सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इसमें बच्चे भी शामिल हैं, चाहे उनकी उम्र कितनी भी हो। कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी, दोनों जरूरी हैं। बच्चों को सुरक्षित रखने के नाम पर उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता।
यह फैसला ऐसे समय आया है, जब भारत के कई राज्यों में बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल और स्क्रीन टाइम को सीमित करने की बात हो रही है। वहीं, कुछ देशों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर भी रोक लगाई जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का बच्चों, माता-पिता और सरकार पर क्या असर पड़ेगा?
सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला कैसे पहुंचा?
यह मामला बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को देखने, रखने और उसे रोकने के लिए कदम न उठाने से जुड़ा था। साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को देखना और अपने पास रखना भी कानून के तहत अपराध हो सकता है। इसके लिए पॉक्सो कानून और आईटी कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है। ऐसा तब भी हो सकता है, जब कोई व्यक्ति उस सामग्री को दूसरों के साथ साझा न करे।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। हाई कोर्ट ने एक आरोपी के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द कर दिया था। इसके बाद बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी पाया कि कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को रोकने के लिए दिए गए निर्देशों का सही तरीके से पालन नहीं कर रहे थे। कुछ रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि ऐसे गलत कंटेंट को लिंक के जरिए बढ़ावा दिया जा रहा था। इसी मामले में कोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और इंटरनेट इस्तेमाल करने के उनके अधिकार पर विस्तार से बात की।
बच्चों के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करना मौलिक अधिकार क्यों है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पहले दिए गए कई फैसलों का जिक्र किया। कोर्ट ने बताया कि इंटरनेट आज केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि पढ़ाई करने, जानकारी पाने और अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने का भी एक जरूरी जरिया है। साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इंटरनेट के जरिए अपनी बात कहने और कारोबार करने की आजादी को संविधान सुरक्षा देता है। वहीं, साल 2025 में कोर्ट ने डिजिटल सेवाओं तक पहुंच को जीवन के अधिकार से जुड़ा बताया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले कई बच्चों के लिए इंटरनेट पढ़ाई और जानकारी पाने का एकमात्र साधन हो सकता है। ऐसे में बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना उनके सीखने और आगे बढ़ने के मौकों को कम कर सकता है। इसी वजह से कोर्ट ने माना कि बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने से पूरी तरह रोकना सही तरीका नहीं है।
क्या सरकार बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर रोक नहीं लगा सकती?
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने या जरूरत से ज्यादा पाबंदियां लगाने का समर्थन नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि बच्चों को सुरक्षित रखने के नाम पर उन्हें इंटरनेट से दूर करना सही हल नहीं है। कोर्ट के मुताबिक, अगर इंटरनेट पर गलत सामग्री मौजूद है, तो उस सामग्री को हटाने और उसे फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की जरूरत है। बच्चों को ही इंटरनेट इस्तेमाल करने से रोक देना समस्या का सही हल नहीं है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई नियम नहीं बना सकती। सरकार नियम बना सकती है, लेकिन उन्हें संविधान के दायरे में रहना होगा। किसी भी मौलिक अधिकार पर रोक लगाने के लिए जरूरी है कि वह कानून के तहत हो, उसका कोई सही और जरूरी कारण हो और लगाई गई रोक जरूरत से ज्यादा न हो।
उम्र के आधार पर रोक लगाने में क्या परेशानी है?
कोर्ट ने बच्चों की उम्र के आधार पर इंटरनेट इस्तेमाल पर रोक लगाने के तरीके पर भी सवाल उठाए। ऐसी रोक लागू करने के लिए हर यूजर की उम्र की जांच करनी पड़ सकती है। इसके लिए लोगों की निजी जानकारी इकट्ठा करनी और उस पर नजर रखनी पड़ सकती है। इससे लोगों की निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल होने का खतरा बढ़ सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने से रोक देने पर वे इंटरनेट चलाना बंद नहीं कर देंगे। हो सकता है कि वे दूसरे ऐप या ऐसी वेबसाइटों का इस्तेमाल करने लगें, जहां सुरक्षा के नियम कम हों और खतरा ज्यादा हो। इसीलिए कोर्ट का मानना है कि बच्चों पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय इंटरनेट को उनके लिए सुरक्षित बनाना ज्यादा जरूरी है।
बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय सुझाए गए?
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा के लिए कुछ दूसरे उपायों पर जोर दिया। कोर्ट के मुताबिक, माता-पिता की सहमति, बच्चों को सही जानकारी देना और उनके इंटरनेट इस्तेमाल पर उचित नजर रखना मददगार हो सकता है। इसके अलावा, ऐप और वेबसाइट पर बच्चों के लिए अलग 'चाइल्ड मोड' बनाने का सुझाव दिया गया। इसमें कुछ खास सुविधाएं हो सकती हैं।
- बच्चों के अकाउंट शुरू से ही निजी रखे जाएं।
- अनजान लोगों के मैसेज और संपर्क करने पर रोक लगाने की सुविधा हो।
- बच्चों को गलत या नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री दिखाने से बचाया जाए।
- बच्चों को निशाना बनाने वाले विज्ञापनों और गलत कंटेंट पर नजर रखी जाए।
कोर्ट ने इन उपायों को लागू करने का पूरा तरीका तय करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर छोड़ी है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि बच्चों के लिए नुकसानदायक मानी जाने वाली कुछ सामग्री, जैसे केवल वयस्कों के लिए बनी वेबसाइटों, तक उनकी पहुंच सीमित की जा सकती है।
बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री फैलाने वालों पर होगी सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को इंटरनेट से हटाने के लिए भी जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार से ऐसी सामग्री की पहचान करने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने को कहा है। इसमें वेबसाइट और लिंक की जानकारी शामिल होगी। किसी सामग्री को इस सूची में जोड़ने से पहले कम से कम तीन प्रशिक्षित लोगों से उसकी जांच कराई जानी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बच्चों से जुड़ी ऐसी सामग्री हटाए जाने के बाद तय समय के भीतर इसकी जानकारी दी जाए। शिकायत मिलने पर 24 घंटे के अंदर उसकी जानकारी मिलने की पुष्टि भी की जाए। इसके अलावा, कोर्ट ने केंद्र सरकार से ऐसे मामलों में भारी जुर्माना लगाने पर विचार करने को कहा है। अगर कोई वेबसाइट पैसे लेकर ऐसी सामग्री दिखाती है, तो उससे होने वाली कमाई को जब्त करने के उपायों पर भी ध्यान देने को कहा गया है।
केंद्र सरकार और राज्यों को अब क्या करना होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए जरूरी दिशा-निर्देश तैयार करने को कहा है। जरूरत पड़ने पर आईटी नियमों में बदलाव भी करना होगा। केंद्र सरकार को अगली सुनवाई से पहले इस बारे में कोर्ट में हलफनामा देना होगा। इस मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को होनी है।वहीं, अगर कोई राज्य बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल या स्क्रीन टाइम को सीमित करने के लिए कानून बनाता है, तो उसे यह देखना होगा कि नियम संविधान के खिलाफ न हों और बच्चों के मौलिक अधिकारों पर जरूरत से ज्यादा रोक न लगाएं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आम लोगों के लिए क्या मतलब है?
इस फैसले का सबसे बड़ा मतलब यह है कि बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने से पूरी तरह रोक देना उनकी सुरक्षा का सही तरीका नहीं माना जा सकता। इंटरनेट से बच्चों को पढ़ाई, नई जानकारी और सीखने के कई मौके मिलते हैं। इसलिए उनकी सुरक्षा के साथ-साथ इन मौकों को बनाए रखना भी जरूरी है। हालांकि, इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि बच्चे बिना किसी नियम के इंटरनेट पर कुछ भी कर सकते हैं। माता-पिता की निगरानी, उम्र के हिसाब से सही सामग्री और नुकसान पहुंचाने वाले कंटेंट पर रोक जैसे उपाय अब भी जरूरी हैं।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि बच्चों को इंटरनेट से दूर करने के बजाय इंटरनेट को उनके लिए ज्यादा सुरक्षित बनाया जाए। बच्चों की सुरक्षा भी जरूरी है और उनके अधिकार भी। दोनों के बीच सही संतुलन बनाना ही इस फैसले का मुख्य संदेश है।
