशेष सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व है:

पाट जात्रा (काष्ठ पूजा)

सावन की हरेली अमावस के दिन बस्तर के जंगलों से 'ठुरलू खोटला' (सागौन की लकड़ी) लाकर जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर के सामने पूजा की जाती है। इसी लकड़ी से विशाल रथ का निर्माण शुरू होता है।

डेरी गड़ाई

रथ निर्माण के लिए शुभ मुहूर्त में खंभे गाड़े जाते हैं और इस प्रक्रिया में स्थानीय कारीगर और ग्रामीण पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लेते हैं।

बस्तर दशहरा (Photo: BastarDussehra.com)

बस्तर दशहरा (Photo: BastarDussehra.com)

काछनगादी

यह बस्तर दशहरा की सबसे रहस्यमयी और रोमांचक रस्मों में से एक है। इसमें अनुसूचित जाति के पनका समुदाय की एक बालिका के ऊपर काछन देवी की सवारी आती है। काछन देवी को कांटों के झूले पर बैठाया जाता है और जब वह बालिका प्रसन्न होकर अनुमति देती है, तभी दशहरा उत्सव की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है।

जोगी बिठाई

इस रस्म में हलबा समुदाय का एक व्यक्ति जिसे जोगी कहते हैं, सिरहासार भवन में 9 दिनों तक निराहार रहकर योग-साधना में बैठता है। वह बस्तर की सुख-शांति और पर्व के निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना करता है।

रथ परिक्रमा

बस्तर दशहरा का मुख्य आकर्षण विशाल लकड़ी का रथ होता है। पहले चार दिनों तक 4 पहियों वाला फूल रथ और अंतिम दिनों में 8 पहियों वाला विशाल विजय रथ जगदलपुर की सड़कों पर खींचा जाता है। खास बात यह है कि इस विशालकाय रथ को हजारों जनजातीय ग्रामीण अपने हाथों से रस्सियों के सहारे खींचते हैं।

मावली परघव

दंतेवाड़ा से आने वाली मां मावली की डोली का जगदलपुर आगमन पर भव्य स्वागत किया जाता है। राजा और आम जनता मावली माता का आदर-सत्कार करते हैं।

भीतर रैनी और बाहर रैनी

भीतर रैनी के दिन रथ की चोरी की जाती है और ग्रामीण इसे शहर से दूर ले जाते हैं। अगले दिन (बाहर रैनी) राजा और अन्य लोग ग्रामीणों को मनाकर, उनके साथ नवाखाई (नए अन्न का भोग) करते हैं और रथ को वापस लाते हैं। यह रस्म राजा और प्रजा के बीच की समानता और सहभागिता का सुंदर उदाहरण है।

मुरिया दरबार

उत्सव के अंतिम चरणों में मुरिया दरबार का आयोजन होता है। ऐतिहासिक रूप से इस दरबार में बस्तर के राजा और विभिन्न जनजातियों के मांझी-मुखिया एक साथ बैठकर क्षेत्र की समस्याओं, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों और सामाजिक व्यवस्थाओं पर चर्चा करते थे। आज भी यह परंपरा लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ जारी है।

सामाजिक समरसता का दूसरा नाम है बस्तर दशहरा (Photo: BastarDussehra.com)

सामाजिक समरसता का दूसरा नाम है बस्तर दशहरा (Photo: BastarDussehra.com)

सामाजिक सहभागिता की अनूठी मिसाल

बस्तर दशहरा सामाजिक एकता और विभिन्न समुदायों के बीच श्रम-विभाजन का एक बेहतरीन उदाहरण है। इस पर्व में बस्तर की लगभग हर जाति और जनजाति की अपनी एक निर्धारित जिम्मेदारी है:

सांवरा समाज: लकड़ी काटने का कार्य करता है।

धाकड़ और मारिया समाज: रथ निर्माण के कुशल शिल्पी होते हैं।

माड़िया जनजाति: विशाल रथ को खींचने का मुख्य जिम्मा उठाती है।

पनका समाज: काछनगादी रस्म में अपनी भूमिका निभाता है।

हलबा समाज: जोगी बिठाई और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालता है।

यह आपसी सहयोग और सहभागिता सदियों से बस्तर के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत बनाए हुए है। इसी अनोखे महा-उत्सव को देखने देशभर से लोग पहुंचते हैं।

बस्तर जाएं तो ये भी घूमकर आएं

अगर आप इस साल बस्तर दशहरा देखने का प्लान बना रहे हैं तो महज यह मेला देखकर वापस ना लौटें। यहां और भी बहुत सी चीजें हैं घूमने को जो आपके टूर को हमेशा के लिए यादगार बना सकती हैं:

चित्रकोट जलप्रपात

इंद्रावती नदी पर बना यह जलप्रपात बस्तर के सबसे चर्चित प्राकृतिक आकर्षणों में से एक है। बारिश के बाद यहां पानी का प्रवाह खास तौर पर प्रभावशाली हो सकता है। मौसम और जलस्तर के हिसाब से इसका रूप बदलता रहता है।

तीरथगढ जलप्रपात

कांगेर घाटी क्षेत्र में स्थित यह जलप्रपात हरियाली और चट्टानी भूभाग के बीच अलग तरह का प्राकृतिक अनुभव देता है।

कांगेर घाटी नेशनल पार्क

जंगल, जैव विविधता और गुफाओं के लिए मशहूर यह इलाका उन यात्रियों के लिए अच्छा विकल्प है, जो बस्तर को सिर्फ त्योहार के चश्मे से नहीं देखना चाहते। कुटुमसर और कैलाश गुफाएं यहां के चर्चित आकर्षणों में शामिल हैं।

इन जगहों को घूमते समय स्थानीय नियमों और वन क्षेत्र से जुड़े निर्देशों का पालन करना जरूरी है। गुफाओं और जंगलों में बिना अधिकृत गाइड या अनुमति के जाने से बचें।

हर साल लगता है सैलानियों का जमावड़ा (Photo: BastarDussehra.com)

हर साल लगता है सैलानियों का जमावड़ा (Photo: BastarDussehra.com)

जरूर चखें बस्तर का स्वाद

किसी जगह को समझने का एक रास्ता उसकी थाली से होकर भी जाता है। बस्तर में चिला, फरा, बफौरी और चावल से बने स्थानीय व्यंजन चखने का मौका मिल सकता है। यहां के भोजन में स्थानीय उपज और क्षेत्रीय स्वाद की अपनी भूमिका है। उपलब्धता के हिसाब से किसी स्थानीय घर, छोटे भोजनालय या होमस्टे में खाना खाना इस अनुभव को और स्वादिष्ट बना सकता है।

खरीदारी के लिए बस्तर की घंटी धातु की कला, लकड़ी की नक्काशी, बांस के उत्पाद, मिट्टी की कलाकृतियां और पारंपरिक आभूषण देखे जा सकते हैं। बेहतर होगा कि संभव हो तो सीधे कारीगरों या स्थानीय समूहों से सामान खरीदें। इससे आपकी खरीदारी उस समुदाय की आजीविका से सीधे जुड़ सकती है, जिसकी कला आपको आकर्षित कर रही है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

और पढ़ें
End of Article