आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर दुनिया भर में चर्चा है। दावा किया जा रहा है कि AI आने वाले समय में काम करने का तरीका बदल देगा और कई नौकरियों की जगह ले सकता है। कंपनियां भी इस तकनीक पर जमकर पैसा लगा रही हैं। लेकिन भारत की जमीनी हकीकत कुछ अलग कहानी बयां करती है। यहां 77 फीसदी कंपनियों ने AI में अपना निवेश बढ़ाया है, लेकिन सिर्फ 6.7 फीसदी कंपनियां ही इसे अपने कई कामकाजी सिस्टम में बड़े स्तर पर इस्तेमाल कर पा रही हैं। यानी AI को लेकर शोर जितना बड़ा है, उसका वास्तविक इस्तेमाल अभी उतना व्यापक नहीं है।
AI पर पैसा लगाने और इस्तेमाल करने में बड़ा अंतर
Adobe की 2026 State of AI Readiness Report में यह खुलासा हुआ है। भारत में AI निवेश से जुड़े फैसले लेने वाले 475 वरिष्ठ अधिकारियों के सर्वे पर आधारित इस रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 59 फीसदी कंपनियां अभी भी छोटे प्रयोगों और बड़े स्तर पर AI लागू करने के बीच फंसी हुई हैं।
सर्वे में शामिल कंपनियों में सिर्फ 30 संगठन ऐसे थे, जिन्होंने AI को कई कामकाजी प्रक्रियाओं में शामिल किया और इसके लगातार इस्तेमाल के लिए जरूरी व्यवस्था तैयार की। इससे साफ है कि AI में निवेश बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि कंपनियों ने इसे अपने कामकाज का अहम हिस्सा बना लिया है।
मंजूरी और सुरक्षा जांच में अटक रहे AI प्रोजेक्ट
कंपनियां AI अपनाना चाहती हैं, लेकिन उनके अपने नियम और प्रक्रियाएं इसमें रुकावट बन रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, AI से जुड़े करीब 35 फीसदी प्रस्ताव IT विभाग के मूल्यांकन से आगे नहीं बढ़ पाते। वहीं, 17 फीसदी प्रस्ताव सुरक्षा जांच के दौरान खारिज हो जाते हैं। नियमों से बंधे उद्योगों में सुरक्षा जांच के दौरान प्रस्ताव खारिज होने की दर लगभग दोगुनी हो जाती है।
इसके अलावा, कंपनियों में यह भी स्पष्ट नहीं है कि AI प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी किसकी होगी। केवल 18 फीसदी कंपनियों में ऐसा जिम्मेदार व्यक्ति है, जिसके पास AI के लिए बजट संबंधी फैसले लेने का अधिकार भी है।
छह महीने में भी शुरू नहीं हो पाता AI का असली इस्तेमाल
AI लागू करने की प्रक्रिया भी काफी धीमी है। करीब दो-तिहाई कंपनियों को शुरुआती प्रयोग से वास्तविक इस्तेमाल तक पहुंचने में कम से कम छह महीने लग जाते हैं। लगभग हर चार में से एक कंपनी को 12 महीने या उससे ज्यादा समय लगता है। हर 100 AI विचारों में से केवल करीब 15 ही वास्तविक इस्तेमाल तक पहुंच पाते हैं यानी AI का विचार आना आसान है, लेकिन उसे कंपनी के कामकाज में उतारना कहीं ज्यादा मुश्किल है।
कौशल की कमी और नतीजे मापने की चुनौती
रिपोर्ट के मुताबिक, 82 फीसदी कंपनियों ने माना कि AI से जुड़ी कर्मचारियों की कौशल संबंधी कमी या तो पहले जैसी बनी हुई है या और बढ़ गई है। वहीं, सिर्फ 10 फीसदी कंपनियां AI पर किए गए निवेश से मिलने वाले लाभ का व्यापक आकलन करती हैं। ज्यादातर कंपनियां यह देखती हैं कि AI का कितना इस्तेमाल हुआ, न कि इससे लागत कितनी घटी या काम की गुणवत्ता में कितना सुधार आया।
AI से डरने से ज्यादा जरूरी है उसकी असली तस्वीर समझना
रिपोर्ट का सबसे अहम संकेत यही है कि AI का भविष्य केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करता। जिन कंपनियों ने इसे बेहतर तरीके से अपनाया, वहां जिम्मेदारी तय करने, कामकाजी प्रक्रियाओं में AI को जोड़ने और कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने पर ज्यादा ध्यान दिया गया।
इसलिए AI को लेकर यह मान लेना कि अब हर काम मशीनें ही करेंगी, फिलहाल जमीनी हकीकत से आगे की बात है। कंपनियां निवेश तो कर रही हैं, लेकिन AI को बड़े स्तर पर लागू करने में अभी भी मंजूरी, कौशल, सुरक्षा और जवाबदेही जैसी चुनौतियां सामने हैं। फिलहाल असली मुकाबला सिर्फ AI तकनीक बनाने का नहीं, बल्कि उसे सही तरीके से इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित करने का भी है।
