Dhundhiraja Chaturthi Vrat Katha: ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत कथा, पढ़ें भगवान शिव और गणपति के काशी यात्रा की कहानी

Dhundhiraja Chaturthi Vrat Katha (ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत कथा)​​: हर साल फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को ढुण्ढिराज चतुर्थी का व्रत किया जाता है। इस दिन पूरे विधि-विधान के साथ गणपति की पूजा होती है। साथ ही व्रत कथा का पाठ करना भी अनिवार्य माना जाता है। इस पाठ को करने से सभी तरह की समस्याओं से मुक्ति मिलती है। यहां से आप ढुण्ढिराज चतुर्थी की व्रत कथा देख सकते हैं।

Dhundhiraja Chaturthi Vrat Katha (ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत कथा): ढुण्ढिराज चतुर्थी की पौराणिक कथा अनुसार, प्राचीन काल में एक दिन भगवान शिव के मन में काशी को अपना निवास स्थान बनाने का ख्याल आया, जहां राजा दिवोदास के धर्मात्मा शासन का राज था। राजा दिवोदास बहुत दयालु और धर्मप्रिय थे, जिनके शासन में उनके राज्य में कोई कमी नहीं थी। ब्रह्मा जी से राजा दिवोदास को वरदान प्राप्त था कि जब तक उनके राज्य में सब कुछ सही रहेगा और किसी भी चीज की कमी नहीं होगी, तब तक कोई भी देवता वहां प्रवेश नहीं कर पाएगा। लेकिन शिव जी को वो जगह बहुत अच्छी लगी, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र भगवान गणेश को काशी भेजा ताकि वो उस जगह के बारे में अच्छे से जान सकें।

ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत कथा (pc: canva)

काशी जाने से पहले गणेश जी ने एक ज्योतिषी का रूप धारण किया और अपना नाम ‘ढुण्ढि’ रखने का निश्चय किया। कुछ ही समय में उन्होंने काशीवासियों को अपनी बुद्धिमत्ता से प्रभावित कर दिया। इससे गणेशी जी की काशी में चर्चा होने लगी और राजा दिवोदास के शासन में कमी आने लगी। ऐसे में भगवान शिव को काशी में प्रवेश मिल गया और उन्होंने गणेश जी को ‘ढुंढिराज’ नाम से पुकारा। साथ ही कहा कि जो भी भक्त काशी आएगा, उसकी यात्रा ढुंढिराज गणेश की पूजा करने के बाद ही पूरी होगी।

End of Feed