Rishi Panchami Vrat Katha, ऋषि पंचमी व्रत कथा, Rishi Panchami ki kahani kya hai: आज भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी है और आज ऋषि पंचमी मनाई जाती है। इस दिन सप्तऋषियों का पूजन करने की परंपरा है। ऋषि पंचमी 2026 में 15 सितंबर, मंगलवार को मनाई जा रही है। पंचमी तिथि आज सुबह 7:44 बजे शुरू हुई है और 16 सितंबर की सुबह 8:59 बजे तक रहेगी। सप्तऋषियों की पूजा के लिए शुभ समय सुबह 11:20 बजे से दोपहर 1:47 बजे तक रहेगा।
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ऋषि पंचमी पर पूजन और व्रत करने के साथ कथा का पाठ करने का भी महत्व है। ऋषि पंचमी से जुड़ी एक प्रचलित व्रत कथा भी है, जिसमें उत्तंक नाम के ब्राह्मण और उनकी बेटी का प्रसंग आता है। कथा में बेटी के जीवन में आए कष्ट और फिर व्रत करने के बाद उसके दुख दूर होने की बात कही गई है। यहां पढ़ें ऋषि पंचमी की व्रत कथा इन हिंदी, ऋषि पंचमी की कहानी क्या है, ऋषि पंचमी कथा।
Rishi Panchami Vrat Katha, ऋषि पंचमी व्रत कथा
ऋषि पंचमी की प्रचलित व्रत कथा के अनुसार, विदर्भ में उत्तंक नाम के एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी सुशीला भी धार्मिक स्वभाव की थीं। उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी थी। जब बेटी विवाह के योग्य हुई तो उत्तंक ने उसका विवाह अच्छे परिवार में कर दिया। लेकिन विवाह के कुछ समय बाद ही दुर्भाग्य से उसके पति का निधन हो गया और वह विधवा हो गई।
बेटी के जीवन में आए इस दुख से माता-पिता बहुत परेशान हुए। वे उसे अपने साथ लेकर गंगा नदी के किनारे चले गए। वहां उन्होंने एक छोटी-सी कुटिया बनाई और उसी में रहने लगे।
एक दिन उनकी बेटी कुटिया में आराम कर रही थी। अचानक उसके शरीर पर कीड़े दिखाई देने लगे। बेटी की ऐसी हालत देखकर सुशीला घबरा गईं। उन्होंने तुरंत अपने पति से इसका कारण जानना चाहा और पूछा कि उनकी बेटी के साथ ऐसा क्यों हो रहा है।
उस समय उत्तंक ध्यान में लीन थे। कथा के अनुसार, उन्होंने ध्यान के माध्यम से इस घटना का कारण जाना। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी ने पिछले जन्म में भी ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया था। उस समय मासिक धर्म के दौरान उसने बर्तनों को छू दिया था। इसके अलावा, वर्तमान जन्म में भी उसने ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया था। कथा में इन्हीं कर्मों को उसके कष्ट का कारण बताया गया।
उत्तंक ने अपनी बेटी को ऋषि पंचमी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यदि वह श्रद्धा और साफ मन से इस व्रत को करेगी और विधि के अनुसार पूजा करेगी, तो उसके कष्ट दूर होंगे और उसे आगे के जीवन में सुख-सौभाग्य प्राप्त होगा।
पिता की बात मानकर बेटी ने श्रद्धापूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत रखा और सप्तऋषियों का पूजन किया। कथा के अनुसार, व्रत के प्रभाव से उसके दुख और परेशानियां समाप्त हो गईं। आगे चलकर उसे सौभाग्य और सुख की प्राप्ति हुई।
