Dussehra 2026 Apta Leaves: साल 2026 में दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। इस दिन महाराष्ट्र समेत कई जगहों पर लोग एक-दूसरे को आपटा के पत्ते बांटते हैं। इन पत्तों को सोना पत्ती कहा जाता है। दशहरे पर लोग आपटा के पत्ते देकर परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए सुख-समृद्धि, धन और तरक्की की कामना करते हैं। इस दौरान बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद भी लिया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर हरे पत्तों को सोना क्यों कहा जाता है और दशहरे पर इन्हें बांटने की शुरुआत कैसे हुई?
राजा रघु और ऋषि कौत्स से जुड़ी है इसकी कहानी
पौराणिक कथा के अनुसार, ऋषि कौत्स ने गुरु वरतंतु से शिक्षा प्राप्त की थी। पढ़ाई पूरी होने के बाद कौत्स अपने गुरु को गुरु दक्षिणा देना चाहते थे। गुरु वरतंतु ने पहले उनसे दक्षिणा लेने से इनकार कर दिया, लेकिन कौत्स के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देने को कहा। इतनी बड़ी रकम जुटाना कौत्स के लिए आसान नहीं था। ऐसे में वह मदद मांगने के लिए दानवीर राजा रघु के पास पहुंचे।
राजा रघु भगवान श्रीराम के पूर्वज थे और अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे। हालांकि, उस समय वह अपना पूरा धन दान कर चुके थे। कौत्स को खाली हाथ लौटाना उन्हें मंजूर नहीं था। उन्होंने ऋषि की गुरु दक्षिणा पूरी करने के लिए धन के देवता कुबेर से सोने की मुद्राएं प्राप्त करने का निश्चय किया।
कुबेर ने आपटा के पेड़ों से बरसाया सोना
राजा रघु की उदारता और ऋषि कौत्स की जरूरत को देखते हुए कुबेर ने आपटा और शमी के पेड़ से सोने की मुद्राओं की वर्षा कर दी। राजा रघु ने ये मुद्राएं ऋषि कौत्स को दे दीं, ताकि वह अपने गुरु को दक्षिणा दे सकें।
कौत्स ने अपने गुरु की मांग के अनुसार 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं रखीं और बाकी धन लौटा दिया। बची हुई मुद्राएं राजा रघु ने लोगों में बांट दी। उस दिन से आपटा के पत्तों को सोने के समान माना जाने लगा। इसके बाद रावण वध की खुशी में अयोध्या में स्वर्ण मुद्राएं एक दूसरे को भेंट की गईं। इसके बाद से दशहरा के दिन लोग आपटा के पत्तों को सोने के रूप में बांटने लगे। मान्यता है कि आपटा के पत्ते घर में लाने से धन-धान्य बढ़ता है।
महाराष्ट्र में दशहरे के दिन लोग अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों को आपटा के पत्ते देकर शुभकामनाएं देते हैं। बड़े-बुजुर्गों को पत्ते देकर उनके पैर छूने और आशीर्वाद लेते हैं। इसे मराठी में ‘सोना घ्या, सोन्यासारखे रहा’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है- सोना लो और सोने जैसे बने रहो। इसके जरिए लोग एक-दूसरे के लिए खुशहाली, अच्छे जीवन और तरक्की की कामना करते हैं।
महाराष्ट्र में आज भी निभाई जाती है सोना पत्ती बांटने की परंपरा
महाराष्ट्र में विजयादशमी के दिन आपटा के पत्ते बांटना दशहरे के उत्सव का खास हिस्सा है। लोग पूजा-पाठ के बाद परिवार और परिचितों से मिलने जाते हैं और उन्हें सोना पत्ती देते हैं। बच्चे भी घर के बड़ों के पैर छूकर आपटा के पत्ते देते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं।
शमी पत्र का भी होता है पूजन
कई जगहों पर आपटा के पत्तों की जगह शमी पत्र का पूजन किया जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने रावण के वध से पहले शमी के पेड़ का पूजन किया था। इससे भगवान शिव की कृपा उनको प्राप्त हुई थी। इस कारण दशहरा के दिन शमी के पत्तों और पेड़ का भी पूजन करना शुभ माना जाता है। कुछ जगहों पर सोने की मुद्राएं शमी के पेड़ से गिरने की बात लिखी है, जिस कारण लोग शमी के पत्तों को भी एक-दूसरे को देते हैं।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी प्रचलित कथाओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
