भारतीय संस्कृति और अध्यात्म में भोजन को शरीर चलाने के ईंधन होने के साथ ही आत्मा को तृप्त करने वाला 'प्रसाद' भी माना गया है। छान्दोग्य उपनिषद में स्पष्ट लिखा गया है - आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः। इसका अर्थ है- जैसा अन्न होगा, वैसा ही हमारा मन होगा और विचार बनेंगे। यही कारण है कि क्रोध, ईर्ष्या या मानसिक तनाव में बनाया गया भोजन 'जहर' के समान माना गया है। आइए जानते हैं इसके पीछे के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण:
क्या गुस्से में बनाया खाना सचमुच बन जाता है जहर? जानिए क्या कहते हैं शास्त्र (AI Image)
अन्न और ऊर्जा का संबंध
आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार, भोजन बनाते समय बनाने वाले की मानसिक स्थिति और उसकी ऊर्जा भोजन में समाहित हो जाती है। जब कोई इंसान अत्यधिक क्रोध, चिड़चिड़ेपन या रोते हुए खाना बनाता है, तो उसकी नकारात्मक ऊर्जा और दुख के स्पंदन सीधे उस भोजन में चले जाते हैं। ऐसा भोजन करने वाले व्यक्ति के भीतर भी धीरे-धीरे वही क्रोध और अशांति पनपने लगती है।
सनातन परंपरा में भोजन बनाना एक पवित्र अनुष्ठान और साधना है। हिंदू शास्त्रों ने भी माना है कि अगर भोजन शांत, प्रसन्न और ईश्वर का स्मरण करते हुए बनाया जाए, तो यह साधारण भोजन भी 'अमृत' बन जाता है जो शरीर को आरोग्य और मन को असीम शांति प्रदान करता है। इसके विपरीत, क्रोध में बना भोजन तन और मन दोनों को बीमार कर जहर का काम करता है।
जैसा अन्न, वैसा मन का सिद्धांत
बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि भोजन हमारे सूक्ष्म शरीर यानी मन का भी निर्माण करता है। जब हम क्रोध की अग्नि में पका हुआ भोजन ग्रहण करते हैं, तो हमारे भीतर का सात्विक भाव नष्ट होने लगता है। इससे परिवार के सदस्यों में आपसी मनमुटाव, चिड़चिड़ापन, और नकारात्मक सोच बढ़ने लगती है। बिना किसी ठोस कारण के भी घर में क्लेश और अशांति का माहौल बनने लगता है, क्योंकि उस भोजन के माध्यम से नकारात्मक ऊर्जा पूरे परिवार के रक्त में प्रवाहित होने लगती है।
क्या कहता है विज्ञान
अध्यात्म का यह नियम पूरी तरह वैज्ञानिक भी है। जब इंसान क्रोधित होता है, तो उसका शरीर 'फाइट या फ्लाइट' मोड में चला जाता है। इस दौरान शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स का स्तर तेजी से बढ़ जाता है। क्रोध की इस अवस्था में निकलने वाले ये हानिकारक टॉक्सिन्स व्यक्ति की सांस और उसकी ऊर्जा के जरिए भोजन को भी प्रभावित करते हैं। ऐसा दूषित भोजन पाचन तंत्र को बिगाड़ता है और धीरे-धीरे शरीर को बीमारियों का घर बना देता है।
भोजन बनाते समय कैसी हो मनोदशा
खाना बनाते समय मन को शांत रखें। क्रोध आने पर कुछ देर रुक जाएं और सामान्य होने पर ही रसोई में प्रवेश करें। भोजन बनाते समय भगवान के नाम का स्मरण, भजन या कोई मंत्र सुनना सबसे उत्तम माना गया है। इससे भोजन 'प्रसाद' का रूप ले लेता है। भोजन कराने वाले को हमेशा कृतज्ञता और प्रेम के भाव से खाना परोसना चाहिए।
